भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३१२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १४

उपयाति समृद्धार्थः ससीतः सहलक्ष्मणः ॥५७॥ हो सीता और लक्ष्मणजीके सहित आ रहे हैं" ॥५७॥

एवमुक्तो महातेजा भरतो हर्षमूर्च्छितः । पपात भुवि चाश्वस्थः कैकयीप्रियनन्दनः ॥५८॥ श्रीहनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीके प्रिय पुत्र महातेजस्वी भरतजी हर्षसे मूर्च्छित हो अपनी सुध-बुध भुला पृथिवीपर गिर पड़े ॥५८॥ (फिर

आलिङ्ग्य भरतः शीघ्रं मारुतिं प्रियवादिनम् । आनन्दजैरश्रुजलैः सिषेच भरतः कपिम् ॥५९॥ सँभलकर उठनेके अनन्तर) भरतजीने तुरन्त ही प्रियवादी हनुमान्‌जीको हृदयसे लगा लिया और आनन्दके कारण उमड़े हुए अश्रुजलसे उन वानरश्रेष्ठको सींचने लगे ॥५९॥ (और बोले—) "भैया ! तुम कोई

देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः । प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् ६० गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं वरम् । सर्वाभरणसम्पन्ना मुग्धाः कन्यास्तु षोडश ॥६१॥ देवता हो या मनुष्य हो, जो दया करके यहाँ आये हो ? हे सौम्य ! इस प्रिय समाचारके सुनानेके बदले में तुम्हें एक लक्ष गौ, अच्छे-अच्छे सौ गाँव और समस्त आभूषणोंसे युक्त परमसुन्दरी सोलह कन्याएँ देता हूँ" ॥६०-६१॥ ऐसा कह श्रीभरतजीने हनुमान्-

एवमुक्त्वा पुनः प्राह भरतो मारुतात्मजम् । बहूनीमानि वर्षाणि गतस्य सुमहद्वनम् ॥६२॥ शृणोम्यहं प्रीतिकरं मम नाथस्य कीर्तनम् । कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मे ॥६३॥ एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि । राघवस्य हरीणां च कथमासीत्समागमः ॥६४॥ तत्त्वमाख्याहि भद्रं ते विश्वसेयं वचस्तव । जीसे फिर कहा—"आज, भयंकर वनमें जानेके कितने ही वर्ष बीतनेपर मैं अपने प्रभुका यह प्रिय समाचार सुन रहा हूँ । आज मुझे यह कल्याणमयी लौकिक कहावत बहुत ठीक मालूम होती है कि 'जीवित रहनेपर सौ वर्षमें भी मनुष्यको आनन्द मिल सकता है।' तुम्हारा शुभ हो, तुम यह सच-सच बताओ कि श्रीरघुनाथजीके साथ वानरोंका समागम कैसे हुआ ? जिससे मैं तुम्हारे वचनका पूर्ण विश्वास करूँ ।"

एवमुक्तोऽथ हनुमान् भरतेन महात्मना ॥६५॥ आचचक्षेऽथ रामस्य चरितं कृत्स्नशः क्रमात् । श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतो मारुतात्मजात् ॥६६॥ महात्मा भरतजीके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्‌जीने श्रीरामचन्द्रजीका क्रमशः सम्पूर्ण चरित्र सुना दिया । मारुतिसे वह चरित्र सुनकर श्रीभरतजीको अत्यन्त आनन्द हुआ ॥६२—६६॥ और उन्होंने अति प्रसन्न

आज्ञापयच्छत्रुघ्नं मुदा युक्तं मुदान्वितः । दैवतानि च यावन्ति नगरे रघुनन्दन ॥६७॥ नानोपहारबलिभिः पूजयन्तु महाधियः । होकर आनन्दमग्न शत्रुघ्नजीको आज्ञा दी कि "हे रघुनन्दन ! नगरमें जितने देवता हैं महाबुद्धि पण्डितजन उन सबका नाना प्रकारकी भेंट और बलि आदि देकर पूजन करें ।

सूता वैतालिकाश्चैव वन्दिनः स्तुतिपाठकाः ॥६८॥ वारमुख्याश्च शतशो निर्यान्त्वद्यैव सङ्घशः । सूत, वैतालिक, स्तुति-गान करनेवाले वन्दीजन और मुख्य मुख्य वाराङ्गनाएँ आज ही सैकड़ोंकी संख्यामें टोली बनाकर नगरके बाहर निकलें ।

राजदारास्तथाऽमात्याः सेना हस्त्यश्वपत्तयः॥६९॥ ब्राह्मणाश्च तथा पौरा राजानो ये समागताः । निर्यान्तु राघवस्याद्य द्रष्टुं शशिनिभाननम् ॥७०॥ इनके अतिरिक्त राजमहिलाएँ, मन्त्रिगण, हाथी-घोड़े और पदाति आदि सेना, ब्राह्मणलोग, पुरवासी और यहाँ आये हुए समस्त राजालोग भी श्रीरघुनाथजीका मुखचन्द्र निहारनेके लिये नगरके बाहर चलें ॥६७-७०॥

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