भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३१६अध्यात्मरामायण[सर्ग १५

| ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणः श्मश्रुकृन्तकः ।<br>सम्भाराश्चाभिषेकार्थमानीता राघवस्य हि ॥९॥<br>पूर्वं तु भरते स्नाते लक्ष्मणे च महात्मनि ।<br>सुग्रीवे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥१०॥<br>विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः ।<br>महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥११॥<br>प्रतिकर्म च रामस्य लक्ष्मणश्च महामतिः ।<br>कारयामास भरतः सीताया राजयोषितः ॥१२॥<br>महार्हवस्त्राभरणैरलंञ्चक्रुः सुमध्यमाम् ।<br>ततो वानरपत्नीनां सर्वासामेव शोभना ॥१३॥<br>अकारयत कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ।<br>ततः स्यन्दनमादाय शत्रुघ्नवचनात्सुधीः ॥१४॥<br>सुमन्त्रः सूर्यसङ्काशं योजयित्वाऽग्रतः स्थितः ।<br>आरुरोह रथं रामः सत्यधर्मपरायणः ॥१५॥<br>सुग्रीवो युवराजश्च हनुमांश्च विभीषणः ।<br>स्नात्वा दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥१६॥<br>राममन्वीयुरग्रे च रथाश्वगजवाहनाः ।<br>सुग्रीवपत्न्यः सीता च ययुर्यानैः पुरं महत् ॥१७॥<br>वज्रपाणिर्यथा देवैर्हरिताश्वरथे स्थितः ।<br>प्रययौ रथमास्थाय तथा रामो महत्पुरम् ॥१८॥<br>सारथ्यं भरतश्चक्रे रत्नदण्डं महाद्युतिः ।<br>श्वेतातपत्रं शत्रुघ्नो लक्ष्मणो व्यजनं दधे ॥१९॥<br>चामरं च समीपस्थो न्यवीजयदरिन्दमः ।<br>शशिप्रकाशं त्वपरं जग्राहासुरनायकः ॥२०॥<br>दिविजैः सिद्धसङ्घैश्च ऋषिभिर्दिव्यदर्शनैः ।<br>स्तूयमानस्य रामस्य शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥२१॥ | तब शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे कुशल क्षौरकार (नाई)<br>बुलाया गया और रघुनाथजीके अभिषेकके लिये सामग्री<br>इकट्ठी की गयी ॥९॥ पहले भरतजीने और फिर महात्मा<br>लक्ष्मणजीने स्नान किया तदुपरान्त वानरराज सुग्रीव<br>और राक्षसराज विभीषण नहाये ॥१०॥ फिर जटा-<br>जूटके कट जानेपर श्रीरघुनाथजीने स्नान किया और<br>रङ्ग-बिरङ्गी मालाओं, अङ्गरागों तथा बहुमूल्य वस्त्रोंसे<br>सुसज्जित हो वे अपनी कान्तिसे देदीप्यमान होकर<br>विराजमान हुए ॥११॥ महामति लक्ष्मण और भरतने<br>श्रीरामचन्द्रजीको विभूषित कराया और राज-महिलाओं-<br>ने सीताजीका शृङ्गार किया ॥१२॥ उन्होंने उस<br>सुन्दरीको नाना प्रकारके बहुमूल्य वस्त्र और आभूषणों-<br>से सुसज्जित किया । तदनन्तर पुत्रवत्सला शोभामयी<br>कौसल्याजीने अति प्रसन्न होकर समस्त वानरपत्नियों-<br>का भी शृङ्गार कराया ।<br><br>इसी समय शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे बुद्धिमान् सुमन्त्रने<br>सूर्यके समान तेजस्वी रथ जोड़कर सामने ला खड़ा<br>किया । तब सत्यधर्मपरायण भगवान् राम उस रथपर<br>चढ़े ॥१३–१५॥ उस समय सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्<br>और विभीषण स्नानादि कर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे<br>सुसज्जित हो रथ, घोड़े और हाथी आदि वाहनोंपर<br>चढ़कर श्रीरामचन्द्रजीके आगे-पीछे चले तथा सुग्रीवकी<br>पत्नियां और सीताजी सुन्दर पालकियोंपर बैठकर अति<br>विशाल अयोध्यापुरीको चलीं ॥१६–१७॥ जिस प्रकार<br>हरितवर्ण घोड़ोंके रथमें बैठकर वज्रपाणि इन्द्र देवताओं<br>के साथ चलते हैं उसी प्रकार भगवान् राम रथपर चढ़-<br>कर महापुरी अयोध्याको चले ॥१८॥ तब महातेजस्वी<br>भरतजीने सारथी होकर रथ चलाया, शत्रुघ्नजीने<br>रत्नजटित दण्डयुक्त श्वेत छत्र लिया और लक्ष्मणजीने<br>व्यजन (पंखा) धारण किया ॥१९॥ एक ओर पास ही<br>स्थित शत्रुदमन सुग्रीवने और दूसरी ओर राक्षस-<br>राज विभीषणने चन्द्रमाके समान कान्तियुक्त चँवर<br>डुलाया ॥२०॥ उस समय भगवान् रामकी स्तुति<br>करते हुए दिव्यदर्शन देवताओं, सिद्धसमूहों और<br>ऋषियोंकी सुमधुर ध्वनि सुनायी देने लगी ॥२१॥ |