अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग १४ ] | युद्धकाण्ड | ३०७ |
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दृष्ट्वा त्वामभिषिक्तं तु कौसल्यामभिवाद्य च।
पश्चाद्गृणीमहे राज्यमनुज्ञां देहि नः प्रभो ॥५५॥
रामस्तथेति सुग्रीवं वानरैः सविभीषणः ।
पुष्पकं सहनूमांश्च शीघ्रमारोह साम्प्रतम् ॥५६॥
ततस्तु पुष्पकं दिव्यं सुग्रीवः सह सेनया ।
विभीषणश्च सामात्यः सर्वे चारुरुहुर्द्रुतम् ॥५७॥
तेष्वारूढेषु सर्वेषु कौबेरं परमासनम् ।
राघवेणान्वनुज्ञातमुत्पपात विहायसा ॥५८॥
बभौ तेन विमानेन हंसयुक्तेन भास्वता ।
प्रहृष्टश्च तदा रामश्चतुर्मुख इवापरः ॥५९॥
ततो बभौ भास्करविम्बतुल्यं
$\quad$कुबेरयानं तपसानुलब्धम् ।
रामेण शोभां नितरां प्रपेदे
$\quad$सीतासमेतेन सहानुजेन ॥६०॥
हम आपको राज्याभिषिक्त हुआ देखकर और माता कौसल्याकी वन्दना कर फिर अपना राज्य ग्रहण करेंगे; आप हमें (साथ चलनेकी) आज्ञा दीजिये' ॥ ५५॥ तब रामचन्द्रजीने कहा—"बहुत अच्छा सुग्रीव ! अब वानरोंके सहित तुम शीघ्र ही विभीषण और हनुमान्को साथ लेकर इस विमानपर चढ़ो' ॥ ५६॥ तब, सेनाके सहित सुग्रीव और मन्त्रियों सहित विभीषण—ये सभी बड़ी शीघ्रतासे दिव्य चिमा पुष्पकपर चढ़ गये ॥ ५७॥
उन सबके आरूढ़ हो जानेपर वह कुबेरका परम यान भगवान् रामकी आज्ञा पा आकाश-मार्गसे उड़ चला ॥ ५८॥ उस तेजस्वी विमानपर जाते हुए भगवान् राम बड़े प्रसन्न हुए और ऐसे सुशोभित हुए मानो दूसरे ब्रह्माजी हंसपर चढ़े जा रहे हों ॥५९॥ उस समय, वह तपस्यासे प्राप्त हुआ कुबेरका यान सूर्य-बिम्बके समान सुशोभित होने लगा तथा श्रीसीताजी और भाई लक्ष्मणके सहित भगवान् रामके कारण तो उसकी शोभा और भी अधिक बढ़ गयी ॥ ६०॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
चतुर्दश सर्ग
अयोध्या-यात्रा, भरद्वाज मुनिका आतिथ्य तथा भरत-मिलाप ।
श्रीमहादेव उवाच
पातयित्वा ततश्चक्षुः सर्वतो रघुनन्दनः ।
अब्रवीन्मैथिलीं सीतां रामः शशिनिभाननाम् ॥१॥
त्रिकूटशिखराग्रस्थां पश्य लङ्कां महाप्रभाम् ।
एतां रणभुवं पश्य मांसकर्दमपङ्किलाम् ॥ २ ॥
असुराणां प्लवङ्गानामत्र वैशसनं महत् ।
अत्र मे निहतः शेते रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३ ॥
कुम्भकर्णेन्द्रजिन्मुख्याः सर्वे चात्र निपातिताः ।
एष सेतुर्मया बद्धः सागरे सलिलाशये ॥ ४ ॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! तदनन्तर, सब ओर दृष्टि डालकर श्रीरघुनाथजीने मिथिलेशकुमारी चन्द्रमुखी सीताजीसे कहा—॥ १॥ "प्रिये ! त्रिकूट पर्वतकी चोटीपर बसी हुई यह परम प्रकाशमयी लंकापुरी देखो और यह मांसमयी कीचड़से भरी हुई रणभूमि देखो ॥ २ ॥ यहाँ राक्षसों और वानरोंका बड़ा भारी संहार हुआ है। यहीं मेरे हाथसे मरकर राक्षस-राज रावण गिरा था ॥ ३॥ और यहीं कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् आदि समस्त राक्षस-वीर मारे गये हैं। यह मैंने जलपूर्ण समुद्रपर पुल बाँधा था ॥ ४ ॥ देखो,