भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]बालकाण्ड१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपूपान्मोदकान्कृत्वा कर्णशष्कुलिकास्तथा।<br>कर्णपूरांश्च विविधान् वर्षवृद्धौ च वायनम् ॥५१॥लड्डू, पूरी, कचौड़ी आदि विविध व्यञ्जन बनाकर (ब्राह्मण-भोजनादि) द्वारा उत्सव मनाती थीं ॥५०-५१॥
गृहकृत्यं तया त्यक्तं तस्य चापल्यकारणात् ।<br>एकदा रघुनाथोऽसौ गतो मातरमन्तिके ॥५२॥रामकी चपलताके कारण कौसल्याने घरका काम करना छोड़ दिया था । एक दिन रामजी माताके पास गये ॥५२॥ और कहा—"माता ! मुझे कुछ खानेको दे।" किन्तु काममें लगी होनेसे माताने न सुना । तब क्रोधित होकर उन्होंने डण्डेसे सब बर्तन फोड़ डाले ॥५३॥ तथा छींकेपर रखे हुए गोरस और माखनको गिरा लिया और उसे तथा वहाँ रखे हुए समस्त दूध-दहीको भी क्रमशः लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको बाँट दिया । तब रसोइयेने जाकर माता कौसल्यासे कहा । वह हँसती हुई पकड़नेको दौड़ीं ॥५४-५५॥
भोजनं देहि मे मातर्न श्रुतं कार्यसक्तया ।<br>ततः क्रोधेन भाण्डानि लगुडेनाहनत्तदा ॥५३॥
शिक्यस्थं पातयामास गव्यं च नवनीतकम् ।<br>लक्ष्मणाय ददौ रामो भरताय यथाक्रमम् ॥५४॥
शत्रुघ्नाय ददौ पश्चाद्दधि दुग्धं तथैव च ।<br>सूदेन कथिते मात्रे हास्यं कृत्वा प्रधावति ॥५५॥
आगतां तां विलोक्याथ ततः सर्वैः पलायितम् ।<br>कौसल्या धावमानापि प्रस्खलन्ती पदे पदे ॥५६॥माताको आती देखकर वे सब बालक भाग गये । माता कौसल्या भी उनके पीछे दौड़ीं, किन्तु वे पग-पगपर फिसलने लगीं ॥५६॥
रघुनाथं करे धृत्वा किञ्चिन्नोवाच भामिनी ।<br>बालभावं समाश्रित्य मन्दं मन्दं रुरोद ह ॥५७॥अन्तमें उन्होंने रामको पकड़ लिया, किन्तु कहा कुछ भी नहीं । उस समय रामजी बालभावसे धीरे-धीरे रोने लगे ॥५७॥
ते सर्वे लालिता मात्रा गाढमालिङ्ग्य यत्नतः।<br>एवमानन्दसन्दोहजगदानन्दकारकः ॥५८॥तब उन सबको भयभीत देखकर माताने उन्हें बड़े प्रेमसे हृदय लगाकर प्यार किया । इस प्रकार जगदानन्दकारक आनन्दघन भगवान् राम मायामय बालरूप धारणकर राजदम्पति दशरथ और कौसल्याको आनन्दित करने लगे । तदुपरान्त कुछ काल बीतनेपर उन चारों भाइयोंने कौमार-अवस्था में प्रवेश किया ॥५८-५९॥
मायाबालवपुर्धृत्वा रमयामास दम्पती ।<br>अथ कालेन ते सर्वे कौमारं प्रतिपेदिरे ॥५९॥
उपनीता वसिष्ठेन सर्वविद्याविशारदाः ।<br>धनुर्वेदे च निरताः सर्वशास्त्रार्थवेदिनः ॥६०॥तब वसिष्ठजीने उनका उपनयन-संस्कार किया और लीलासे ही नररूप धारण करनेवाले सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी (चारों भाई) समस्त शास्त्रोंका मर्म जाननेवाले तथा धनुर्वेद आदि सम्पूर्ण विद्याओंके पारगामी हो गये । उन सब भाइयोंमें लक्ष्मणजी सेव्य-सेवक-भावसे आदरपूर्वक सदा रामचन्द्रजीका अनुगमन करते थे और उसी प्रकार शत्रुघ्नजी सदा भरतजीकी सेवामें उपस्थित रहते थे । भगवान् राम नित्यप्रति लक्ष्मणजीके सहित धनुष, बाण और तरकश धारणकर घोड़ेपर सवार हो मृगयाके लिये वनको जाते और वहाँ दुष्ट मृगोंको मारकर उन सबको पिताजीके अर्पण कर देते ॥६०-६३॥ प्रातःकाल उठकर स्नान
बभूवुर्जगतां नाथा लीलया नररूपिणः ।<br>लक्ष्मणस्तु सदा राममनुगच्छति सादरम् ॥६१॥
सेव्यसेवकभावेन शत्रुघ्नो भरतं तथा ।<br>रामश्चापधरो नित्यं तूणीबाणान्वितः प्रभुः ॥६२॥
अश्वारूढो वनं याति मृगयायै सलक्ष्मणः ।<br>हत्वा दुष्टमृगान्सर्वांन्पित्रे सर्वं न्यवेदयत् ॥६३॥