अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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पादचारेण साऽऽयातु जानकी मम सन्निधिम् । श्रुत्वा तद्रामवचनं शिबिकादवरुह्य सा ॥ ७४॥ पादचारेण शनकैरागता रामसन्निधिम् । रामोऽपि दृष्ट्वा तां मायासीतां कार्यार्थनिर्मिताम् ७५ अवाच्यवादान्बहुशः प्राह तां रघुनन्दनः । अमृष्यमाणा सा सीता वचनं राघवोदितम् ॥ ७६॥ लक्ष्मणं प्राह मे शीघ्रं प्रज्वालय हुताशनम् । चिक्षिासार्थं हि रामस्य लोकानां प्रत्ययाय च ॥ ७७॥ राघवस्य मतं ज्ञात्वा लक्षमणोऽपि तदैव हि । महाकाष्ठचयं कृत्वा ज्वालयित्वा हुताशनम् ॥ ७८॥ रामपार्श्वमुपागम्य तस्थौ तूष्णीमरिन्दमः । ततः सीता परिक्रम्य राघवं भक्तिसंयुता ॥ ७९॥ पश्यतां सर्वलोकानां देवराक्षसयोषिताम् । प्रणम्य देवताभ्यश्च ब्राह्मणेभ्यश्च मैथिली ॥ ८०॥ बद्धाञ्जलिपुटा चेदमुवाचाग्निसमीपगा । यथा मे हृदयं नित्यं नापसर्पति राघवात् ॥ ८१॥ तथा लोकस्य साक्षी मां सर्वतः पातु पावकः । एवमुक्त्वा तदा सीता परिक्रम्य हुताशनम् ॥ ८२॥ विवेश ज्वलनं दीप्तं निर्भयेन हृदा सती ॥ ८३॥
दृष्ट्वा ततो भूतगणाः ससिद्धाः सीतां महावह्निगतां भृशार्ताः । परस्परं प्राहुरहो स सीतां रामः श्रियं स्वां कथमत्यजज्ज्ञः ॥ ८४॥
॥७३॥ और जानकीजी मेरे पास पैदल चलकर आयें।" रामजीके ये वचन सुन श्रीसीताजी पालकीसे उतर पड़ीं और धीरे-धीरे पैदल ही श्रीरामचन्द्रजीके पास पहुँचीं । भगवान् रामने कार्यवश रची हुई माया-सीताको देखकर उनसे बहुत-सी न कहनेयोग्य (उनके चरित्रके विषयमें सन्देहयुक्त) बातें कहीं । श्रीरघुनाथजीद्वारा कहे हुए उन वाक्योंको सहन न कर सकनेके कारण सीताजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"भगवान् रामके विश्वासके लिये और लोगोंको निश्चय करानेके लिये तुम शीघ्र ही मेरे लिये अग्नि प्रज्वलित करो" ॥ ७४-७७ ॥ श्रीरघुनाथजीकी भी सम्मति समझकर शत्रुदमन लक्ष्मणजीने उसी समय बड़ा भारी काष्ठसमूह इकट्ठा किया और उसमें अग्नि प्रज्वलित कर चुपचाप रामजीके पास आकर खड़े हो गये। तब सीताजीने भक्तिपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की ॥ ७८-७९ ॥ और फिर श्रीमिथिलेशकुमारीने समस्त लोकों तथा देव और राक्षसोंकी स्त्रियोंके देखते-देखते देवता और ब्राह्मणोंको नमस्कार कर अग्निके पास जा हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा—"यदि मेरा हृदय श्रीरघुनाथजीको छोड़कर कभी अन्यत्र नहीं जाता तो समस्त लोकोंके साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें" ऐसा कह सतीशिरोमणि श्रीसीताजी अग्निकी परिक्रमा कर निर्भय-चित्तसे उस प्रज्वलित अग्निमें घुस गयीं ॥ ८०-८३ ॥
उस समय सीताजीको महा प्रचण्ड अग्निमें प्रविष्ट हुई देख समस्त सिद्ध और भूतगण अत्यन्त व्याकुल हो गये और आपसमें कहने लगे—"अहो ! सब कुछ जानते हुए भी श्रीरामचन्द्रजीने अपनी लक्ष्मी सीताजीको कैसे छोड़ दिया ?" ॥ ८४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥