भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१७


मानुषं रूपमास्थाय वानरा गजवाहनाः ।<br>भेरीशङ्खनिनादैश्च मृदङ्गपणवानकैः ॥२२॥<br>प्रययौ राघवश्रेष्ठस्तां पुरीं समलङ्कृताम् ।<br>ददृशुस्ते समायन्तं राघवं पुरवासिनः ॥२३॥वानरगण मनुष्यरूप धारणकर हाथियोंपर सवार हुए। इस प्रकार रघुश्रेष्ठ भगवान् राम सहनाई, शङ्ख, मृदङ्ग, ताशे और नगाड़े आदि बाजोंके घोषके साथ भली प्रकार सजायी हुई अयोध्यापुरीमें गये। उस समय पुरवासी लोग श्रीरघुनाथजीको आते हुए देखने लगे ॥२२-२३॥
दूर्वादलश्यामर्तनुं महार्ह-<br>किरीटरत्नाभरणाश्रिताङ्गम् ।<br>आरक्तकञ्जायतलोचनान्तं<br>दृष्ट्वा ययुर्मोदमतीव पुण्याः ॥२४॥<br>विचित्ररत्नान्वितसूत्रनद्ध-<br>पीताम्बरं पीनभुजान्तरालम् ।<br>अनर्घ्यमुक्ताफलदिव्यहारै-<br>र्विरोचमानं रघुनन्दनं प्रजाः ॥२५॥<br>सुग्रीवमुख्यैर्हरिभिः प्रशान्तै-<br>र्निषेव्यमाणं रवितुल्यभासम् ।<br>कस्तूरिकाचन्दनलिप्तगात्रं<br>निषीतकल्पद्रुमपुष्पमालम् ॥२६॥वे महाभाग पुरजन दूर्वादलके समान श्याम-शरीर, महामूल्य मुकुट और रत्नजटित आभूषणोंसे विभूषित, कमलके समान कुछ अरुणवर्ण विशाल नयनोंवाले, रङ्ग-बिरङ्गे रत्नोंसे युक्त (सुनहरी) तारके कामका पीताम्बर धारण किये, विशाल वक्षःस्थलवाले, बहुमूल्य मोतियोंके दिव्य हारोंसे सुशोभित, सुग्रीवादि शान्तस्वभाव वानरोंसे सेवित, सूर्यके समान तेजस्वी, समस्त शरीरमें कस्तूरी और चन्दनका लेप किये तथा कल्पवृक्षके पुष्पोंकी माला धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखकर परम आनन्दको प्राप्त हुए ॥२४-२६॥
श्रुत्वा स्त्रियो राममुपागतं मुदा<br>प्रहर्षवेगोत्कलिताननश्रियः ।<br>अपास्य सर्वं गृहकार्यमाहितं<br>हर्म्याणि चैवारुरुहुः स्वलङ्कृताः॥२७॥जब स्त्रियोंने भगवान् रामको आते सुना तो प्रसन्नतासे महान् हर्षके कारण उनके मुखकी कान्ति उज्ज्वल हो गयी और वे जिस गृहकार्यमें लगी हुई थीं उसे छोड़ भली प्रकार सज-धजकर अपने-अपने घरोंके ऊपर चढ़ गयीं ॥२७॥
दृष्ट्वा हरिं सर्वदृगुत्सवाकृतिं<br>पुष्पैः किरन्त्यः सितशोभिताननाः ।<br>दृग्भिः पुनर्नेत्रमनोरसायनं<br>स्वानन्दमूर्तिं मनसाभिरेभिरे ॥२८॥सुमधुर मुसकानसे जिनका मुख मनोहर हो रहा है वे पुरनारियाँ, सबके नयनानन्दस्वरूप भगवान् रामको देखकर, फूलोंकी वर्षा करने लगीं और फिर उन्होंने, नेत्र और मनको प्रिय लगनेवाली उस आनन्दमयी मूर्तिको नेत्रोंद्वारा हृदयमें ले जाकर, मनसे आलिङ्गन किया ॥२८॥
रामः स्मितस्निग्धदृशा प्रजास्तथा<br>पश्यन्प्रजानाथ इवापरः प्रभुः ।<br>शनैर्जगामाथ पितुः स्वलङ्कृतं<br>गृहं महेन्द्रालयसन्निभं हरिः ॥२९॥इस प्रकार विष्णुरूप भगवान् राम दूसरे प्रजापतिके समान मुसकानयुक्त मनोहर दृष्टिसे अपनी प्रजाको देखते हुए धीरे-धीरे भली प्रकार सजाये हुए अपने पिताके इन्द्रभवनके समान महलमें गये ॥२९॥
प्रविश्य वेश्मान्तरसंस्थितो मुदा<br>रामो ववन्दे चरणौ स्वमातुः ।<br>क्रमेण सर्वाः पितृयोषितः प्रभु-<br>र्ननाम भक्त्या रघुवंशकेतुः ॥३०॥राजमहलके भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसन्नचित्तसे अपनी माता (कौसल्या) के चरणोंकी वन्दना की और फिर उन रघुवंशशिरोमणि प्रभुने क्रमशः सभी विमाताओंको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया ॥३०॥