अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २९४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १२ |
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वीरश्रीबन्धुराङ्गस्त्रिदशपतिनुतः <br> पातु मां वीररामः ॥८८। | देवराज इन्द्रद्वारा वन्दित वीरवर राम मेरी रक्षा करें" ॥ ८८ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
द्वादश सर्ग
विभीषणका राज्याभिषेक और सीताजीकी अग्नि-परीक्षा।
| श्रीमहादेव उवाच <br> रामो विभीषणं दृष्ट्वा हनूमन्तं तथाङ्गदम् । <br> लक्ष्मणं कपिराजं च जाम्बवन्तं तथा परान् ॥ १ ॥ <br> परितुष्टेन मनसा सर्वानेवाब्रवीद्वचः । <br> भवतां बाहुवीर्येण निहतो रावणो मया ॥ २ ॥ <br> कीर्तिः स्थास्यति वः पुण्या यावच्चन्द्रदिवाकरौ । <br> कीर्तयिष्यन्ति भवतां कथां त्रैलोक्यपावनीम् ॥३॥ <br> मयोपेतां कलिहरां यास्यन्ति परमां गतिम् । | श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती ! श्रीरामचन्द्रजीने विभीषण, हनुमान्, अंगद, लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, जाम्बवान् तथा अन्यान्य वीरोंकी ओर देख सभी लोगोंसे प्रसन्न-चित्तसे कहा—“आपलोगोंके बाहुबलसे आज मैंने रावणको मार दिया ॥ १-२ ॥ आप सबलोगोंकी पवित्र कीर्ति जबतक सूर्य और चन्द्र रहेंगे तबतक स्थिर रहेगी और जो लोग मेरेसहित आप सबकी कलि-कल्मष-नाशिनी त्रिलोकपावनी पवित्र कथाका कीर्तन करेंगे वे परमपदको प्राप्त होंगे।” |
| एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा रावणं पतितं भुवि ॥ ४ ॥ <br> मन्दोदरीमुखाः सर्वाः स्त्रियो रावणपालिताः । <br> पतिता रावणस्याग्रे शोचन्त्यः पर्यदेवयन् ॥५॥ <br> विभीषणः शुशोचार्तः शोकेन महताऽऽवृतः । <br> पतितो रावणस्याग्रे बहुधा पर्यदेवयत् ॥ ६ ॥ | इसी समय रावणको पृथिवीपर गिरा देख उससे सुरक्षित मन्दोदरी आदि समस्त स्त्रियाँ उसके पास (आकर) गिर गयीं तथा शोकसे विलाप करने लगीं ॥ ३-५ ॥ विभीषण भी महान् शोकाकुल हो आर्तभावसे चिन्ताग्रस्त हो गये और रावणके पास गिरकर नाना प्रकारसे विलाप करने लगे ॥ ६ ॥ तब |
| रामस्तु लक्ष्मणं प्राह बोधयस्व विभीषणम् । <br> करोतु भ्रातृसंस्कारं किं विलम्बेन मानद ॥ ७ ॥ <br> स्त्रियो मन्दोदरीमुख्याः पतिता विलपन्ति च । <br> निवारयतु ताः सर्वा राक्षसी रावणप्रियाः ॥८॥ | श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीसे कहा—“हे मानद ! विभीषणको समझाओ कि वह भाईका (और्ध्वदैहिक) संस्कार करे, अब व्यर्थ देरी करनेसे क्या लाभ है ॥ ७ ॥ और मन्दोदरी आदि स्त्रियाँ पछाड़ खा-खाकर विलाप कर रही हैं, सो उन रावणकी प्रेयसी राक्षसियोंको (समझाकर) ऐसा करनेसे रोके" ॥ ८ ॥ |
| एवमुक्तोऽथ रामेण लक्ष्मणोऽगाद्विभीषणम् । <br> उवाच मृतकोपान्ते पतितं मृतकोपमम् ॥ ९ ॥ <br> शोकेन महताऽऽविष्टं सौमित्रिरिदमब्रवीत् । <br> यं शोचसि त्वं दुःखेन कोऽयं तव विभीषण ॥१०॥ | भगवान् रामके इस प्रकार कहनेपर श्रीलक्ष्मणजी मृतक रावणके समीप मरे हुएके समान पड़े हुए विभीषणके पास आये और उससे कहने लगे ॥९॥ इस समय विभीषण महान् शोकाकुल थे उनसे श्रीलक्ष्मणजी इस प्रकार बोले—“विभीषण ! जिसके लिये तुम |