भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]बालकाण्ड१५


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देव त्वद्रूपमेतन्मे सदा तिष्ठतु मानसे।<br>आवृणोतु न मां माया तव विश्वविमोहिनी ॥२८॥आपकी यह मनोहर मूर्ति सदा मेरे हृदयमें विराजमान रहे और आपकी विश्व-विमोहिनी माया मुझे न व्यापे ॥२८॥
उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् ।<br>दर्शयस्व महानन्द बालभावं सुकोमलम् ॥<br>ललितालिङ्गनालापैस्तरिष्याम्युत्कटं तमः ॥२९॥हे विश्वात्मन् ! अपने इस अलौकिक रूपका उपसंहार कीजिये और परम आनन्ददायक सुकोमल बालरूप धारण कीजिये जिसके अति सुखद आलिंगन और सम्भाषणादिसे मैं घोर अज्ञानान्धकारको पार कर जाऊँगी ॥ २९ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>यद्यदिष्टं तवास्त्यम्ब तत्तद्भवतु नान्यथा ॥३०॥<br>अहं तु ब्रह्मणा पूर्वं भूमेर्भारापनुत्तये ।<br>प्रार्थितो रावणं हन्तुं मानुषत्वमुपागतः ॥३१॥<br>त्वया दशरथेनाहं तपसाऽऽराधितः पुरा ।<br>मत्पुत्रत्वाभिकाङ्क्षिण्या तथा कृतमनिन्दिते ॥३२॥<br>रूपमेतच्चया दृष्टं प्राक्तनं तपसः फलम् ।<br>मद्दर्शनं विमोक्षाय कल्पते ह्यन्यदुर्लभम् ॥३३॥<br>संवादमावयोर्र्यस्तु पठेद्वा श‍ृणुयादपि ।<br>स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥३४॥**श्रीभगवान् बोले—**हे मात: ! आप जो-जो चाहती हैं वही हो, उसके विरुद्ध कुछ भी न हो। पूर्वकालमें मुझसे पृथिवीका भार उतारनेके लिये ब्रह्माने प्रार्थना की थी, अतः रावणादि निशाचरोंको मारनेके लिये ही मैंने मनुष्यरूपसे अवतार लिया है ॥३०-३१॥ हे अनिन्दिते ! दशरथजीके सहित तुमने भी मुझे पुत्ररूप-से प्राप्त करनेकी इच्छासे तपस्या करते हुए मेरी आराधना की थी। उसीको मैंने इस समय प्रकट होकर पूर्ण किया है ॥३२॥ तुमने अपनी पूर्व तपस्याके फलसे ही मेरा यह दिव्य रूप देखा है। मेरा दर्शन मोक्ष-पद देनेवाला होता है; पुण्यहीन जनोंके लिये इसका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ॥३३॥ जो व्यक्ति हमारे इस संवादको पढ़ेगा या सुनेगा वह मेरी सारूप्य मुक्ति (समानरूपता) प्राप्त करेगा और मरणकालमें उसे मेरा स्मरण रहेगा ॥३४॥
इत्युक्त्वा मातरं रामो बालो भूत्वा रुरोद ह ।<br>बालत्वेऽपीन्द्रनीलाभो विशालाक्षोऽतिसुन्दरः ३५<br>बालारुणप्रतीकाशो ललिताखिललोकपः ।मातासे इस प्रकार कह भगवान् बालरूप होकर रोने लगे। उनका बालरूप भी इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण, बड़े-बड़े नेत्रोंवाला और अति सुन्दर था ॥३५॥ वह प्रभातकालीन बालसूर्यके समान अरुण-ज्योतिर्मय था । भगवान्‌ने अवतरित होकर उस सुमनोहर बालरूपसे सभी लोकपालोंको परम आनन्दित कर दिया।
अथ राजा दशरथः श्रुत्वा पुत्रोद्भवोत्सवम् ।<br>आनन्दार्णवमग्नोऽसावाययौ गुरुणा सह ॥३६॥तत्पश्चात् जब महाराज दशरथजीने पुत्रोत्पत्ति-का शुभ समाचार सुना तो वे मानो आनन्द-समुद्रमें डूब गये और गुरु वशिष्ठजीके साथ राजभवनमें आये ॥३६॥
रामं राजीवपत्राक्षं दृष्ट्वा हर्षाश्रुसंप्लुतः ।<br>गुरुणा जातकर्माणि कर्तव्यानि चकार सः ॥३७॥वहाँ आकर कमलनयन रामको देखकर वे आनन्दाश्रुओं-से पूर्ण हो गये और गुरुजीद्वारा उनके जातकर्म आदि आवश्यक संस्कार कराये ॥३७॥
कैकेयी चाथ भरतमसूत कमलेक्षणा ।<br>सुमित्रायां यमौ जातौ पूर्णेन्दुसदृशाननौ ॥३८॥तदनन्तर कमलनयनी कैकेयीसे भरतका जन्म हुआ और सुमित्रासे पूर्णचन्द्रके समान मुखवाले दो यमज बालक उत्पन्न हुए ॥३८॥
तदा ग्रामसहस्राणि ब्राह्मणेभ्यो मुदा ददौ ।<br>सुवर्णानि च रत्नानि वासांसि सुरभीः शुभाः ॥३९॥उस समय महाराज दशरथने अति उत्साहपूर्वक सहस्रों ग्राम, बहुत-सा सुवर्ण, अनेक रत्न, नाना प्रकारके वस्त्र और शुभलक्षणोंवाली अनेकों गौएँ ब्राह्मणोंको दीं ॥३९॥