भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १४ ]
युद्धकाण्ड
३०९


मूल श्लोक

श्रुत्वा रामस्य वचनं भरद्वाजः प्रहृष्टधीः ॥ १७॥
प्राह सर्वे कुशलिनो भरतस्तु महामनाः।
फलमूलकृताहारो जटावल्कलधारकः ॥ १८॥
पादुके सकलं न्यस्य राज्यं त्वां सुप्रतीक्षते ।
यद्यत्कृतं त्वया कर्म दण्डके रघुनन्दन ॥ १९॥
राक्षसानां विनाशं च सीताहरणपूर्वकम्।
सर्वं ज्ञातं मया राम तपसा ते प्रसादतः ॥ २०॥
त्वं ब्रह्म परमं साक्षादादिमध्यान्तवर्जितः ।
त्वमग्रे सलिलं सृष्ट्वा तत्र सुप्तोऽसि भूतकृत् ॥ २१॥
नारायणोऽसि विश्वात्मन्नराणामन्तरात्मकः।
त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ २२॥
अतस्त्वं जगतामीशः सर्वलोकनमस्र्कृतः ।
त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शेषोऽयं लक्ष्मणाभिधः ॥ २३॥
आत्मना सृजसीदं त्वमात्मन्येवात्ममायया ।
न सज्जसे नभोवत्त्वं चिच्छक्त्या सर्वसाक्षिकः ॥ २४॥
बहिरन्तश्च भूतानां त्वमेव रघुनन्दन ।
पूर्णोऽपि मूढदृष्टीनां विच्छिन्न इव लक्ष्यसे ॥ २५॥
जगत्त्वं जगदाधारस्त्वमेव परिपालकः ।
त्वमेव सर्वभूतानां भोक्ता भोज्यं जगत्पते ॥ २६॥
दृश्यते श्रूयते यद्यत्स्मर्यते वा रघूत्तम ।
त्वमेव सर्वमखिलं त्वद्भिन्नान्यन्न किञ्चन ॥ २७॥
माया सृजति लोकांश्च स्वगुणैरहमादिभिः ।
त्वच्छक्तिप्रेरिता राम तस्मात्त्वय्युपचर्यते ॥ २८॥
यथा चुम्बकसान्निध्याच्चलन्त्येवायआयदयः ।
जडास्तथा त्वया दृष्टा माया सृजति वै जगत् ॥ २९॥
देहद्वयमदेहस्य तव विश्वं रिरक्षिषोः ।


हिन्दी अनुवाद

भगवान् रामके ये वचन सुनकर भरद्वाज मुनिने प्रसन्न होकर कहा—"आपके यहाँ सब सकुशल हैं। महामना भरतजी तो जटा-वल्कल धारण किये फल-मूलादिसे निर्वाह करते हुए राज्यका सारा भार आपकी पादुकाओंको सौंपकर आपकीही प्रतीक्षा कर रहे हैं। हे रघुनन्दन ! आपने दण्डकारण्यमें जो-जो कार्य किये हैं तथा सीता-हरण होनेपर जैसे-जैसे राक्षसोंका वध किया है वह सब आपकी कृपासे मैंने तपोबलसे जान लिया है ॥ १७–२० ॥

आप आदि, अन्त आर मध्यसे रहित साक्षात् परब्रह्म हैं। आप समस्त भूतोंको रचनेवाले हैं। आपने सबसे पहले जल रचकर उसपर शयन किया था। हे विश्वात्मन् ! आप समस्त मनुष्योंके अन्तरात्मा हैं, अतः आप नारायण हैं। आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजी सम्पूर्ण लोकोंके पितामह हैं ॥ २१–२२ ॥

अतः आप समस्त लोकोंसे वन्दित और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आप साक्षात् विष्णुभगवान् हैं, जानकीजी लक्ष्मी हैं और ये लक्ष्मणजी शेषनाग हैं ॥ २३॥

आप अधिष्ठान-रूपसे अपने भीतर ही अपनी मायाके द्वारा स्वयं अपने-आपसे ही इस सम्पूर्ण जगत्को रचते हैं, किन्तु आकाशके समान किसीसे भी लिप्त नहीं होते। आप अपनी चित्-शक्तिसे सबके साक्षी हैं ॥ २४॥

हे रघुनन्दन ! समस्त प्राणियोंके भीतर और बाहर आप ही व्याप्त हैं, इस प्रकार पूर्ण होनेपर भी आप मूढ़-बुद्धियोंको परिच्छिन्न (एकदेशी) से दिखायी देते हैं ॥ २५॥

हे जगत्पते ! आप ही जगत्, जगत्के आधार और उसका पालन करनेवाले हैं; तथा आप ही समस्त प्राणियोंके (कालरूपसे) भोक्ता और (अन्नरूपसे) भोज्य हैं ॥ २६॥

हे रघुश्रेष्ठ ! जो कुछ भी दिखायी देता है तथा जो कुछ सुना और स्मरण किया जाता है वह सब आप ही हैं; आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ २७ ॥

हे राम ! आपकी शक्तिसे प्रेरित होकर ही माया अपने अहङ्कारादि गुणोंसे सम्पूर्ण लोकोंको रचती है, इसलिये इन सबकी रचनाका आपहीमें आरोप किया जाता है ॥ २८ ॥

जिसप्रकार चुम्बककी सन्निधिसे लोहा आदि जड पदार्थ भी चलायमान हो जाते हैं उसी प्रकार आपकी दृष्टि पड़नेसे ही माया सम्पूर्ण जगत्की रचना करती है ॥ २९ ॥

विश्वकी रक्षा करनेके इच्छुक आप