अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग १४] युद्धकाण्ड ३१३
भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नपरिचोदिताः ।
अलञ्चक्रुश्च नगरीं मुक्कारत्नमयोञ्ज्वलैः ॥७१॥
तोरणैश्च पताकाभिर्विचित्राभिरनेकधा ।
अलङ्कुर्वन्ति वेश्मानि नानाबलिविचक्षणाः ॥७२॥
निर्यान्ति वृन्दशः सर्वे रामदर्शनलालसाः ।
हयानां शतसाहस्रं गजानामयुतं तथा ॥७३॥
रथानां दशसाहस्रं स्वर्णसूत्रविभूषितम् ।
पारमेष्ठ्यान्युपादाय द्रव्याण्युच्चावचानि च ॥७४॥
ततस्तु शिविकारूढा निर्ययु राजयोषितः ।
भरतः पादुके न्यस्य शिरस्येव कृताञ्जलिः ॥७५॥
शत्रुघ्नसहितो रामं पादचारेण निर्ययौ ।
तदैव दृश्यते दूराद्विमानं चन्द्रसन्निभम् ॥७६॥
पुष्पकं सूर्यसङ्काशं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।
एतस्मिन् भ्रातरौ वीरौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
सुग्रीवश्च कपिश्रेष्ठो मन्त्रिभिश्च विभीषणः ।
दृश्यते पश्यत जना इत्याह पवनात्मजः ॥७८॥
ततो हर्षसमुद्भूतो निःस्वनो दिवमस्पृशत् ।
स्त्रीबालयुववृद्धानां रामोऽयमिति कीर्तनात् ॥७९॥
रथकुञ्जरवाजिस्था अवतीर्य महीं गताः ।
ददृशुस्ते विमानस्थं जनाः सोममिवाम्बरे ॥८०॥
प्राञ्जलिर्भरतो भूत्वा प्रहृष्टो राघवोन्मुखः ।
ततो विमानाग्रगतं भरतो राघवं मुदा ॥८१॥
ववन्दे प्रणतो रामं मेरुस्थमिव भास्करम् ।
ततो रामाभ्यनुज्ञातं विमानमपतद्भुवि ॥८२॥
आरोपितो विमानं तद्भरतः सानुजस्तदा ।
राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत् ॥८३॥
भरतजीके वचन सुनकर शत्रुघ्नजीकी प्रेरणासे नाना प्रकारकी रचनाओंमें कुशल पुरवासियोंने अपने घरोंको सजाना आरम्भ किया तथा अनेक प्रकारके उज्ज्वल मोतियों और रत्नोंकी बन्दनवारोंसे एवं चित्र-विचित्र पताकाओंसे अयोध्यापुरीको सजा दिया ॥ ७१-७२ ॥ तब, भगवान् रामके दर्शनोंकी लालसासे सब लोग अनेकों टोलियाँ बनाकर उनकी भेंटके लिये एक लाख घोड़े, दश सहस्र हाथी और सुनहरी बागडोरोंसे विभूषित दश सहस्र रथ आदि बहुतसी ऐश्वर्यसूचक छोटी-बड़ी वस्तुएँ लेकर नगरके बाहर निकलने लगे॥७३-७४॥ उनके पीछे पालकीमें चढ़कर राजमहिलाएँ चलीं और फिर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी शिरपर भगवान्की पादुकाएँ रखकर हाथ जोड़े हुए पैरों-पैरों चले । इसी समय दूरहीसे ब्रह्माजीका मनोनिर्मित चन्द्रमाके समान कान्तिमान् और सूर्यके समान तेजस्वी पुष्पक विमान दिखायी दिया । उसे देखकर श्रीहनुमान्जीने कहा—"अरे लोगो ! देखो, इसी विमानमें श्रीजानकीजीके सहित दोनों वीर भ्राता राम और लक्ष्मण तथा कपिश्रेष्ठ सुग्रीव और मन्त्रियोंके सहित विभीषण दिखायी दे रहे हैं" ॥ ७५-७८ ॥ तब तो 'राम ये हैं, राम ये हैं' ऐसा कहनेसे स्त्री, बालक, युवा और वृद्धोंका हर्षके कारण ऐसा शब्द हुआ कि जिससे आकाश गूँज उठा ॥ ७९ ॥ जो लोग रथ, हाथी और घोड़ोंपर चढ़े हुए थे वे उतरकर पृथिवीपर खड़े हो गये । उस समय वे सभी लोग विमानपर चढ़े हुए भगवान् रामको आकाशमें चन्द्रमाके समान देखने लगे ॥ ८० ॥
फिर प्रसन्नचित्त भरतजीने विमानपर बैठे हुए श्रीरघुनाथजीके सम्मुख हो उन्हें सुमेरु पर्वतपर प्रकट हुए सूर्यके समान अति विनीतभावसे हर्षपूर्वक प्रणाम किया । तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विमान पृथिवीपर उतरा ॥ ८१-८२ ॥ तदनन्तर भगवान् रामने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको भी विमानपर चढ़ा लिया; रामचन्द्रजीके निकट पहुँचनेपर भरतजीने अति आनन्दित हो उन्हें फिर प्रणाम किया ॥ ८३ ॥ तब बहुत दिनोंमें