अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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समुत्थाप्य चिराद्दृष्टं भरतं रघुनन्दनः ।
भ्रातरं स्वाङ्कमारोप्य मुदा तं परिषस्वजे ॥८४॥
ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं नाम कीर्तयन् ।
अभ्यवादयत प्रीतो भरतः प्रेमविह्वलः ॥८५॥
सुग्रीवं जाम्बवन्तं च युवराजं तथाऽङ्गदम् ।
मैन्दद्विविदनीलांश्च ऋषभं चैव सस्वजे ॥८६॥
सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम् ।
शरभं पनसंचैव भरतः परिषस्वजे ॥८७॥
सर्वे ते मानुषं रूपं कृत्वा भरतमादृताः ।
पप्रच्छुः कुशलं सौम्याः प्रहृष्टाश्च प्लवङ्गमाः ॥८८॥
ततः सुग्रीवमालिङ्ग्य भरतः प्राह भक्तितः ।
त्वत्सहायेन रामस्य जयोऽभूद्रावणो हतः ॥८९॥
त्वमस्माकं चतुर्णां तु भ्राता सुग्रीव पञ्चमः ।
शत्रुघ्नश्च तदा राममभिवाद्य सलक्ष्मणम् ॥९०॥
सीतायाश्चरणौ पश्चाद्ववन्दे विनयान्वितः ।
रामो मातरमसाद्य विवर्णां शोकविह्वलाम् ॥९१॥
जग्राह प्रणतः पादौ मनो मातुः प्रसादयन् ।
कैकेयीं च सुमित्रां च ननामेतरमातरौ ॥९२॥
भरतः पादुके ते तु राघवस्य सुपूजिते ।
योजयामास रामस्य पादयोर्भक्तिसंयुतः ॥९३॥
राज्यमेतन्न्यासभूतं मया निर्यातीतं तव ।
अद्य मे सफलं जन्म फलितो मे मनोरथः ॥९४॥
यत्पश्यामि समायातमयोध्यां त्वामहं प्रभो ।
कोष्ठागारं बलं कोशं कृतं दशगुणं मया ॥९५॥
स्वत्तेजसा जगन्नाथ पालयस्व पुरं स्वकम् ।
इति ब्रुवाणं भरतं दृष्ट्वा सर्वे कपीश्वराः ॥९६॥
मुमुचुर्नेत्रजं तोयं प्रशंसुर्मुदान्विताः ।
ततो रामः प्रहृष्टात्मा भरतं स्वाङ्कगं मुदा ॥९७॥
ययौ तेन विमानेन भरतस्याश्रमं तदा ।
अवरुह्य तदा रामो विमानाग्र्यान्महीतलेम् ॥९८॥
देखे हुए भाई भरतको रघुनाथजीने तुरन्त ही उठाकर प्रसन्नतासे गोदमें लेकर आलिंगन किया ॥८४॥ फिर प्रेमसे विह्वल हुए भरतजीने लक्ष्मणजीसे मिलकर श्रीसीताजीको अपना नाम उच्चारण करते हुए प्रीतिपूर्वक प्रणाम किया ॥८५॥ तत्पश्चात् भरतजीने सुग्रीव, जाम्बवान्, युवराज अंगद, मैन्द, द्विविद, नील और ऋषभको तथा सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनसको भी हृदयसे लगाया ॥८६-८७॥ इस प्रकार भरतजीसे सत्कार पाकर प्रसन्न हुए उन सौम्य वानरों-ने मनुष्यरूप धारणकर उनकी कुशल पूछी ॥८८॥ तब भरतजीने सुग्रीवको हृदयसे लगाकर अति प्रेम-पूर्वक कहा— "सुग्रीव! तुम्हारी सहायतासे ही श्रीराम-चन्द्रजीकी विजय हुई और रावण मारा गया; अतः हम चारोंके तुम पाँचवें भाई हो।" तदनन्तर शत्रुघ्नजीने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी-को प्रणामकर अति विनीत भावसे सीताजीके चरणोंकी वन्दना की। फिर श्रीरामचन्द्रजीने शोकके कारण अति व्याकुल और कृश हुई माता कौसल्याके पास जाकर अति विनीत भावसे उनके चरण छुए और उनके चित्तको प्रसन्न किया तथा अपनी विमाता कैकेयी, और सुमित्राको भी नमस्कार किया ॥८९-९२॥ तदुपरान्त भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीकी भली प्रकार पूजा की हुई पादुकाओंको भक्तिपूर्वक उनके चरणोंमें पहना दिया ॥९३॥ (और कहा—) "प्रभो! मुझे धरोहररूपसे सौंपे हुए आपके इस राज्यको मैं फिर आपहीको सौंपता हूँ; आज, मैं आपको अयोध्यामें आया हुआ देखता हूँ—इससे मेरा जन्म सफल हो गया और मेरी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं। हे जगन्नाथ! आपके प्रतापसे मैंने अन्न-भण्डार, सेना और कोशादि पहलेसे दशगुने कर दिये हैं। अब आप अपने नगरका स्वयं पालन कीजिये।" भरतजीको इस प्रकार कहते देख सभी मुख्य-मुख्य वानर हर्षसे आँसू गिराते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे।
तब श्रीरामचन्द्रजी अति हर्षपूर्वक भरतजीको गोदमें लिये उसी विमानपर चढ़े हुए भरतजीके आश्रमको गये। वहाँ विमानश्रेष्ठ पुष्पकसे नीचे पृथिवीपर उतरकर