भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १२ ]युद्धकाण्ड२९५
त्वं वास्य कतमः सृष्टेः पुरेदानीमतः परम् ।<br><br>यद्वत्तोयौघपतिताः सिकता यान्ति तद्वशाः ॥११॥<br><br>संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते तथा कालेन देहिनः ।<br><br>यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च ॥१२॥<br><br>एवं भूतेषु भूतानि प्रेरितानीशमायया ।<br><br>त्वं चेमे वयमन्ये च तुल्याः कालवशोद्भवाः ॥१३॥<br><br>जन्ममृत्यू यदा यस्मात्तदा तस्माद्भविष्यतः ।<br><br>ईश्वरः सर्वभूतानि भूतैः सृजति हन्त्यजः ॥१४॥<br><br>आत्मसृष्टैरस्वतन्त्रैर्निरपेक्षोऽपि बालवत् ।<br><br>देहेन देहिनो जीवा देहाद्देहोऽभिजायते ॥१५॥<br><br>बीजादेव यथा बीजं देहान्य इव शाश्वतः ।<br><br>देहिदेहविभागोऽयमविवेक्कृतः पुरा ॥१६॥<br><br>नानात्वं जन्म नाशश्च क्षयो वृद्धिः क्रिया फलम् ।<br><br>द्रष्टुराभान्त्यतद्धर्मा यथाग्नेर्दारुविक्रियाः ॥१७॥<br><br>त इमे देहसंयोगादात्मना भान्त्यसद्ग्रहात् ।<br><br>यथा यथा तथा चान्यद्ध्यायतोऽसत्सदाग्रहात् ॥१८॥<br><br>प्रसुप्तस्यानहम्भावात्तदा भाति न संसृतिः ।<br><br>जीवतोऽपि तथा तद्वद्विमुक्तस्यानहङ्कृतेः ॥१९॥<br><br>तस्मान्मायामनोधर्मं जह्यहम्ममताभ्रमम् ।<br><br>रामभद्रे भगवति मनो धेह्यात्मनीश्वरे ॥२०॥दुःखी होकर शोक कर रहे हो यह तुम्हारा कौन है ? ॥ १० ॥ तथा तुम भी अपने जन्मसे पूर्व, इस समय अथवा इससे आगे इसके क्या हो ? जिस प्रकार जलके प्रवाहमें पड़ी हुई बालू उसके अधीन आती-जाती रहती है, उसी प्रकार देहधारी प्राणी कालके वशीभूत हुए ही संयोग और वियोगको प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बीजोंसे अन्य बीज उत्पन्न होते और नष्ट भी हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌की मायासे प्रेरित समस्त प्राणी अन्य प्राणियोंसे उत्पन्न होते और मरते रहते हैं। तुम, हम, ये और अन्य सब भी समानभावसे कालके वशीभूत ही उत्पन्न हुए हैं ॥ ११–१३ ॥ जन्म और मृत्यु जिस समय जिससे होनेवाले हैं, उस समय उसीके द्वारा हो जायेंगे । अजन्मा ईश्वर ही, किसी प्रकारकी इच्छा न रहते हुए भी, बालकके समान ( केवल विनोदार्थ ) अपने रचे हुए अस्वतन्त्र प्राणियोंसे समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करता और नष्ट कर देता है। जीव देह-संयोगके कारण ही देही कहलाता है और देह अन्य ( माता-पिताके ) देहसे ही उत्पन्न होता है, जैसे कि एक बीजसे दूसरा बीज । सनातन आत्मा तो देहसे पृथक्-सा है । वास्तवमें तो यह देह और देहीका विभाग भी पहलेहीसे अविवेकके ही कारण है ॥ १४–१६ ॥ जिस प्रकार अग्निमें लकड़ीके विकार दिखायी देते हैं उसी प्रकार साक्षी आत्मामें भिन्नता जन्म, मरण, क्षय, वृद्धि, कर्म और कर्मफल आदि प्रतीत होते हैं, जो वास्तवमें उसके धर्म नहीं हैं ॥ १७ ॥ मिथ्या भ्रान्तिके कारण आत्माके साथ देहका संयोग माननेसे जिस प्रकार ये ( सब धर्म ) ( सत्यवत् ) भासते हैं वैसे ही सत्य ( आत्मा ) का निश्चय कर उसीका ध्यान करते रहनेसे ये असत्य प्रतीत होने लगते हैं ॥ १८ ॥ जिस प्रकार गाढ़ निद्रामें सोये हुए पुरुषको अहंकारका अभाव हो जानेसे प्रपञ्चकी प्रतीति नहीं होती उसी प्रकार अहंकारहीन मुक्त पुरुषको जीते हुए ही प्रपञ्चका भान नहीं होता ॥ १९ ॥<br><br>“अतः तुम अहंता-ममता एवं भ्रान्तिरूप मायामयं मनो-धर्मोंको त्यागो और इन्द्रियोंके बाह्य विषयोंसे अपने मनका .