भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १३.] युद्धकाण्ड ३०३


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नित्यानन्दं निर्विषयज्ञानमनादिम्।<br>मत्सेवार्थं मानुषभावं प्रतिपन्नं<br>वन्दे रामं मरकतवर्णं मधुरेशम् ॥१७॥स्वरूप और अनादि हैं तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मनुष्यरूप धारण किया है उन मरकतमणिके समान नीलवर्ण मथुरानाथ* भगवान् रामको प्रणाम करता हूँ ॥ १७॥
श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं<br>ब्राह्मं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः।<br>रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं<br>ध्यात्वा ध्याता पातकजालैर्विगतः स्यात्जो मनुष्य इच्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्याममूर्ति भगवान् रामका ध्यान करते हुए ब्रह्माजीके कहे हुए इस ब्रह्मज्ञान-विधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा वह ध्यानशील पुरुष सकल पापोंसे मुक्त हो जायगा" ॥ १८ ॥
श्रुत्वा स्तुतिं लोकगुरोर्विभावसुः<br>स्वाङ्के समादाय विदेहपुत्रिकाम्।<br>विभ्राजमानां विमलारुणद्युतिं<br>रक्ताम्बरां दिव्यविभूषणान्विताम्॥१९॥लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजीकी यह स्तुति सुन लोकसाक्षी अग्निदेवने अपनी गोदमें निर्मल अरुण कान्तिसे सुशोभित और लाल वस्त्र तथा दिव्य आभूषणोंसे विभूषित विदेहपुत्री जानकीजीको लिये (प्रकट होकर) शरणागत-दुःखहारी श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे रघुवीर ! पहले तपोवनमें मुझे सौंपी हुई देवी जानकीको अब ग्रहण कीजिये ॥ १९-२० ॥
प्रोवाच साक्षी जगतां रघूत्तमं<br>प्रपन्नसर्त्तिहरं हुताशनः।<br>गृहाण देवीं रघुनाथ जानकीं<br>पुरा त्वया मय्यवरोपितां वने ॥२०॥
विधाय मायाजनकात्मजां हरे<br>दशाननप्राणविनाशनाय च।<br>हतो दशास्यः सह पुत्रबान्धवै-<br>र्निराकृतोऽनेन भरो भुवः प्रभो ॥२१॥हे हरे ! रावणका प्राणहरण करनेके लिये आपने मायामयी सीता रचकर रावणको उसके पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डाला। हे प्रभो ! ऐसा करके आपने पृथिवीका भार उतार दिया ॥ २१ ॥
तिरोहिता सा प्रतिबिम्बरूपिणी<br>कृता यदर्थं कृतकृत्यतां गता।<br>ततोऽतिहृष्टां परिगृह्य जानकीं<br>रामः प्रहृष्टः प्रतिपूज्य पावकम् ॥२२॥वह प्रतिबिम्बरूपिणी मायासीता, जिस कार्यके लिये रची गयी थी उसे पूरा करके अब अदृश्य हो गयी है।" अग्निदेवके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसन्न हो उनका पूजन कर प्रसन्नवदना जानकीजीको ग्रहण किया ॥ २२ ॥
स्वाङ्के समावेश्य सदाऽनपायिनीं<br>श्रियं त्रिलोकीजननीं श्रियः पतिः।<br>दृष्ट्वाऽथ रामं जनकात्मजायुतं<br>श्रिया स्फुरन्तं सुरनायको मुदा।<br>भक्त्या गिरा गद्गदया समेत्य<br>कृताञ्जलिः स्तोतुमथोपचक्रमे ॥२३॥फिर लक्ष्मीपति भगवान् रामने अपनेसे कभी विलग न होनेवाली जगज्जननी जानकीको गोदमें बैठा लिया । उस समय जनकनन्दिनी सीताजीके सहित भगवान् रामको कान्तिसे सुशोभित देख देवराज इन्द्र अति प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर भक्ति-गद्गद वाणीसे स्तुति करने लगे ॥ २३ ॥
इन्द्र उवाच<br>भजेऽहं सदा राममिन्दीवराभं<br>भवारण्यदावानलाभाभिधानम् ।इन्द्र बोले—जो नीलकमलकी-सी आभावाले हैं, संसाररूप वनके लिये जिनका नाम दावानलके समान है, श्रीपार्वतीजी जिनके आनन्दरूपकहा हृदयमें ध्यान

* यहाँ भगवान् रामको 'मधुरानाथ' कहकर श्रीराम और कृष्णकी अभिन्नता प्रकट की है।