भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२९६अध्यात्मरामायण[सर्ग १२

सर्वभूतात्मनि परे मायामानुषरूपिणि ।<br>बाह्येन्द्रियार्थसम्बन्धात्त्याजयित्वा मनः शनैः ॥२१॥<br><br>तत्र दोषान्दर्शयित्वा रामानन्दे नियोजय ।<br>देहबुद्ध्या भवेद्भ्राता पिता माता सुहृत्प्रियः ॥२२॥<br><br>विलक्षणं यदा देहाज्जानात्यात्मानमात्मना ।<br>तदा कः कस्य वा बन्धुर्भ्राता माता पिता सुहृत् ॥२३॥<br><br>मिथ्याज्ञानवशाज्जाता दारागारादयः सदा ।<br>शब्दादयश्च विषया विविधाश्चैव सम्पदः ॥२४॥<br><br>बलं कोशो भृत्यवर्गो राज्यं भूमिः सुतादयः ।<br>अज्ञानजत्वात्सर्वे ते क्षणसङ्गमभङ्गुराः ॥२५॥<br><br>अथोत्तिष्ठ हृदा रामं भावयन् भक्तिभावितम् ।<br>अनुवर्तस्व राज्यादि भुञ्जन्प्रारब्धमन्वहम् ॥२६॥<br><br>भूतं भविष्यदभजन्वर्तमानमथाचरन् ।<br>विहरस्व यथान्यायं भवदोषैर्न लिप्यसे ॥२७॥<br><br>आज्ञापयति रामस्त्ववां यद्भातृः साम्परायिकम् ।<br>तत्कुरुष्व यथाशास्त्रं रुदतीश्चापि योषितः ॥२८॥<br><br>निवारय महाबुद्धे लङ्कां गच्छन्तु माचिरम् ।<br><br>श्रुत्वा यथावद्वचनं लक्ष्मणस्य विभीषणः ॥२९॥<br><br>त्यक्त्वा शोकं च मोहं च रामपार्श्वमुपागमत् ।<br>विमृश्य बुद्ध्या धर्मज्ञो धर्मार्थसहितं वचः ॥३०॥<br><br>रामस्यैवानुवृत्त्यर्थमुत्तरं पर्यभाषत ।<br>नृशंसमनृतं क्रूरं त्यक्तधर्मव्रतं प्रभो ॥३१॥<br><br>नार्होऽस्मि देव संस्कर्र्तुं परदाराभिमर्शिनम् ।<br><br>श्रुत्वा तद्वचनं प्रीतो रामो वचनमब्रवीत् ॥३२॥<br><br>मरणान्तानि वैराणि निवृत्तं नः प्रयोजनम् ।<br>क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥३३॥ | सम्बन्ध छुटाकर उसे धीरे-धीरे अपने आत्मस्वरूप सर्वभूतान्तर्यामी परमेश्वर माया-मानवरूप भगवान् राममें स्थिर करो ॥२०–२१॥ (चित्तको) बाह्य विषयोंमें दोष दिखाकर उसे रामानन्दमें नियुक्त कर दो; ये माता, पिता, भ्राता, सुहृद् और स्नेहीजन तो देह-बुद्धिसे ही होते हैं ॥२२॥ जिस समय अपने विशुद्ध अन्तःकरणद्वारा मनुष्य आत्माको देहसे पृथक् जान लेता है उस समय कौन किसीका माता, पिता, भाई, बन्धु अथवा सुहृद् है ? ॥२३॥ ये स्त्री और गृह आदि, शब्दादि विषय, नाना प्रकारकी सम्पत्ति, बल, कोश, सेवकगण, राज्य, पृथिवी और पुत्रादि तो सदा मिथ्या ज्ञानके कारण ही उत्पन्न हुए हैं और अज्ञानजन्य होनेके कारण वे सब क्षणभङ्गुर हैं ॥२४-२५॥ अतः, अब खड़े हो जाओ और हृदयमें भक्ति-भावित भगवान् रामका स्मरण करते हुए निरन्तर प्रारब्ध भोगोंमें तत्पर हो राज्यादिका पालन करो ॥२६॥ भूत और भविष्यत्की चिन्ता न करते हुए तथा वर्तमानका अनुगमन करते हुए न्यायानुकूल आचरण करो । इससे तुम संसार-दोषसे लिप्त न होगे ॥२७॥ भगवान् राम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि अपने भाईका जो कुछ और्ध्वदेहिक कर्म हो वह सब शास्त्रानुसार करो और हे महाबुद्धे ! इन रोती हुई स्त्रियोंको यहाँसे अलग करो, ये सब लङ्कापुरीको जायँ । इसमें देरी न हो ।”<br><br>लक्ष्मणजीके यथार्थ वचन सुनकर विभीषण शोक और मोहको छोड़कर भगवान् रामके पास आये । धर्मज्ञ विभीषणने चित्तमें कुछ सोच-विचारकर श्रीरामचन्द्रजीका ही अनुवर्तन करनेके लिये यों धर्मार्थयुक्त उत्तर दिया—“प्रभो ! यह रावण बड़ा दुष्ट, मिथ्यावादी, क्रूर और समस्त धर्मव्रत आदिसे रहित था । हे देव ! इस परस्त्रीगामीका संस्कार करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ ।” उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर कहा—“भैया ! वैर तो मरनेतक ही होता है, सो अब हमारा काम हो चुका; अब तो यह जैसा तुम्हारा है वैसा ही मेरा है । अतः इसका संस्कार करो” ॥२८–३३॥

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