अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग १४ ] युद्धकाण्ड ३११
तथेति हनुमांस्तत्र मानुषं वपुरास्थितः ॥४४॥
नन्दिग्रामं ययौ तूर्णं वायुवेगेन मारुतिः ।
गरुत्मानिव वेगेन जिघृक्षन् भुजगोत्तमम् ॥४५॥
शृङ्गवेरपुरं प्राप्य गुहमासाद्य मारुतिः ।
उवाच मधुरं वाक्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥४६॥
रामो दाशरथिः श्रीमान्सखा ते सह सीतया ।
सलक्ष्मणस्त्वां धर्मात्मा क्षेमी कुशलमब्रवीत् ॥४७॥
अनुज्ञातोऽद्य मुनिना भरद्वाजेन राघवः ।
आगमिष्यति तं देवं द्रक्ष्यसि त्वं रघूत्तमम् ॥४८॥
तब हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह मनुष्य-शरीर धारण कर तुरन्त ही वायुवेगसे नन्दिग्रामको चले, मानो किसी श्रेष्ठ सर्पको पकड़नेके लिये गरुडजी जाते हों ॥ ४०-४५ ॥ शृंगवेरपुर पहुँचनेपर श्रीमारुतिने गुहके पास जाकर अति प्रसन्नचित्तसे मीठी बोलीमें कहा—॥४६॥ "तुम्हारे मित्र परम धार्मिक एवं क्षेम-युक्त दशरथकुमार श्रीमान् रामचन्द्रजीने सीता और लक्ष्मणके सहित अपनी कुशल कही है ॥ ४७॥ आज मुनिवर भरद्वाजकी आज्ञा लेकर श्रीरघुनाथजी आयेंगे तब तुम्हें भी उन रघुश्रेष्ठ भगवान् रामका दर्शन होगा" ॥ ४८ ॥
एवमुक्त्वा महातेजाः सम्प्रहृष्टतनूरुहम् ।
उत्पपात महावेगो वायुवेगेन मारुतिः ॥४९॥
सोऽपश्यद्रामतीर्थं च सरयूं च महानदीम् ।
तामतिक्रम्य हनुमान्नन्दिग्रामं ययौ मुदा ॥५०॥
क्रोशमात्रे त्वयोध्यायाश्चीरकृष्णाजिनाम्बरम् ।
ददर्श भरतं दीनं कृशमाश्रमवासिनम् ॥५१॥
मलपङ्कविधिग्धाङ्गं जटिलं वल्कलाम्बरम् ।
फलमूलकृताहारं रामचिन्तापरायणम् ॥५२॥
पादुके ते पुरस्कृत्य शासयन्तं वसुन्धराम् ।
मन्त्रिभिः पौरमुख्यैश्च काषायाम्बरधारिभिः ॥५३॥
धृतदेहं मूर्तिमन्तं साक्षाद्धर्ममिव स्थितम् ।
उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान्मारुतात्मजः ॥५४॥
जिसे हर्षसे रोमाञ्च हो रहा था ऐसे गुहसे इसप्रकार कह महातेजस्वी और अत्यन्त वेगशाली हनुमान्जी फिर वायुवेगसे उड़े ॥४९॥ (कुछ दूर जानेपर) उन्होंने राम-तीर्थ (अयोध्या) और महानदी सरयूके दर्शन किये । उसे भी पारकर हनुमान्जी अति प्रसन्न-चित्तसे नन्दि-ग्रामको चले ॥ ५० ॥ अयोध्यासे एक कोशकी दूरीपर भरतजीको अति दीन और दुर्बल अवस्थामें चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्म धारण किये, आश्रममें निवास करते, शरीरमें भस्म रमाये, जटाजूट और वल्कलवस्त्र धारण किये, फल-मूलादि भोजनकर भगवान् रामके ध्यानमें तत्पर हुए, रामचन्द्रजीकी उन दोनों पादुकाओं-को निवेदनकर पृथिवीका शासन करते तथा काषाय-वस्त्रधारी मन्त्रियों और मुख्य-मुख्य पुरवासियोंसे घिरे हुए साक्षात् मूर्त्तिमान् धर्मके समान देखकर पवनकुमार हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले—॥ ५१-५४ ॥
यं त्वं चिन्तयसे रामं तापसं दण्डके स्थितम् ।
अनुशोचसि काकुत्स्थः स त्वां कुशलमब्रवीत् ॥५५॥
प्रियमाख्यामि ते देव शोकं त्यज सुदारुणम् ।
अस्मिन्मुहूर्त्ते भ्रात्रा त्वं रामेण सह सङ्गतः ॥५६॥
समरे रावणं हत्वा रामः सीतामवाप्य च ।
"हे भरतजी ! जिन दण्डकारण्यवासी तपो-निष्ठ भगवान् रामका आप चिन्तन करते हैं तथा जिनके लिये आप इतना अनुताप करते हैं उन ककुत्स्थनन्दन रामने तुम्हें अपनी कुशल कहला भेजी है ॥ ५५ ॥ हे देव ! आप यह दारुण शोक त्यागिये । मैं आपको अति प्रिय समाचार सुनाता हूँ । आप इसी मुहूर्त्तमें अपने भाई रामसे मिलेंगे ॥ ५६ ॥ भगवान् राम युद्धमें रावणको मारकर और सीताजीको प्राप्तकर सफल-मनोरथ