अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १३ |
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भवानीहृदा भावितानन्दरूपं<br>भवाभावहेतुं भवादिप्रपन्नम् ॥२४॥<br>सुरानीकदुःखौघनाशैकहेतुं<br>नराकारदेहं निराकारमीड्यम् ।<br>परेशं परानन्दरूपं वरेण्यं<br>हरिं राममीशं भजे भारनाशम् ॥२५॥<br>प्रपन्नाखिलानन्ददोहं प्रपन्नं<br>प्रपन्नार्त्तिनिःशेषनाशाभिधानम् ।<br>तपोयोगयोगीशभावाभिभाव्यं<br>कपीशादिमित्रं भजे राममित्रम् ॥२६॥<br>सदा भोगभाजां सुदूरे विभान्तं<br>सदा योगभाजामदूरे विभान्तम् ।<br>चिदानन्दकन्दं सदा राघवेशं<br>विदेहात्मजानन्दरूपं प्रपद्ये ॥२७॥<br>महायोगमायाविशेषाऽनुयुक्तो<br>विभासीश लीलानराकारवृत्तिः ।<br>त्वदानन्दलीलाकथापूर्णकर्णाः<br>सदानन्दरूपा भवन्तीह लोके ॥२८॥<br>अहं मानपानाभिमत्तमत्तो<br>न वेदाखिलेशाभिमानाभिमानः ।<br>इदानीं भवत्पादपद्मप्रसादात्-<br>त्रिलोकाधिपत्याभिमानो विनष्टः ॥२९॥<br>स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिरामं<br>धराभारभूतासुरानीकदावम् ।<br>शरच्चन्द्रवक्त्रं लसत्पद्मनेत्रं<br>दुरावारपारं भजे राघवेशम् ॥३०॥<br>सुराधीशनीलाभ्रनीलाङ्गकान्तिं<br>विराधादिरक्षोवधाल्लोकशान्तिम् ।<br>किरीटादिशोभं पुरारातिलाभं<br>भजे रामचन्द्रं रघूणामधीशम् ॥३१॥ | करती हैं, जो (जन्म-मरणरूप) संसारसे छुड़ानेवाले<br>हैं और शंकरादि देवोंके आश्रय हैं उन भगवान् रामको<br>मैं भजता हूँ ॥२४॥ जो देवमण्डलके दुःखसमूहका<br>नाश करनेके एकमात्र कारण हैं तथा जो मनुष्यरूपधारी,<br>आकारहीन और स्तुति किये जानेयोग्य हैं, पृथिवीका<br>भार उतारनेवाले उन परमेश्वर परानन्दरूप पूजनीय<br>भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥२५॥ जो शरणागतों-<br>को सब प्रकारका आनन्द देनेवाले और उनके आश्रय<br>हैं, जिनका नाम शरणागत भक्तोंके सम्पूर्ण दुःखों-<br>को दूर करनेवाला है, जिनका तप और योग<br>एवं बड़े-बड़े योगीश्वरोंकी भावनाओंद्वारा चिन्तन<br>किया जाता है तथा जो सुग्रीवादिके मित्र हैं, उन<br>मित्ररूप भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥२६॥ जो<br>भोगपरायण लोगोंसे सदा दूर रहते हैं और योगनिष्ठ<br>पुरुषोंके सदा समीप ही विराजते हैं, श्रीजानकीजीके<br>लिये आनन्दस्वरूप उन चिदानन्दघन श्रीरघुनाथजीको<br>मैं सर्वदा भजता हूँ ॥२७॥ हे भगवन् ! आप<br>अपनी महान् योगमायाके गुणोंसे युक्त होकर लीलासे<br>ही मनुष्यरूप प्रतीत हो रहे हैं । जिनके कर्ण आपकी<br>इन आनन्दमयी लीलाओंके कथामृतसे पूर्ण होते हैं वे<br>संसारमें नित्यानन्दरूप हो जाते हैं ॥२८॥ प्रभो !<br>मैं तो सम्मान और सोमपानके उन्मादसे मतवाला<br>हो रहा था, सर्वेश्वरताके अभिमानवश मैं अपने आगे<br>किसीको कुछ भी नहीं समझता था । अब आपके<br>चरणकमलोंकी कृपासे मेरा त्रिलोकाधिपतित्वका<br>अभिमान चूर हो गया ॥२९॥ जो चमचमाते हुए<br>रत्नजटित भुजबन्ध और हारोंसे सुशोभित हैं, पृथिवीके<br>भाररूप राक्षसोंके लिये दावानलके समान हैं,<br>जिनका शरच्चन्द्रके समान मुख और अति मनोहर<br>नेत्रकमल हैं तथा जिनका आदि-अन्त जानना अत्यन्त<br>कठिन है उन रघुनाथजीको मैं भजता हूँ ॥३०॥<br>जिनके शरीरकी इन्द्रनील मणि और मेघके समान<br>श्याम कान्ति है, जिन्होंने विराध आदि राक्षसों-<br>को मारकर सम्पूर्ण लोकोंमें शान्ति स्थापित की है<br>उन किरीटादिसे सुशोभित और श्रीमहादेवजीके परम-<br>धन रघुकुलेश्वर रामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ ॥३१॥