भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १३ ] युद्धकाण्ड ३०५


लसचन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे <br> समासीनमङ्के समाधाय सीताम् । <br> स्फुरद्धेमवर्णां तडित्पुञ्जभासां <br> भजे रामचन्द्रं निवृत्तार्तितन्द्रम् ॥३२॥जो तेजोमय सुवर्णके-से वर्णवाली और बिजलीके समान कान्तिमयी जानकीजीको गोदमें लिये करोड़ों चन्द्रमाओं-के समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान हैं उन निर्दुःख और आलस्यहीन भगवान् रामको मैं भजता हूँ ॥३२॥
ततः प्रोवाच भगवान्भव्याया सहितो भवः। <br> रामं कमलपत्राक्षं विमानस्थो नभःस्थले ॥३३॥तदनन्तर आकाशमें विमानपर बैठे हुए भवानी-सहित भगवान् शंकरने कमलदललोचन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥३३॥
आगमिष्याम्ययोध्यायां द्रष्टुं त्वां राज्यसत्कृतम्। <br> इदानीं पश्य पितरमस्य देहस्य राघव ॥३४॥"हे रघुनन्दन ! मैं आपको राज्या-भिषिक्त होते देखनेके लिये अयोध्यापुरीमें आऊँगा; इस समय आप अपने इस शरीरके पिता (दशरथ) का दर्शन कीजिये" ॥३४॥
ततोऽपश्यद्विमानस्थं रामो दशरथं पुरः। <br> ननाम शिरसा पादौ मुदा भक्त्या सहानुजः॥३५॥तब श्रीरामचन्द्रजीने अपने सामने विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथको देखा। (उन्हें देखते ही) उन्होंने प्रसन्न होकर भाई लक्ष्मणके सहित भक्तिपूर्वक चरणोंमें शिर रखकर प्रणाम किया ॥३५॥
आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय रामं दशरथोऽब्रवीत्। <br> तारितोऽस्मि त्वया वत्स संसाराद्दुःखसागरात् ३६दशरथजीने श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगा लिया और उनका शिर सूँघकर कहा—"बेटा ! तुमने मुझे संसाररूप दुःखसमुद्रसे पार कर दिया" ॥३६॥
इत्युक्त्वा पुनरालिङ्ग्य ययौ रामेण पूजितः। <br> रामोऽपि देवराजं तं दृष्ट्वा प्राह कृताञ्जलिम्॥३७॥ऐसा कह श्रीरामको फिर हृदयसे लगा और उनसे पूजित हो दशरथजी चले गये। <br> तब श्रीरामचन्द्रजीने देवराज इन्द्रको हाथ जोड़े खड़ा देखकर कहा—॥३७॥
मत्कृते निहतान्सङ्ख्ये वानरान्पतितान् भुवि । <br> जीवयाशु सुधावृष्ट्या सहस्राक्ष ममाज्ञया ॥३८॥"हे सहस्राक्ष ! मेरी आज्ञासे तुम अमृत बरसाकर मेरे लिये युद्धमें मरकर पृथिवीपर गिरे हुए वानरोंको तुरन्त जीवित कर दो" ॥३८॥
तथेत्यमृतवृष्ट्या तान् जीवयामास वानरान् । <br> ये ये मृता मृधे पूर्वं ते ते सुप्तोत्थिता इव । <br> पूर्ववद्बलिनो हृष्टा रामपार्श्वमुपाययुः ॥३९॥(ऐसा सुन देवराजने) 'बहुत अच्छा' कह अमृत बरसाकर उन सब वानरोंको जीवित कर दिया। जो-जो वानर पहले युद्धमें मारे गये थे वे सभी सोकर उठे हुएके समान पहलेकी भाँति ही बलवान् और प्रसन्न होकर भगवान् रामके पास चले आये॥३९॥
नोत्थिता राक्षसास्तत्र पीयूषस्पर्शनादपि ।किन्तु वहाँ (युद्धमें मरकर गिरे हुए) राक्षसगण अमृतका स्पर्श होनेपर भी नहीं उठे।*
विभीषणस्तु साष्टाङ्गं प्रणिपत्याब्रवीद्वचः ॥४०॥इसी समय विभीषणने साष्टांग प्रणाम करके कहा—॥४०॥
देव मामनुगृह्णीष्व मयि भक्तिर्यदा तव ।"भगवन् ! आपकी मुझपर अत्यन्त प्रीति है; अतः इतनी कृपा कीजिये कि आज श्रीसीताजीके

* अमृतका स्वाभाविक गुण जीवनदान करना है, अतः अमृतका स्पर्श होनेपर भी राक्षसोंके जीवित न होनेसे स्वभाव-विपर्ययका दोष आता है। परन्तु भगवदिच्छाका प्रभाव इतना प्रबल है कि उसके आगे कुछ भी असम्भव नहीं है; भगवान्‌की इच्छा न होनेसे अमृतका प्रभाव भी बाधित हो गया। इसके अतिरिक्त इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि साक्षात् भगवान् रामके द्वारा मारे जानेके कारण राक्षस मुक्त हो गये थे, इसलिये अमृतका संसर्ग भी उन्हें फिर जीवित न कर सका।