भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335
३०६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १३

मङ्गलस्नानमद्य त्वं कुरु सीतासमन्वितः ॥४१॥
अलङ्कृत्य सह भ्रात्रा श्वो गमिष्यामहे वयम् ।
विभीषणवचः श्रुत्वा प्रत्युवाच रघूत्तमः ॥४२॥
सुकुमारोऽतिभक्तो मे भरतो मामवेक्षते ।
जटावल्कलधारी स शब्दब्रह्मसमाहितः ॥४३॥
कथं तेन विना स्नानमलङ्कारादिकं मम ।
अतः सुग्रीवमुख्यांस्त्वं पूजयाशु विशेषतः ॥४४॥
पूजितेषु कपीन्द्रेषु पूजितोऽहं न संशयः ।
इत्युक्तो राघवेणाशु स्वर्णरत्नाम्बराणि च ॥४५॥
ववर्ष राक्षसश्रेष्ठो यथाकामं यथारुचि ।
ततस्तान्पूजितान्दृष्ट्वा रामो रत्नैश्च यूथपान् ॥४६॥
अभिनन्द्य यथान्यायं विससर्ज हरीश्वरान् ।
विभीषणसमानीतं पुष्पकं सूर्यवर्चसम् ॥४७॥
आरुरोह ततो रामस्तद्विमानमनुत्तमम् ।
अङ्के निधाय वैदेहीं लज्जमानां यशस्विनीम् ॥४८॥
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा विक्रान्तेन धनुष्मता ।
अब्रवीच्च विमानस्थः श्रीरामः सर्ववानरान् ॥४९॥
सुग्रीवं हरिराजं च अङ्गदं च विभीषणम् ।
मित्रकार्यं कृतं सर्वं भवद्भिः सह वानरैः ॥५०॥
अनुज्ञाता मया सर्वे यथेष्टं गन्तुमर्हथ ।
सुग्रीव प्रतियाह्याशु किष्किन्धां सर्वसैनिकैः ॥५१॥
स्वराज्ये वस लङ्कायां मम भक्तो विभीषण ।
न त्वां धर्षयितुं शक्ताः सेन्द्रा अपि दिवौकसः ॥५२॥
अयोध्यां गन्तुमिच्छामि राजधानीं पितुर्मम ।
एवमुक्तास्तु रामेण वानरास्ते महाबलाः ॥५३॥
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे राक्षसश्च विभीषणः ।
अयोध्यां गन्तुमिच्छामस्त्वया सह रघूत्तम ॥५४॥

सहित मंगल-स्नान कीजिये ॥ ४१ ॥ फिर कल भाई लक्ष्मणके सहित वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हो हम सब चलेंगे ।” विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ४२ ॥ “मेरा भाई भरत अति सुकुमार और मेरा भक्त है; वह जटा-वल्कल धारण किये ओंकारका चिन्तन करता हुआ मेरी बाट देखता होगा ॥ ४३ ॥ उससे मिले बिना मैं कैसे स्नान अथवा वस्त्राभूषण धारण कर सकता हूँ ? अतः अब तुम शीघ्र ही सुग्रीवादि वानरोंका ही विशेष सत्कार कर दो ॥ ४४ ॥ इन वानर-वीरोंका सत्कार होनेसे मेरा ही सत्कार होगा—इसमें सन्देह नहीं ।”

श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर राक्षसश्रेष्ठ विभीषणने वानरोंको उनकी इच्छा और रुचिके अनुसार बहुत-से रत्न और वस्त्रादि मुक्तहस्तसे दिये । इस प्रकार उन सब वानर-यूथपतियोंको रत्नादिसे सत्कृत देख श्रीरामचन्द्रजीने सबकी यथायोग्य बड़ाई की और उन्हें विदा किया । फिर वे, सकुचाती हुई यशस्विनी जानकीजीको गोदमें ले महापराक्रमी धनुर्धर भाई लक्ष्मणके सहित, विभीषणके लाये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अति उत्तम पुष्पक विमानपर आरूढ़ हुए । विमानपर बैठकर भगवान् रामने वानरराज सुग्रीव, अंगद, विभीषण और समस्त वानरोंसे कहा—“आप लोगोंने अन्य समस्त वानर-वीरोंके सहित, मित्रका जो कुछ कार्य होता है वह खूब निभाया है ॥ ४५-५० ॥ अब मेरी आज्ञानुसार आप अपने-अपने इच्छित स्थानोंको जाइये । सुग्रीव ! तुम अपने समस्त सैनिकोंके सहित शीघ्र ही किष्किन्धाको जाओ ॥ ५१ ॥ विभीषण ! तुम मेरी भक्तिमें तत्पर रहकर अपने राज्यपर लंकामें रहो । अब इन्द्रके सहित देवगण भी तुम्हारा बाल बाँका नहीं कर सकते ॥ ५२ ॥ अब मैं अपने पिताजीकी राजधानी अयोध्यापुरीको जाना चाहता हूँ ।”

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त महाबली वानरगण तथा राक्षसराज विभीषण हाथ जोड़कर बोले—“हे रघुश्रेष्ठ ! हम सब आपके साथ अयोध्या चलना चाहते हैं ॥ ५३-५४ ॥ हे प्रभो !