भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

यस्मिन् रमन्ते मुनयो विद्ययाऽज्ञानविप्लवे ।
तं गुरुः प्राह रामेति रमणाद्राम इत्यपि ॥४०॥

भरणाद्भरतो नाम लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ।
शत्रुघ्नं शत्रुहन्तारमेवं गुरुरभाषत ॥४१॥

लक्ष्मणो रामचन्द्रेण शत्रुघ्नो भरतेन च ।
द्वन्द्वीभूय चरन्तौ तौ पायसांशानुसारतः ॥४२॥

रामस्तु लक्ष्मणेनाथ विचरन्बाललीलया ।
रमयामास पितरौ चेष्टितैर्मुग्धभाषितैः ॥४३॥

भाले स्वर्णमयाश्वत्थपर्णमुक्ताफलप्रभम् ।
कण्ठे रत्नमणिव्रातमध्यद्वीपिनखाञ्चितम् ॥४४॥

कर्णयोः स्वर्णसम्पन्नरक्तार्जुनसटालुकम् ।
शिञ्जानमणिमञ्जीरकटिसूत्राङ्गदैर्वृतम् ॥४५॥

स्मितवक्त्रालपदशनमिन्द्रनीलमणिप्रभम् ।
अङ्गणे रिङ्गमाणं तं तर्णकाननु सर्वतः ॥४६॥

दृष्ट्वा दशरथो राजा कौसल्या मुमुदे तदा ।
भोक्ष्यमाणो दशरथो राममेहीति चासकृत् ॥४७॥

आह्वयत्यतिहर्षेण प्रेम्णा नायाति लीलया ।
आनयेति च कौसल्यामाह सा सस्मिता सुतम् ॥४८॥

धावत्यपि न शक्नोति स्प्रष्टुं योगिमनोगतिम् ।
प्रहसन्स्वयमायाति कर्दमाङ्कितपाणिना ॥४९॥

किञ्चिद्गृह्णीत्वा कवलं पुनरेव पलायते ।
कौसल्या जननी तस्य मासि मासि प्रकुर्वती ॥५०॥

वायनानि विचित्राणि समलङ्कृत्य राघवम् ।


विज्ञानके द्वारा अज्ञानके नष्ट हो जानेपर मुनिजन जिनमें रमण करते हैं अथवा जो अपनी सुन्दरतासे भक्तजनोंके चित्तोंको रमाते (आनन्दमग्न करते) हैं, उनका नाम गुरु वशिष्ठजीने 'राम' रखा ॥४०॥ इसी प्रकार गुरुजीने, संसारका पोषण करनेवाला होनेसे दूसरे पुत्रका नाम 'भरत', समस्त सुलक्षण-सम्पन्न होनेसे तीसरेका नाम 'लक्ष्मण' और शत्रुओंका घातक होनेसे चौथे पुत्रका नाम 'शत्रुघ्न' रखा ॥४१॥ कौसल्या और कैकेयीके दिये हुए पायसांशोंके अनुसार लक्ष्मणजी रामचन्द्रजीके और शत्रुघ्नजी भरतजीके जोड़ीदार होकर रहने लगे ॥ ४२ ॥ लक्ष्मणजीके साथ विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजी अपनी बाल-लीलाओं, चेष्टाओं और भोली-भाली बातोंसे माता-पिताको आनन्दित करने लगे ॥ ४३ ॥

जिसके ललाटपर मोतियोंसे सजाया हुआ देदीप्यमान सुवर्णमय अश्वत्थपत्र (पीपलका पत्ता) तथा गलेमें रत्न और मणिसमूहके साथ बीच-बीचमें व्याघ्रनख सजाकर गूँथी हुई लड़ियाँ सुशोभित हैं ॥ ४४ ॥ कानोंमें अर्जुनवृक्षके कच्चे फलोंके समान रत्नजटित सुवर्णके आभूषण लटक रहे हैं, तथा जो झनकारते हुए मणिमय नूपुर सुवर्णमेखला और बाजुबन्दसे विभूषित हैं॥४५॥ उस इन्द्रनील-मणिकी-सी आभावाले तथा स्वल्प दाँतोंसे युक्त मुसकाते हुए मुखवाले बालकको राजभवनके आँगनमें बछड़ेके पीछे-पीछे सब ओर बालगतिसे दौड़ते देख महाराज दशरथ और माता कौसल्या अति आनन्दित होते थे। जिस समय महाराज भोजन करने बैठते तो 'राम ! आ' ऐसा कह-कहकर अति हर्ष और प्रेमपूर्वक उन्हें बारम्बार बुलाते । जब खेलमें लगे रहनेके कारण वे न आते तो वे कौसल्यासे 'इसे पकड़ ला' ऐसा कहकर उन्हें लानेके लिये कहते। किन्तु जो योगिजनोंके चित्तके एकमात्र आश्रय हैं ऐसे पुत्रको कौसल्याजी हँसकर दौड़ती हुई भी न पकड़ पातीं। (उस समय माताको थकी देखकर) वे स्वयं ही कीचमें सने हुए हाथोंसे हँसते-हँसते वहाँ आ जाते और एक-आध ग्रास खाकर ही फिर भाग जाते ॥ ४६-४९ ॥ माता कौसल्या रामको भली प्रकार वस्त्राभूषण पहिनाकर प्रतिमास व्यञ्जन बनातीं और वर्ष लगनेपर पूजा,

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