अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१५
अब्रवीत्पुष्पकं देवो गच्छ वैश्रवणं वह ।
अनुगच्छानुजानामि कुबेरं धनपालकम् ॥९९॥
रामो वसिष्ठस्य गुरोः पदाम्बुजं
नत्वा यथा देवगुरोः शतक्रतुः ।
दत्त्वा महार्हासनमुत्तमं गुरो-
रुपाविवेशाथ गुरोः समीपतः ॥१००॥
भगवान् रामने उससे कहा—"जाओ, मैं आज्ञा देता हूँ—अब, तुम धनपति कुबेरका अनुसरण करते हुए उन्हींको वहन करो" ॥९४-९९॥ फिर, इन्द्र जैसे बृहस्पतिजीकी वन्दना करते हैं वैसे ही, श्रीरामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठजीके चरणकमलोंमें प्रणाम कर और उन्हें एक अति सुन्दर बहुमूल्य आसन दे स्वयं भी उन्हींके पास बैठ गये ॥१००॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥
पञ्चदश सर्ग
श्रीराम-राज्याभिषेक ।
श्रीमहादेव उवाच
ततस्तु कैकयीपुत्रो भरतो भक्तिसंयुतः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ॥ १ ॥
माता मे सत्कृता राम दत्तं राज्यं त्वया मम ।
ददामि तत्ते च पुनर्यथा त्वमददा मम ॥ २ ॥
इत्युक्त्वा पादयोर्भक्त्या साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।
बहुधा प्रार्थयामास कैकेय्या गुरुणा सह ॥ ३ ॥
तथेति प्रतिजग्राह भरताद्राज्यमीश्वरः ।
मायामाश्रित्य सकलां नरचेष्टामुपागतः ॥ ४ ॥
स्वराज्यानुभवो यस्य सुखज्ञानैकरूपिणः ।
निरस्तातिशयानन्दरूपिणः परमात्मनः ॥ ५ ॥
मानुषेण तु राज्येन किं तस्य जगदीक्षितुः ।
यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण त्रिलोकी नश्यति क्षणात् ॥ ६ ॥
यस्यानुग्रहमात्रेण भवन्त्याखण्डलश्रियः ।
लीलासृष्टमहासृष्टेः कियदंतद्रमापतेः ॥ ७ ॥
तथापि भजतां नित्यं कामपूरविधित्सया ।
लीलामानुषदेहेन सर्वमप्यनुवर्तते ॥ ८ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! फिर कैकेयीपुत्र भरतजीने शीश झुकाये अञ्जलि बाँधकर अति भक्तिपूर्वक ज्येष्ठ भ्राता रामजीसे कहा—॥१॥ "हे राम ! आपने मुझे राज्य दिया था, इससे मेरी माताका सत्कार तो हो चुका । अब, जैसे आपने मुझे दिया था वैसे ही मैं फिर आपहीको उसे सौंपता हूँ" ॥ २ ॥ ऐसा कह उन्होंने चरणोंमें भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम कर (राज्य स्वीकार करनेके लिये) कैकेयी और गुरुजीके सहित बहुत कुछ प्रार्थना की ॥३॥ तब अपनी मायाको आश्रय कर सब प्रकारकी मनुष्य-लीलाएँ करनेमें प्रवृत्त हुए भगवान् रामने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीसे राज्य ले लिया ॥४॥ जिन्हें हर समय स्वर्गीय राज्यका अनुभव होता है उन एकमात्र सुख और ज्ञानस्वरूप, समस्त विषयानन्दोंसे रहित परमानन्दमूर्ति परमात्मा जगदीश्वरको तुच्छ मानवी राज्यसे क्या काम है ? जिनके भ्रुकुटिविलासमात्रसे तीनों लोक एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ॥५-६॥ जिनकी कृपासे इन्द्रकी राज्यलक्ष्मी प्राप्त होती है तथा जिन्होंने लीलासे ही यह महान् सृष्टि रची है उन लक्ष्मीपतिके लिये यह (अयोध्याका राज्य) कितना है ? ॥७॥ तथापि अपने भक्तोंकी कामनाओंको सदैव पूर्ण करनेके लिये वे माया-मानवदेहसे सर्वदा सभी कुछ अभिनय करते हैं ॥८॥