भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ११] युद्धकाण्ड २९३


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भयदुःखादिभिर्व्याप्ताः संसारे परिचर्तिनः ॥८०॥<br><br>अयं तु राक्षसः क्रूरो ब्रह्महाऽतीव तामसः ।<br>परदाररतो विष्णुद्वेषी तापसहिंसकः ॥८१॥<br><br>पश्यत्सु सर्वभूतेषु राममेव प्रविष्टवान् ।<br>एवं ब्रुवत्सु देवेषु नारदः प्राह सुस्मितः ॥८२॥<br><br>शृणुतात्र सुरा यूयं धर्मतत्त्वविचक्षणाः ।<br>रावणो राघवद्वेषादहर्निशं हृदि भावयन् ॥८३॥<br><br>भृत्यैः सह सदा रामचरितं द्वेषसंयुतः ।<br>श्रुत्वा रामात्स्वनिधनं भयात्सर्वत्र राघवम् ॥८४॥<br><br>पश्यन्ननुदिनं स्वप्ने राममेवानुपश्यति ।<br>क्रोधोऽपि रावणस्याशु गुरुबोधाधिकोऽभवत्॥८५॥<br><br>रामेण निहतश्चान्ते निर्धूताशेषकल्मषः ।<br>रामसायुज्यमेवाप रावणो मुक्तबन्धनः ॥८६॥<br><br>पापिष्ठो वा दुरात्मा परधनपरदा-<br>    रेषु सक्तो यदि स्या-<br>न्नित्यं स्नेहाद्भयाद्वा रघुकुलतिलकं<br>    भावयन्सम्परेतः ।<br>भूत्वा शुद्धान्तरङ्गो भवशतजनिता-<br>    नेकदोपैर्विमुक्तः<br>सद्यो रामस्य विष्णोः सुरवरविनुतं<br>    याति वैकुण्ठमाद्यम् ॥८७॥<br><br>हत्वा युद्धे दशास्यं त्रिभुवनविषमं<br>    वामहस्तेन चापं<br>भूमौ विष्टभ्य तिष्ठन्नितरकरधृतं<br>    भ्रामयन्बाणमेकम् ।<br>आरक्तोपान्तनेत्रः शरदलितवपुः<br>    सूर्यकोटिप्रकाशोकृपापात्र हैं, फिर भी हम भय और दुःखादिसे व्याप्त होकर संसारमें भटका करते हैं ॥८०॥ और यह रावण महाक्रूर राक्षस है, (यही नहीं) यह ब्रह्मघाती, अत्यन्त तमोगुणी, परस्त्रीपरायण, भगवद्विरोधी और तपस्वियोंको पीड़ित करनेवाला भी है ॥८१॥ किन्तु देखो, यह सबके देखते-देखते भगवान् राममें ही लीन हो गया।”<br><br>देवगणके इस प्रकार कहनेपर नारदजीने मुसकाते हुए कहा—॥८२॥ “हे देवगण ! तुमलोग धर्मके तत्त्वको भली प्रकार जाननेवाले हो, अतः (इस विषयमें मेरा मत) सुनो। रघुनाथजीसे द्वेष रहनेके कारण रावण अहर्निश अपने सेवकोंसहित द्वेषपूर्वक हृदयमें सदा श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रकी ही भावना रखता था; तथा रामके हाथसे अपना वध सुनकर सर्वत्र रामहीको देखता हुआ स्वप्नमें भी उन्हींको देखता था। इस प्रकार रावणका क्रोध भी उसके लिये गुरुके उपदेशसे कहीं अधिक उपयोगी हुआ॥८३–८५॥ अन्तमें स्वयं भगवान् रामके हाथसे मारे जानेके कारण उसके समस्त पाप धुल गये थे। अतः बन्धनहीन हो जानेसे उसने राममें सायुज्य मोक्ष प्राप्त किया॥८६॥ यद्यपि कोई पुरुष (पहलेका) महापापी, दुराचारी तथा परधन और परस्त्रीमें आसक्त भी हो तथापि यदि नित्यप्रति प्रेमसे अथवा भयसे रघुकुलतिलक भगवान् रामका चिन्तन करता हुआ प्राणत्याग करता है तो वह शुद्ध-चित्त होकर सैकड़ों जन्मके उपार्जित नाना दुःखोंसे छूटकर शीघ्र ही भगवान् विष्णुके देवता और दैत्योंसे वन्दित आदिस्थान वैकुण्ठलोकको चला जाता है॥८७॥ जो त्रिलोकीके कण्टकस्वरूप रावणको युद्धमें मारकर अपने बायें हाथसे धनुषको पृथिवीपर टेके हुए खड़े हैं, तथा दूसरे हाथमें एक बाण लेकर उसे घुमा रहे हैं, जिनके नेत्रोंके उपान्तभाग कुछ लाल हो रहे हैं, बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुआ शरीर करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहा है और उन्नत देह वीरश्रीसे सुशोभित है, वे
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