भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337
३०८अध्यात्मरामायण[सर्ग १४
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतच्च दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः ।<br>सेतुबन्धमिति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ॥ ५ ॥<br>एतत्पवित्रं परमं दर्शनात्पातकापहम् ।<br>अत्र रामेश्वरो देवो मया शम्भुः प्रतिष्ठितः ॥ ६ ॥<br>अत्र मां शरणं प्राप्तो मन्त्रिभिश्च विभीषणः ।<br>एषा सुग्रीवनगरी किष्किन्धा चित्रकानना ॥ ७ ॥इस विशाल समुद्रपर यह सेतुबन्ध नामसे विख्यात तीर्थ दिखायी देता है, जो तीनों लोकोंसे पूजनीय है ॥ ५ ॥ यह अत्यन्त पवित्र है और दर्शनमात्रसे ही सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है । यहाँ मैंने श्रीरामेश्वर महादेवकी स्थापना की है ॥ ६ ॥ यहाँ मन्त्रियोंके सहित विभीषण मेरी शरणमें आया था । (और देखो) यह विचित्र उपवनोंवाली सुग्रीवकी राजधानी किष्किन्धापुरी है" ॥ ७ ॥
तत्र रामाज्ञया ताराप्रमुखा हरियोषितः ।<br>आनयामास सुग्रीवः सीतायाः प्रियकाम्यया ॥८॥<br>ताभिः सहोत्थितं शीघ्रं विमानं प्रेक्ष्य राघवः ।<br>प्राह चाद्रिमृष्यमूकं पश्य वाल्यत्र मे हतः ॥ ९ ॥<br>एषा पञ्चवटी नाम राक्षसा यत्र मे हताः ।<br>अगस्त्यस्य सुतीक्ष्णस्य पश्याश्रमपदे शुभे ॥१०॥<br>एते ते तापसाः सर्वे दृश्यन्ते वरवर्णिनि ।<br>असौ शैलवरो देवि चित्रकूटः प्रकाशते ॥११॥<br>अत्र मां कैकयीपुत्रः प्रसादयितुमागतः ।<br>भरद्वाजाश्रमं पश्य दृश्यते यमुनात्तटे ॥१२॥<br>एषा भागीरथी गङ्गा दृश्यते लोकपावनी ।<br>एषा सा दृश्यते सीते सरयूर्यूपमालिनी ॥१३॥<br>एषा सा दृश्यतेऽयोध्या प्रणामं कुरु भामिनि ।<br>एवं क्रमेण सम्प्राप्तो भरद्वाजाश्रमं हरिः ॥१४॥किष्किन्धामें पहुँचनेपर भगवान् रामकी आज्ञासे सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये सुग्रीव अपनी तारा आदि स्त्रियोंको ले आये ॥८॥ जब रघुनाथजीने विमानको तुरन्त ही उन सबको लेकर भी चलते देखा तो वे (फिर सीताजीसे) कहने लगे—"यह ऋष्यमूक-पर्वत देखो, यहाँ मैंने वालीको मारा था ॥९॥ इधर, पञ्चवटी है जहाँ मैंने (खर-दूषणादि) राक्षसोंका संहार किया था । देखो, ये मुनिवर अगस्त्य और सुतीक्ष्णके अति पवित्र आश्रम हैं ॥१०॥ हे सुन्दर वर्णवाली ! देखो, ये वे सब तपस्वीगण दिखायी दे रहे हैं और हे देवि ! यह पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूट दीख रहा है ॥ ११ ॥ यहीं मुझे मनानेके लिये कैकेयीके पुत्र भरत आये थे; और देखो, वह यमुनाजीके तटपर भरद्वाज मुनिका आश्रम दिखलायी दे रहा है ॥१२॥ ये त्रिलोकपावनी भागीरथी गङ्गाजी दीख रही हैं और हे सीते ! (सूर्यवंशी राजाओंके किये हुए यज्ञोंके) यूपों (यज्ञस्तम्भों) से युक्त यह सरयू नदी दिखायी दे रही है ॥ १३ ॥ हे सुन्दरि ! देखो, वह अयोध्यापुरी दीख रही है, उसे प्रणाम करो।" इस प्रकार भगवान् राम क्रमसे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचे ॥ १४ ॥
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां रघुनन्दनः ।<br>भरद्वाजं मुनिं दृष्ट्वा ववन्दे सानुजः प्रभुः ॥१५॥<br>पप्रच्छ मुनिमासीनं विनयेन रघूत्तमः ।<br>शृणोषि कच्चिद्भरतः कुशल्यास्ते सहानुजः ॥१६॥<br>सुभिक्षा वर्ततेऽयोध्या जीवन्ति च हि मातरः ।श्रीरघुनाथजीने चौदहवें वर्षके समाप्त होनेपर पञ्चमी तिथिको मुनिवर भरद्वाजके दर्शन कर उन्हें भाई लक्ष्मणसहित प्रणाम किया ॥ १५ ॥ फिर आश्रममें विराजमान मुनिवरसे रघूश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने अति नम्रतापूर्वक पूछा—"आपने कुछ सुना है, भाई शत्रुघ्नसहित भरत कुशलसे हैं न ? ॥ १६ ॥ अयोध्यामें सुकाल तो है ? और हमारी माताएँ अभी जीवित हैं न ?"
अध्यात्म रामायण · पृष्ठ 337, कुल 423 में से · BharatKosha