भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १२] युद्धकाण्ड २९९


| रत्नौघाद्विविधाद्धापि देवराज्याद्विशिष्यते ।<br>हतशत्रुं विजयिनं रामं पश्यामि सुस्थिरम् ॥६२॥<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मैथिली प्राह मारुतिम् ।<br>सर्वे सौम्या गुणाः सौम्य त्वय्येव परिनिष्ठिताः ॥६३॥<br>रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रं मामाज्ञापयतु राघवः ।<br>तथेति तां नमस्कृत्य ययौ द्रष्टुं रघूत्तमम् ॥६४॥<br><br>जानक्या भाषितं सर्वं रामस्याग्रे न्यवेदयत् ।<br>यन्निमित्तोऽयमारम्भः कर्मणां च फलोदयः ॥६५॥<br>तां देवीं शोकसन्तप्तां द्रष्टुमर्हसि मैथिलीम् ।<br>एवमुक्तो हनुमता रामो ज्ञानवतां वरः ॥६६॥<br>मायासीतां परित्यक्तुं जानकीमनले स्थिताम् ।<br>आदातुं मनसा ध्यात्वा रामः प्राह विभीषणम् ॥६७॥<br>गच्छ राजन् जनकजामानयाशु ममान्तिकम् ।<br>स्नातां विरजवस्त्राढ्यां सर्वाभरणभूषिताम् ॥६८॥<br><br>विभीषणोऽपि तच्छ्रुत्वा जगाम सहमारुतिः ।<br>राक्षसीभिः सुवृद्धाभिः स्नापयित्वा तु मैथिलीम् ॥६९॥<br>सर्वाभरणसम्पन्नामारोप्य शिबिकोत्तमे ।<br>याष्टीकैर्बहुभिर्गुप्तां कञ्चुकोष्णीषिभिः शुभाम् ॥७०॥<br>तां द्रष्टुमागताः सर्वे वानरा जनकात्मजाम् ।<br>तान्वारयन्तो बहवः सर्वतो वेत्रपाणयः ॥७१॥<br>कोलाहलं प्रकुर्वन्तो रामपार्श्वमुपाययुः ।<br>दृष्ट्वा तां शिबिकारूढां दूरादथ रघूत्तमः ॥७२॥<br>विभीषण किमर्थं ते वानरान्वारयन्ति हि ।<br>पश्यन्तु वानराः सर्वे मैथिलीं मातरं यथा ॥७३॥ | इस प्रकार कहनेपर वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी बोले— ॥ ६०-६१ ॥ "मातः ! मैं शत्रुके नष्ट होनेपर स्वस्थ चित्तसे विराजमान विजयशाली श्रीरामका दर्शन करता हूँ—यह मेरे लिये नाना प्रकारकी रत्नराशि और देवराज्यसे भी बढ़कर है" ॥ ६२ ॥ उनके ये वचन सुनकर मिथिलेशकुमारीने मारुतिसे कहा—"हे सौम्य ! जितने शुभ गुण हैं वे सब तुम्हींमें वर्तमान हैं ॥ ६३ ॥ अब, मैं रघुनाथजीके दर्शन करूँगी, वे शीघ्र ही मुझे भी आज्ञा दें।" तब हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह उन्हें प्रणाम कर श्रीरघनाथजीके दर्शनोंके लिये चल दिये ॥ ६४ ॥<br><br>(वहाँ पहुँचकर) हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीके आगे जानकीजीका सारा सम्भाषण कह सुनाया (और कहा—) "भगवन् ! जिनके लिये यह युद्धादि सम्पूर्ण कर्म आरम्भ हुए थे और जो उन समस्त कर्मोंकी फलरूपा हैं, अब उन शोकसन्तप्ता मिथिलेशनन्दिनी देवी जानकीको आप देखिये।" हनुमान्जीके इस प्रकार कहनेपर ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवान् रामने माया-सीताको त्यागनेके लिये और अग्निस्थिता जानकीको ग्रहण करनेके लिये मनसे विचार करते हुए विभीषणसे कहा—॥ ६५-६७ ॥ "राजन् ! तुम जाओ और तुरन्त ही जानकीको स्नान करा शुद्ध निर्मल वस्त्र पहना तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे सुसज्जित कर मेरे पास ले आओ ॥ ६८ ॥"<br><br>यह सुनकर विभीषण हनुमान्जीको साथ ले तुरन्त ही चले और शुभलक्षणा जानकीजीको बड़ी-बूढ़ी राक्षसीयोंद्वारा स्नान करा, सम्पूर्ण वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित होनेपर एक सुन्दर पालकीपर चढ़ाया और फिर उन्हें, जामा-पगड़ी आदिसे बने-ठने बहुत-से छड़ीदारोंसे सुरक्षित कर ले चले ॥ ६९-७० ॥ उस समय सीताजीको देखनेके लिये सब वानर दौड़ आये। उन्हें चारों ओरसे रोकते तथा (हटो-हटो कहकर) बड़ा कोलाहल करते बहुत-से छड़ीदार रामचन्द्रजीके पास ले आये। रघुनाथजीने दूरसे ही सीताजीको पालकीपर चढ़ी देखकर कहा—॥ ७१-७२ ॥ "विभीषण ! तुम्हारे ये छड़ीदार वानरोंको क्यों रोकते हैं? समस्त वानरगण जानकीका माताके समान दर्शन करें |