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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

३१२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १४

उपयाति समृद्धार्थः ससीतः सहलक्ष्मणः ॥५७॥ हो सीता और लक्ष्मणजीके सहित आ रहे हैं" ॥५७॥

एवमुक्तो महातेजा भरतो हर्षमूर्च्छितः । पपात भुवि चाश्वस्थः कैकयीप्रियनन्दनः ॥५८॥ श्रीहनुमान्‌जीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीके प्रिय पुत्र महातेजस्वी भरतजी हर्षसे मूर्च्छित हो अपनी सुध-बुध भुला पृथिवीपर गिर पड़े ॥५८॥ (फिर

आलिङ्ग्य भरतः शीघ्रं मारुतिं प्रियवादिनम् । आनन्दजैरश्रुजलैः सिषेच भरतः कपिम् ॥५९॥ सँभलकर उठनेके अनन्तर) भरतजीने तुरन्त ही प्रियवादी हनुमान्‌जीको हृदयसे लगा लिया और आनन्दके कारण उमड़े हुए अश्रुजलसे उन वानरश्रेष्ठको सींचने लगे ॥५९॥ (और बोले—) "भैया ! तुम कोई

देवो वा मानुषो वा त्वमनुक्रोशादिहागतः । प्रियाख्यानस्य ते सौम्य ददामि ब्रुवतः प्रियम् ६० गवां शतसहस्रं च ग्रामाणां च शतं वरम् । सर्वाभरणसम्पन्ना मुग्धाः कन्यास्तु षोडश ॥६१॥ देवता हो या मनुष्य हो, जो दया करके यहाँ आये हो ? हे सौम्य ! इस प्रिय समाचारके सुनानेके बदले में तुम्हें एक लक्ष गौ, अच्छे-अच्छे सौ गाँव और समस्त आभूषणोंसे युक्त परमसुन्दरी सोलह कन्याएँ देता हूँ" ॥६०-६१॥ ऐसा कह श्रीभरतजीने हनुमान्-

एवमुक्त्वा पुनः प्राह भरतो मारुतात्मजम् । बहूनीमानि वर्षाणि गतस्य सुमहद्वनम् ॥६२॥ शृणोम्यहं प्रीतिकरं मम नाथस्य कीर्तनम् । कल्याणी बत गाथेयं लौकिकी प्रतिभाति मे ॥६३॥ एति जीवन्तमानन्दो नरं वर्षशतादपि । राघवस्य हरीणां च कथमासीत्समागमः ॥६४॥ तत्त्वमाख्याहि भद्रं ते विश्वसेयं वचस्तव । जीसे फिर कहा—"आज, भयंकर वनमें जानेके कितने ही वर्ष बीतनेपर मैं अपने प्रभुका यह प्रिय समाचार सुन रहा हूँ । आज मुझे यह कल्याणमयी लौकिक कहावत बहुत ठीक मालूम होती है कि 'जीवित रहनेपर सौ वर्षमें भी मनुष्यको आनन्द मिल सकता है।' तुम्हारा शुभ हो, तुम यह सच-सच बताओ कि श्रीरघुनाथजीके साथ वानरोंका समागम कैसे हुआ ? जिससे मैं तुम्हारे वचनका पूर्ण विश्वास करूँ ।"

एवमुक्तोऽथ हनुमान् भरतेन महात्मना ॥६५॥ आचचक्षेऽथ रामस्य चरितं कृत्स्नशः क्रमात् । श्रुत्वा तु परमानन्दं भरतो मारुतात्मजात् ॥६६॥ महात्मा भरतजीके इस प्रकार कहनेपर हनुमान्‌जीने श्रीरामचन्द्रजीका क्रमशः सम्पूर्ण चरित्र सुना दिया । मारुतिसे वह चरित्र सुनकर श्रीभरतजीको अत्यन्त आनन्द हुआ ॥६२—६६॥ और उन्होंने अति प्रसन्न

आज्ञापयच्छत्रुघ्नं मुदा युक्तं मुदान्वितः । दैवतानि च यावन्ति नगरे रघुनन्दन ॥६७॥ नानोपहारबलिभिः पूजयन्तु महाधियः । होकर आनन्दमग्न शत्रुघ्नजीको आज्ञा दी कि "हे रघुनन्दन ! नगरमें जितने देवता हैं महाबुद्धि पण्डितजन उन सबका नाना प्रकारकी भेंट और बलि आदि देकर पूजन करें ।

सूता वैतालिकाश्चैव वन्दिनः स्तुतिपाठकाः ॥६८॥ वारमुख्याश्च शतशो निर्यान्त्वद्यैव सङ्घशः । सूत, वैतालिक, स्तुति-गान करनेवाले वन्दीजन और मुख्य मुख्य वाराङ्गनाएँ आज ही सैकड़ोंकी संख्यामें टोली बनाकर नगरके बाहर निकलें ।

राजदारास्तथाऽमात्याः सेना हस्त्यश्वपत्तयः॥६९॥ ब्राह्मणाश्च तथा पौरा राजानो ये समागताः । निर्यान्तु राघवस्याद्य द्रष्टुं शशिनिभाननम् ॥७०॥ इनके अतिरिक्त राजमहिलाएँ, मन्त्रिगण, हाथी-घोड़े और पदाति आदि सेना, ब्राह्मणलोग, पुरवासी और यहाँ आये हुए समस्त राजालोग भी श्रीरघुनाथजीका मुखचन्द्र निहारनेके लिये नगरके बाहर चलें ॥६७-७०॥

सर्ग १४] युद्धकाण्ड ३१३


भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नपरिचोदिताः ।
अलञ्चक्रुश्च नगरीं मुक्कारत्नमयोञ्ज्वलैः ॥७१॥
तोरणैश्च पताकाभिर्विचित्राभिरनेकधा ।
अलङ्कुर्वन्ति वेश्मानि नानाबलिविचक्षणाः ॥७२॥
निर्यान्ति वृन्दशः सर्वे रामदर्शनलालसाः ।
हयानां शतसाहस्रं गजानामयुतं तथा ॥७३॥
रथानां दशसाहस्रं स्वर्णसूत्रविभूषितम् ।
पारमेष्ठ्यान्युपादाय द्रव्याण्युच्चावचानि च ॥७४॥
ततस्तु शिविकारूढा निर्ययु राजयोषितः ।
भरतः पादुके न्यस्य शिरस्येव कृताञ्जलिः ॥७५॥
शत्रुघ्नसहितो रामं पादचारेण निर्ययौ ।
तदैव दृश्यते दूराद्विमानं चन्द्रसन्निभम् ॥७६॥
पुष्पकं सूर्यसङ्काशं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।
एतस्मिन् भ्रातरौ वीरौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ ॥७७॥
सुग्रीवश्च कपिश्रेष्ठो मन्त्रिभिश्च विभीषणः ।
दृश्यते पश्यत जना इत्याह पवनात्मजः ॥७८॥
ततो हर्षसमुद्भूतो निःस्वनो दिवमस्पृशत् ।
स्त्रीबालयुववृद्धानां रामोऽयमिति कीर्तनात् ॥७९॥
रथकुञ्जरवाजिस्था अवतीर्य महीं गताः ।
ददृशुस्ते विमानस्थं जनाः सोममिवाम्बरे ॥८०॥

प्राञ्जलिर्भरतो भूत्वा प्रहृष्टो राघवोन्मुखः ।
ततो विमानाग्रगतं भरतो राघवं मुदा ॥८१॥
ववन्दे प्रणतो रामं मेरुस्थमिव भास्करम् ।
ततो रामाभ्यनुज्ञातं विमानमपतद्भुवि ॥८२॥
आरोपितो विमानं तद्भरतः सानुजस्तदा ।
राममासाद्य मुदितः पुनरेवाभ्यवादयत् ॥८३॥


भरतजीके वचन सुनकर शत्रुघ्नजीकी प्रेरणासे नाना प्रकारकी रचनाओंमें कुशल पुरवासियोंने अपने घरोंको सजाना आरम्भ किया तथा अनेक प्रकारके उज्ज्वल मोतियों और रत्नोंकी बन्दनवारोंसे एवं चित्र-विचित्र पताकाओंसे अयोध्यापुरीको सजा दिया ॥ ७१-७२ ॥ तब, भगवान् रामके दर्शनोंकी लालसासे सब लोग अनेकों टोलियाँ बनाकर उनकी भेंटके लिये एक लाख घोड़े, दश सहस्र हाथी और सुनहरी बागडोरोंसे विभूषित दश सहस्र रथ आदि बहुतसी ऐश्वर्यसूचक छोटी-बड़ी वस्तुएँ लेकर नगरके बाहर निकलने लगे॥७३-७४॥ उनके पीछे पालकीमें चढ़कर राजमहिलाएँ चलीं और फिर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी शिरपर भगवान्‌की पादुकाएँ रखकर हाथ जोड़े हुए पैरों-पैरों चले । इसी समय दूरहीसे ब्रह्माजीका मनोनिर्मित चन्द्रमाके समान कान्तिमान् और सूर्यके समान तेजस्वी पुष्पक विमान दिखायी दिया । उसे देखकर श्रीहनुमान्‌जीने कहा—"अरे लोगो ! देखो, इसी विमानमें श्रीजानकीजीके सहित दोनों वीर भ्राता राम और लक्ष्मण तथा कपिश्रेष्ठ सुग्रीव और मन्त्रियोंके सहित विभीषण दिखायी दे रहे हैं" ॥ ७५-७८ ॥ तब तो 'राम ये हैं, राम ये हैं' ऐसा कहनेसे स्त्री, बालक, युवा और वृद्धोंका हर्षके कारण ऐसा शब्द हुआ कि जिससे आकाश गूँज उठा ॥ ७९ ॥ जो लोग रथ, हाथी और घोड़ोंपर चढ़े हुए थे वे उतरकर पृथिवीपर खड़े हो गये । उस समय वे सभी लोग विमानपर चढ़े हुए भगवान् रामको आकाशमें चन्द्रमाके समान देखने लगे ॥ ८० ॥

फिर प्रसन्नचित्त भरतजीने विमानपर बैठे हुए श्रीरघुनाथजीके सम्मुख हो उन्हें सुमेरु पर्वतपर प्रकट हुए सूर्यके समान अति विनीतभावसे हर्षपूर्वक प्रणाम किया । तब श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे विमान पृथिवीपर उतरा ॥ ८१-८२ ॥ तदनन्तर भगवान् रामने भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजीको भी विमानपर चढ़ा लिया; रामचन्द्रजीके निकट पहुँचनेपर भरतजीने अति आनन्दित हो उन्हें फिर प्रणाम किया ॥ ८३ ॥ तब बहुत दिनोंमें

३१४ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १८


समुत्थाप्य चिराद्दृष्टं भरतं रघुनन्दनः ।
भ्रातरं स्वाङ्कमारोप्य मुदा तं परिषस्वजे ॥८४॥
ततो लक्ष्मणमासाद्य वैदेहीं नाम कीर्तयन् ।
अभ्यवादयत प्रीतो भरतः प्रेमविह्वलः ॥८५॥
सुग्रीवं जाम्बवन्तं च युवराजं तथाऽङ्गदम् ।
मैन्दद्विविदनीलांश्च ऋषभं चैव सस्वजे ॥८६॥
सुषेणं च नलं चैव गवाक्षं गन्धमादनम् ।
शरभं पनसंचैव भरतः परिषस्वजे ॥८७॥
सर्वे ते मानुषं रूपं कृत्वा भरतमादृताः ।
पप्रच्छुः कुशलं सौम्याः प्रहृष्टाश्च प्लवङ्गमाः ॥८८॥
ततः सुग्रीवमालिङ्ग्य भरतः प्राह भक्तितः ।
त्वत्सहायेन रामस्य जयोऽभूद्रावणो हतः ॥८९॥
त्वमस्माकं चतुर्णां तु भ्राता सुग्रीव पञ्चमः ।
शत्रुघ्नश्च तदा राममभिवाद्य सलक्ष्मणम् ॥९०॥
सीतायाश्चरणौ पश्चाद्ववन्दे विनयान्वितः ।
रामो मातरमसाद्य विवर्णां शोकविह्वलाम् ॥९१॥
जग्राह प्रणतः पादौ मनो मातुः प्रसादयन् ।
कैकेयीं च सुमित्रां च ननामेतरमातरौ ॥९२॥
भरतः पादुके ते तु राघवस्य सुपूजिते ।
योजयामास रामस्य पादयोर्भक्तिसंयुतः ॥९३॥
राज्यमेतन्न्यासभूतं मया निर्यातीतं तव ।
अद्य मे सफलं जन्म फलितो मे मनोरथः ॥९४॥
यत्पश्यामि समायातमयोध्यां त्वामहं प्रभो ।
कोष्ठागारं बलं कोशं कृतं दशगुणं मया ॥९५॥
स्वत्तेजसा जगन्नाथ पालयस्व पुरं स्वकम् ।
इति ब्रुवाणं भरतं दृष्ट्वा सर्वे कपीश्वराः ॥९६॥
मुमुचुर्नेत्रजं तोयं प्रशंसुर्मुदान्विताः ।
ततो रामः प्रहृष्टात्मा भरतं स्वाङ्कगं मुदा ॥९७॥
ययौ तेन विमानेन भरतस्याश्रमं तदा ।
अवरुह्य तदा रामो विमानाग्र्यान्महीतलेम् ॥९८॥


देखे हुए भाई भरतको रघुनाथजीने तुरन्त ही उठाकर प्रसन्नतासे गोदमें लेकर आलिंगन किया ॥८४॥ फिर प्रेमसे विह्वल हुए भरतजीने लक्ष्मणजीसे मिलकर श्रीसीताजीको अपना नाम उच्चारण करते हुए प्रीतिपूर्वक प्रणाम किया ॥८५॥ तत्पश्चात् भरतजीने सुग्रीव, जाम्बवान्, युवराज अंगद, मैन्द, द्विविद, नील और ऋषभको तथा सुषेण, नल, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ और पनसको भी हृदयसे लगाया ॥८६-८७॥ इस प्रकार भरतजीसे सत्कार पाकर प्रसन्न हुए उन सौम्य वानरों-ने मनुष्यरूप धारणकर उनकी कुशल पूछी ॥८८॥ तब भरतजीने सुग्रीवको हृदयसे लगाकर अति प्रेम-पूर्वक कहा— "सुग्रीव! तुम्हारी सहायतासे ही श्रीराम-चन्द्रजीकी विजय हुई और रावण मारा गया; अतः हम चारोंके तुम पाँचवें भाई हो।" तदनन्तर शत्रुघ्नजीने लक्ष्मणजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी-को प्रणामकर अति विनीत भावसे सीताजीके चरणोंकी वन्दना की। फिर श्रीरामचन्द्रजीने शोकके कारण अति व्याकुल और कृश हुई माता कौसल्याके पास जाकर अति विनीत भावसे उनके चरण छुए और उनके चित्तको प्रसन्न किया तथा अपनी विमाता कैकेयी, और सुमित्राको भी नमस्कार किया ॥८९-९२॥ तदुपरान्त भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीकी भली प्रकार पूजा की हुई पादुकाओंको भक्तिपूर्वक उनके चरणोंमें पहना दिया ॥९३॥ (और कहा—) "प्रभो! मुझे धरोहररूपसे सौंपे हुए आपके इस राज्यको मैं फिर आपहीको सौंपता हूँ; आज, मैं आपको अयोध्यामें आया हुआ देखता हूँ—इससे मेरा जन्म सफल हो गया और मेरी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं। हे जगन्नाथ! आपके प्रतापसे मैंने अन्न-भण्डार, सेना और कोशादि पहलेसे दशगुने कर दिये हैं। अब आप अपने नगरका स्वयं पालन कीजिये।" भरतजीको इस प्रकार कहते देख सभी मुख्य-मुख्य वानर हर्षसे आँसू गिराते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे।

तब श्रीरामचन्द्रजी अति हर्षपूर्वक भरतजीको गोदमें लिये उसी विमानपर चढ़े हुए भरतजीके आश्रमको गये। वहाँ विमानश्रेष्ठ पुष्पकसे नीचे पृथिवीपर उतरकर

युद्धकाण्ड - सर्ग १५: श्रीराम-राज्याभिषेक

सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१५


अब्रवीत्पुष्पकं देवो गच्छ वैश्रवणं वह ।
अनुगच्छानुजानामि कुबेरं धनपालकम् ॥९९॥
रामो वसिष्ठस्य गुरोः पदाम्बुजं
नत्वा यथा देवगुरोः शतक्रतुः ।
दत्त्वा महार्हासनमुत्तमं गुरो-
रुपाविवेशाथ गुरोः समीपतः ॥१००॥

भगवान् रामने उससे कहा—"जाओ, मैं आज्ञा देता हूँ—अब, तुम धनपति कुबेरका अनुसरण करते हुए उन्हींको वहन करो" ॥९४-९९॥ फिर, इन्द्र जैसे बृहस्पतिजीकी वन्दना करते हैं वैसे ही, श्रीरामचन्द्रजी गुरु वसिष्ठजीके चरणकमलोंमें प्रणाम कर और उन्हें एक अति सुन्दर बहुमूल्य आसन दे स्वयं भी उन्हींके पास बैठ गये ॥१००॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥


पञ्चदश सर्ग

श्रीराम-राज्याभिषेक ।

श्रीमहादेव उवाच

ततस्तु कैकयीपुत्रो भरतो भक्तिसंयुतः ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय ज्येष्ठं भ्रातरमब्रवीत् ॥ १ ॥

माता मे सत्कृता राम दत्तं राज्यं त्वया मम ।
ददामि तत्ते च पुनर्यथा त्वमददा मम ॥ २ ॥

इत्युक्त्वा पादयोर्भक्त्या साष्टाङ्गं प्रणिपत्य च ।
बहुधा प्रार्थयामास कैकेय्या गुरुणा सह ॥ ३ ॥

तथेति प्रतिजग्राह भरताद्राज्यमीश्वरः ।
मायामाश्रित्य सकलां नरचेष्टामुपागतः ॥ ४ ॥

स्वराज्यानुभवो यस्य सुखज्ञानैकरूपिणः ।
निरस्तातिशयानन्दरूपिणः परमात्मनः ॥ ५ ॥

मानुषेण तु राज्येन किं तस्य जगदीक्षितुः ।
यस्य भ्रूभङ्गमात्रेण त्रिलोकी नश्यति क्षणात् ॥ ६ ॥

यस्यानुग्रहमात्रेण भवन्त्याखण्डलश्रियः ।
लीलासृष्टमहासृष्टेः कियदंतद्रमापतेः ॥ ७ ॥

तथापि भजतां नित्यं कामपूरविधित्सया ।
लीलामानुषदेहेन सर्वमप्यनुवर्तते ॥ ८ ॥


**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! फिर कैकेयीपुत्र भरतजीने शीश झुकाये अञ्जलि बाँधकर अति भक्तिपूर्वक ज्येष्ठ भ्राता रामजीसे कहा—॥१॥ "हे राम ! आपने मुझे राज्य दिया था, इससे मेरी माताका सत्कार तो हो चुका । अब, जैसे आपने मुझे दिया था वैसे ही मैं फिर आपहीको उसे सौंपता हूँ" ॥ २ ॥ ऐसा कह उन्होंने चरणोंमें भक्तिपूर्वक साष्टाङ्ग प्रणाम कर (राज्य स्वीकार करनेके लिये) कैकेयी और गुरुजीके सहित बहुत कुछ प्रार्थना की ॥३॥ तब अपनी मायाको आश्रय कर सब प्रकारकी मनुष्य-लीलाएँ करनेमें प्रवृत्त हुए भगवान् रामने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीसे राज्य ले लिया ॥४॥ जिन्हें हर समय स्वर्गीय राज्यका अनुभव होता है उन एकमात्र सुख और ज्ञानस्वरूप, समस्त विषयानन्दोंसे रहित परमानन्दमूर्ति परमात्मा जगदीश्वरको तुच्छ मानवी राज्यसे क्या काम है ? जिनके भ्रुकुटिविलासमात्रसे तीनों लोक एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ॥५-६॥ जिनकी कृपासे इन्द्रकी राज्यलक्ष्मी प्राप्त होती है तथा जिन्होंने लीलासे ही यह महान् सृष्टि रची है उन लक्ष्मीपतिके लिये यह (अयोध्याका राज्य) कितना है ? ॥७॥ तथापि अपने भक्तोंकी कामनाओंको सदैव पूर्ण करनेके लिये वे माया-मानवदेहसे सर्वदा सभी कुछ अभिनय करते हैं ॥८॥

३१६अध्यात्मरामायण[सर्ग १५

| ततः शत्रुघ्नवचनान्निपुणः श्मश्रुकृन्तकः ।<br>सम्भाराश्चाभिषेकार्थमानीता राघवस्य हि ॥९॥<br>पूर्वं तु भरते स्नाते लक्ष्मणे च महात्मनि ।<br>सुग्रीवे वानरेन्द्रे च राक्षसेन्द्रे विभीषणे ॥१०॥<br>विशोधितजटः स्नातश्चित्रमाल्यानुलेपनः ।<br>महार्हवसनोपेतस्तस्थौ तत्र श्रिया ज्वलन् ॥११॥<br>प्रतिकर्म च रामस्य लक्ष्मणश्च महामतिः ।<br>कारयामास भरतः सीताया राजयोषितः ॥१२॥<br>महार्हवस्त्राभरणैरलंञ्चक्रुः सुमध्यमाम् ।<br>ततो वानरपत्नीनां सर्वासामेव शोभना ॥१३॥<br>अकारयत कौसल्या प्रहृष्टा पुत्रवत्सला ।<br>ततः स्यन्दनमादाय शत्रुघ्नवचनात्सुधीः ॥१४॥<br>सुमन्त्रः सूर्यसङ्काशं योजयित्वाऽग्रतः स्थितः ।<br>आरुरोह रथं रामः सत्यधर्मपरायणः ॥१५॥<br>सुग्रीवो युवराजश्च हनुमांश्च विभीषणः ।<br>स्नात्वा दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥१६॥<br>राममन्वीयुरग्रे च रथाश्वगजवाहनाः ।<br>सुग्रीवपत्न्यः सीता च ययुर्यानैः पुरं महत् ॥१७॥<br>वज्रपाणिर्यथा देवैर्हरिताश्वरथे स्थितः ।<br>प्रययौ रथमास्थाय तथा रामो महत्पुरम् ॥१८॥<br>सारथ्यं भरतश्चक्रे रत्नदण्डं महाद्युतिः ।<br>श्वेतातपत्रं शत्रुघ्नो लक्ष्मणो व्यजनं दधे ॥१९॥<br>चामरं च समीपस्थो न्यवीजयदरिन्दमः ।<br>शशिप्रकाशं त्वपरं जग्राहासुरनायकः ॥२०॥<br>दिविजैः सिद्धसङ्घैश्च ऋषिभिर्दिव्यदर्शनैः ।<br>स्तूयमानस्य रामस्य शुश्रुवे मधुरध्वनिः ॥२१॥ | तब शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे कुशल क्षौरकार (नाई)<br>बुलाया गया और रघुनाथजीके अभिषेकके लिये सामग्री<br>इकट्ठी की गयी ॥९॥ पहले भरतजीने और फिर महात्मा<br>लक्ष्मणजीने स्नान किया तदुपरान्त वानरराज सुग्रीव<br>और राक्षसराज विभीषण नहाये ॥१०॥ फिर जटा-<br>जूटके कट जानेपर श्रीरघुनाथजीने स्नान किया और<br>रङ्ग-बिरङ्गी मालाओं, अङ्गरागों तथा बहुमूल्य वस्त्रोंसे<br>सुसज्जित हो वे अपनी कान्तिसे देदीप्यमान होकर<br>विराजमान हुए ॥११॥ महामति लक्ष्मण और भरतने<br>श्रीरामचन्द्रजीको विभूषित कराया और राज-महिलाओं-<br>ने सीताजीका शृङ्गार किया ॥१२॥ उन्होंने उस<br>सुन्दरीको नाना प्रकारके बहुमूल्य वस्त्र और आभूषणों-<br>से सुसज्जित किया । तदनन्तर पुत्रवत्सला शोभामयी<br>कौसल्याजीने अति प्रसन्न होकर समस्त वानरपत्नियों-<br>का भी शृङ्गार कराया ।<br><br>इसी समय शत्रुघ्नजीकी आज्ञासे बुद्धिमान् सुमन्त्रने<br>सूर्यके समान तेजस्वी रथ जोड़कर सामने ला खड़ा<br>किया । तब सत्यधर्मपरायण भगवान् राम उस रथपर<br>चढ़े ॥१३–१५॥ उस समय सुग्रीव, अङ्गद, हनुमान्<br>और विभीषण स्नानादि कर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे<br>सुसज्जित हो रथ, घोड़े और हाथी आदि वाहनोंपर<br>चढ़कर श्रीरामचन्द्रजीके आगे-पीछे चले तथा सुग्रीवकी<br>पत्नियां और सीताजी सुन्दर पालकियोंपर बैठकर अति<br>विशाल अयोध्यापुरीको चलीं ॥१६–१७॥ जिस प्रकार<br>हरितवर्ण घोड़ोंके रथमें बैठकर वज्रपाणि इन्द्र देवताओं<br>के साथ चलते हैं उसी प्रकार भगवान् राम रथपर चढ़-<br>कर महापुरी अयोध्याको चले ॥१८॥ तब महातेजस्वी<br>भरतजीने सारथी होकर रथ चलाया, शत्रुघ्नजीने<br>रत्नजटित दण्डयुक्त श्वेत छत्र लिया और लक्ष्मणजीने<br>व्यजन (पंखा) धारण किया ॥१९॥ एक ओर पास ही<br>स्थित शत्रुदमन सुग्रीवने और दूसरी ओर राक्षस-<br>राज विभीषणने चन्द्रमाके समान कान्तियुक्त चँवर<br>डुलाया ॥२०॥ उस समय भगवान् रामकी स्तुति<br>करते हुए दिव्यदर्शन देवताओं, सिद्धसमूहों और<br>ऋषियोंकी सुमधुर ध्वनि सुनायी देने लगी ॥२१॥ |

सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३१७


मानुषं रूपमास्थाय वानरा गजवाहनाः ।<br>भेरीशङ्खनिनादैश्च मृदङ्गपणवानकैः ॥२२॥<br>प्रययौ राघवश्रेष्ठस्तां पुरीं समलङ्कृताम् ।<br>ददृशुस्ते समायन्तं राघवं पुरवासिनः ॥२३॥वानरगण मनुष्यरूप धारणकर हाथियोंपर सवार हुए। इस प्रकार रघुश्रेष्ठ भगवान् राम सहनाई, शङ्ख, मृदङ्ग, ताशे और नगाड़े आदि बाजोंके घोषके साथ भली प्रकार सजायी हुई अयोध्यापुरीमें गये। उस समय पुरवासी लोग श्रीरघुनाथजीको आते हुए देखने लगे ॥२२-२३॥
दूर्वादलश्यामर्तनुं महार्ह-<br>किरीटरत्नाभरणाश्रिताङ्गम् ।<br>आरक्तकञ्जायतलोचनान्तं<br>दृष्ट्वा ययुर्मोदमतीव पुण्याः ॥२४॥<br>विचित्ररत्नान्वितसूत्रनद्ध-<br>पीताम्बरं पीनभुजान्तरालम् ।<br>अनर्घ्यमुक्ताफलदिव्यहारै-<br>र्विरोचमानं रघुनन्दनं प्रजाः ॥२५॥<br>सुग्रीवमुख्यैर्हरिभिः प्रशान्तै-<br>र्निषेव्यमाणं रवितुल्यभासम् ।<br>कस्तूरिकाचन्दनलिप्तगात्रं<br>निषीतकल्पद्रुमपुष्पमालम् ॥२६॥वे महाभाग पुरजन दूर्वादलके समान श्याम-शरीर, महामूल्य मुकुट और रत्नजटित आभूषणोंसे विभूषित, कमलके समान कुछ अरुणवर्ण विशाल नयनोंवाले, रङ्ग-बिरङ्गे रत्नोंसे युक्त (सुनहरी) तारके कामका पीताम्बर धारण किये, विशाल वक्षःस्थलवाले, बहुमूल्य मोतियोंके दिव्य हारोंसे सुशोभित, सुग्रीवादि शान्तस्वभाव वानरोंसे सेवित, सूर्यके समान तेजस्वी, समस्त शरीरमें कस्तूरी और चन्दनका लेप किये तथा कल्पवृक्षके पुष्पोंकी माला धारण किये श्रीरघुनाथजीको देखकर परम आनन्दको प्राप्त हुए ॥२४-२६॥
श्रुत्वा स्त्रियो राममुपागतं मुदा<br>प्रहर्षवेगोत्कलिताननश्रियः ।<br>अपास्य सर्वं गृहकार्यमाहितं<br>हर्म्याणि चैवारुरुहुः स्वलङ्कृताः॥२७॥जब स्त्रियोंने भगवान् रामको आते सुना तो प्रसन्नतासे महान् हर्षके कारण उनके मुखकी कान्ति उज्ज्वल हो गयी और वे जिस गृहकार्यमें लगी हुई थीं उसे छोड़ भली प्रकार सज-धजकर अपने-अपने घरोंके ऊपर चढ़ गयीं ॥२७॥
दृष्ट्वा हरिं सर्वदृगुत्सवाकृतिं<br>पुष्पैः किरन्त्यः सितशोभिताननाः ।<br>दृग्भिः पुनर्नेत्रमनोरसायनं<br>स्वानन्दमूर्तिं मनसाभिरेभिरे ॥२८॥सुमधुर मुसकानसे जिनका मुख मनोहर हो रहा है वे पुरनारियाँ, सबके नयनानन्दस्वरूप भगवान् रामको देखकर, फूलोंकी वर्षा करने लगीं और फिर उन्होंने, नेत्र और मनको प्रिय लगनेवाली उस आनन्दमयी मूर्तिको नेत्रोंद्वारा हृदयमें ले जाकर, मनसे आलिङ्गन किया ॥२८॥
रामः स्मितस्निग्धदृशा प्रजास्तथा<br>पश्यन्प्रजानाथ इवापरः प्रभुः ।<br>शनैर्जगामाथ पितुः स्वलङ्कृतं<br>गृहं महेन्द्रालयसन्निभं हरिः ॥२९॥इस प्रकार विष्णुरूप भगवान् राम दूसरे प्रजापतिके समान मुसकानयुक्त मनोहर दृष्टिसे अपनी प्रजाको देखते हुए धीरे-धीरे भली प्रकार सजाये हुए अपने पिताके इन्द्रभवनके समान महलमें गये ॥२९॥
प्रविश्य वेश्मान्तरसंस्थितो मुदा<br>रामो ववन्दे चरणौ स्वमातुः ।<br>क्रमेण सर्वाः पितृयोषितः प्रभु-<br>र्ननाम भक्त्या रघुवंशकेतुः ॥३०॥राजमहलके भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रसन्नचित्तसे अपनी माता (कौसल्या) के चरणोंकी वन्दना की और फिर उन रघुवंशशिरोमणि प्रभुने क्रमशः सभी विमाताओंको भक्तिपूर्वक प्रणाम किया ॥३०॥

३१८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १९


ततो भरतमाहेदं रामः सत्यपराक्रमः ।
सर्वसम्पत्समायुक्तं मम मन्दिरमुत्तमम् ॥३१॥
मित्राय वानरेन्द्राय सुग्रीवाय प्रदीयताम् ।
सर्वेभ्यः सुखवासार्थं मन्दिराणि प्रकल्पय ॥३२॥
रामेणैवं समादिष्टो भरतश्च तथाऽकरोत् ।
उवाच च महातेजाः सुग्रीवं राघवानुजः ॥३३॥
राघवस्याभिषेकार्थं चतुःसिन्धुजलं शुभम् ।
आनेतुं प्रेषयस्वाशु दूतांस्त्वरितविक्रमान् ॥३४॥
प्रेषयामास सुग्रीवो जाम्बवन्तं मरुत्सुतम् ।
अङ्गदं च सुषेणं च ते गत्वा वायुवेगतः ॥३५॥
जलपूर्णान् शातकुम्भकलशांश्च समानयन् ।
आनीतं तीर्थसलिलं शत्रुघ्नो मन्त्रिभिः सह ॥३६॥
राघवस्याभिषेकार्थं वसिष्ठाय न्यवेदयत् ।
ततस्तु प्रयतो वृद्धो वसिष्ठो ब्राह्मणैः सह ॥३७॥
रामं रत्नमये पीठे ससीतं संन्यवेशयत् ।
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिर्गौतमस्तथा ॥३८॥
वाल्मीकिश्च तथा चक्रुः सर्वे रामाभिषेचनम् ।
कुशाग्रतुलसीयुक्तपुण्यगन्धजलैर्मुदा ॥३९॥
अभ्यषिञ्चन् रघुश्रेष्ठं वासवं वसवो यथा ।
ऋत्विग्भिर्ब्राह्मणैः श्रेष्ठैः कन्याभिः सह मन्त्रिभिः ॥
सर्वौषधिरसैश्चैव दैवतैर्नभसि स्थितैः ।
चतुर्भिर्लोकपालैश्च स्तुवद्भिः सगणेस्तथा ॥४१॥
छत्रं च तस्य जग्राह शत्रुघ्नः पाण्डुरं शुभम् ।
सुग्रीवराक्षसेन्द्रौ तौ दधतुः श्वेतचामरे ॥४२॥
मालां च काञ्चनीं वायुर्ददौ वासवचोदितः ।
सर्वरत्नसमायुक्तं मणिकाञ्चनभूषितम् ॥४३॥
ददौ हारं नरेन्द्राय स्वयं शक्रस्तु भक्तितः ।
प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥४४॥
देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात खात् ।
नवदूर्वादलश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम् ॥४५॥


तब सत्यपराक्रमी भगवान् रामने भरतजीसे कहा—
"मेरा सर्वसम्पत्तियुक्त श्रेष्ठ महल मेरे मित्र वानरराज सुग्रीवको दो तथा और सबके लिये भी सुखपूर्वक रहनेयोग्य महल बताओ" ॥ ३१-३२ ॥ श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर भरतजीने वैसा ही किया फिर महातेजस्वी भरतजीने सुग्रीवसे कहा—॥३३॥ "श्रीरामचन्द्रजीके अभिषेकके लिये चारों समुद्रोंका मंगलमय जल लानेके लिये तुरन्त ही शीघ्रगामी दूत भेजिये' ॥३४॥ तब सुग्रीवने जाम्बवान्, हनुमान्, अङ्गद और सुषेणको भेजा। ये तुरन्त ही वायुवेगसे जाकर सुवर्णकलशोंमें जल भरकर ले आये । उनके लाये हुए तीर्थजलको मन्त्रियोंके सहित शत्रुघ्नजीने भगवान् रामके अभिषेकके लिये वसिष्ठजीको निवेदन कर दिया तब ब्राह्मणोंके सहित वयोवृद्ध जितेन्द्रिय वसिष्ठजीने सीताजीके सहित श्रीरामचन्द्रजीको रत्नसिंहासनपर बैठाया और फिर वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, गौतम तथा वाल्मीकि आदि समस्त महर्षियोंने अति प्रसन्न होकर कुश और तुलसीके सहित पवित्र गन्धयुक्त जलसे श्रीरामचन्द्रजीका अभिषेक किया ॥३५-३९॥ फिर ऋत्विजों, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, कन्याओं और मन्त्रियोंके सहित उन महर्षियोंने आकाशस्थित देवताओं तथा अपने-अपने गणोंके सहित चारों लोकपालोंके स्तुति करते हुए सर्वौषधिके रसोंसे भी श्रीरघुनाथजीका इस प्रकार अभिषेक किया जैसे वसुओंने इन्द्रका किया था ॥४०-४१॥

उस समय शत्रुघ्नजीने भगवान् रामके ऊपर अति सुन्दर श्वेत छत्र लगाया और सुग्रीव तथा विभीषणने श्वेत चमर धारण किये ॥ ४२ ॥ इन्द्रकी प्रेरणासे वायुने सुवर्णमयी माला दी और फिर स्वयं इन्द्रने भी अति भक्तिपूर्वक महाराज रामको एक सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त और मणि तथा सुवर्णसे विभूषित हार दिया । तदनन्तर, देवता और गन्धर्वोंने गान आरम्भ किया, और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ ४३-४४ ॥ तथा आकाशसे देव-दुन्दुभियोंके घोषके साथ पुष्पोंकी वर्षा होने लगी । फिर नवीन दूर्वादलके समान श्याम-

सर्ग १५ ]युद्धकाण्ड३१९

रविकोटिप्रभायुक्तकिरीटेन विराजितम् ।
कोटिकन्दर्पलावण्यं पीताम्बरसमावृतम् ॥ ४६ ॥
दिव्याभरणसम्पन्नं दिव्यचन्दनलेपनम् ।
अयुतादित्यसङ्काशं द्विभुजं रघुनन्दनम् ॥ ४७ ॥
वामभागे समासीनां सीतां काञ्चनसंनिभाम् ।
सर्वाभरणसम्पन्नां वामाङ्के समुपस्थिताम् ॥ ४८ ॥
रक्तोत्पलकराम्भोजां वामेनालिङ्ग्य संस्थितम् ।
सर्वातिशयशोभाढ्यं दृष्ट्वा भक्तिसमन्वितः ॥ ४९ ॥
उमया सहितो देवः शङ्करो रघुनन्दनम् ।
सर्वदेवगणैर्युक्तः स्तोतुं समुपचक्रमे ॥ ५० ॥

[हिन्दी अनुवाद] वर्ण, कमलदलके समान विशालनयन, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशयुक्त मुकुटसे सुशोभित, करोड़ों कामदेवोंके समान कमनीय, पीताम्बर-परिवेष्टित, दिव्याभरण-विभूषित, दिव्यचन्दन-चर्चित, हजारों सूर्योंके समान तेजस्वी, सबसे अधिक शोभायमान द्विभुज रघुनाथजीको अपनी बायीं ओर करकमलमें रक्तकमल धारण किये बैठी हुई सर्वाभूषणविभूषिता सुवर्णवर्णा सीताजीको अपनी बायीं भुजासे आलिंगन किये देख पार्वतीजीसहित भगवान् शंकर भक्तिभावसे भरकर समस्त देवताओंके सहित स्तुति करने लगे ॥ ४५–५० ॥


श्रीमहादेव उवाच

नमोऽस्तु रामाय सशक्तिकाय नीलोत्पलश्यामलकोमलाय ।
किरीटहाराङ्गदभूषणाय सिंहासनस्थाय महाप्रभाय ॥ ५१ ॥

श्रीमहादेवजी बोले— नीलकमलके समान सुकोमल श्यामशरीरवाले, किरीट हार और भुजबन्ध आदिसे विभूषित तथा अपनी शक्ति (श्रीसीताजी) के सहित सिंहासनपर विराजमान महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीको नमस्कार है ॥ ५१ ॥

त्वमादिमध्यान्तविहीन एकः सृजस्यवस्यत्सि च लोकजातम् ।
स्वमायया तेन न लिप्यसे त्वं यत्स्वे सुखेऽजस्ररतोऽनवद्यः ॥ ५२ ॥

हे राम ! आप आदि, अन्त और मध्यसे रहित अद्वितीय हैं, अपनी मायासे आप ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना, पालन और संहार करते हैं, तो भी उससे लिप्त नहीं होते क्योंकि आप निरन्तर स्वानन्दमग्न और अनिन्द्य हैं ॥ ५२ ॥

लीलां विधत्से गुणसंवृतस्त्वं प्रपन्नभक्तानुविधानहेतोः ।
नानावतारैः सुरमानुषाद्यैः प्रतीयसे ज्ञानिभिरेव नित्यम् ॥ ५३ ॥

अपनी मायाके गुणोंसे आवृत होकर आप अपने शरणागत भक्तोंको मार्ग दिखानेके लिये देव-मनुष्यादि नाना प्रकारके अवतार लेकर विचित्र लीलाएँ करते हैं । उस समय सदा ज्ञानीजन ही आपको जान पाते हैं ॥ ५३ ॥

स्वांशेन लोकं सकलं विधाय तं बिभर्षि च त्वं तदधः फणीश्वरः ।
उपर्यधो भान्वनिलोऽडुपौषधिप्रवर्षरूपोऽप्यसि नैकधा जगत् ॥ ५४ ॥

आप अपने अंशसे सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करके उन्हें शेषरूप होकर नीचेसे धारण करते हैं तथा सूर्य, वायु, चन्द्र, ओषधि और वृष्टिरूप होकर उनका नाना प्रकारसे ऊपरसे पालन करते हैं ॥ ५४ ॥

त्वमिह देहभृतां शिखिरूपः पचसि भुक्तमशेषमजस्रम् ।
पवनपञ्चकरूपसहायो जगदखण्डमनेन बिभर्षि ॥ ५५ ॥

आप ही जठराग्निरूप होकर (प्राण, अपान आदि) पाँच प्राणोंकी सहायतासे प्राणियोंके खाये हुए अन्नको पचाकर उसके द्वारा सर्वदा सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करते हैं ॥ ५५ ॥ हे ईश ! चन्द्र, सूर्य और अग्निमें जो तेज है, समस्त प्राणियोंमें जो चेतनांश है तथा देहधारियों-

३२०अध्यात्मरामायण[सर्ग १५

चन्द्रसूर्यशिखिमध्यगतं<br>यत्तेज ईश चिदशेषतनूनाम्।<br>ग्रामवत्तनुभृतामिव धैर्यं<br>शौर्यमायुरखिलं तव सत्त्वम् ॥५६॥ | में जो धैर्य, शौर्य और आयुर्बल-सा दिखायी देता है, वह आपकी ही सत्ता है ॥ ५६ ॥ त्वं विरिश्विशिवविष्णुविभेदात्-<br>कालकर्मशशिसूर्यविभागात् ।<br>वादिनां पृथगिवेश विभासि<br>ब्रह्म निश्चितमनन्यदिहैकम् ॥५७॥ | हे राम ! भिन्न-भिन्न ईश्वरवादियोंको एक आप ही ब्रह्मा, महादेव और विष्णुके तथा काल, कर्म, चन्द्रमा और सूर्यके भेदसे पृथक्-पृथक्‌से भासते हैं; किन्तु इसमें सन्देह नहीं, वास्तवमें आप ही एक अद्वितीय ब्रह्म ही ॥ ५७ ॥ मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः<br>श्रुतौ पुराणेषु च लोकसिद्धः।<br>तथैव सर्वं सदसद्विभाग-<br>स्त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥५८॥ | जिस प्रकार वेद, पुराण और लोकमें आप एक ही मत्स्यादि अनेक रूपोंसे प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार संसारमें जो कुछ सत्-असत्-रूप-विभाग है, वह आप ही हैं—आपसे भिन्न और कुछ नहीं है ॥ ५८ ॥ यद्यत्समुत्पन्नमनन्तसृष्टा-<br>वुत्पत्स्यते यच्च भवच्च यच्च ।<br>न दृश्यते स्थावरजङ्गमादौ<br>त्वया विनातः परतः परस्त्वम् ॥५९॥ | इस अनन्त सृष्टिमें जो कुछ उत्पन्न हुआ है, जो उत्पन्न होगा और जो हो रहा है, उस स्थावर-जङ्गमादिरूप सम्पूर्ण प्रपञ्चमें आपके बिना और कोई दिखायी नहीं देता। अतः आप (प्रकृति आदि) परसे भी पर हैं ॥ ५९ ॥ तत्त्वं न जानन्ति परात्मनस्ते<br>जनाः समस्तास्तव माययाऽतः।<br>त्वद्भक्तसेवाऽमलमानसानां<br>विभाति तत्त्वं परमेकमैशम् ॥६०॥ | हे राम ! आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपके परमात्मस्वरूपका तत्त्व नहीं जानते। अतः जिनका अन्तःकरण आपके भक्तोंकी सेवाके प्रभावसे निर्मल हो गया है उन्हींको आपका अद्वितीय ईश्वर-रूप भासता है ॥ ६० ॥ ब्रह्मादयस्ते न विदुः स्वरूपं<br>चिदात्मतत्त्वं बहिरर्थभावाः।<br>ततो बुधस्त्वामिदमेव रूपं<br>भक्त्या भजन्मुक्तिमुपैत्यदुःखः ॥६१॥ | जिनकी बाह्य पदार्थोंमें सत्यबुद्धि है वे ब्रह्मादि भी आपके चित्स्वरूपको नहीं जानते, (फिर औरोंका तो कहना ही क्या है!) अतः बुद्धिमान् पुरुष इस श्यामसुन्दरस्वरूपसे ही आपका भक्तिपूर्वक भजन करके दुःखोंसे पार होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ६१ ॥ अहं भवन्नाम गृणन्कृतार्थो<br>वसामि काश्यामर्निशं भवान्या।<br>मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं<br>दिशामि मन्त्रं तव राम नाम ॥६२॥ | प्रभो ! आपके नामोच्चारणसे कृतार्थ होकर मैं अहर्निश पार्वतीजीके सहित काशीमें रहता हूँ और वहाँ मरणासन्न पुरुषोंको उनके मोक्षके लिये आपके तारक मन्त्र 'राम' नामका उपदेश करता हूँ ॥ ६२ ॥ इमं स्तवं नित्यमनन्यभक्त्या<br>शृण्वन्ति गायन्ति लिखन्ति ये वै।<br>ते सर्वसौख्यं परमं च लब्ध्वा<br>भवत्पदं यान्तु भवत्प्रसादात् ॥६३॥ | (अब आपसे यही प्रार्थना है कि) जो लोग मेरे कहे हुए इस स्तोत्रको अनन्य भक्तिसे नित्यप्रति सुनें, कहें अथवा लिखें वे आपकी कृपासे सम्पूर्ण परमानन्द लाभ करके आपके निज-पदको प्राप्त हों ॥ ६३ ॥

इन्द्र उवाच

रक्षोधिपेनाखिलदेव सौख्यं<br>हृतं च मे ब्रह्मवरेण देव ! | इन्द्र बोले—हे देव ! ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे राक्षसराज रावणने मेरे समस्त देवोचित सुखको हर लिया था। अब उस दुष्ट शत्रु राक्षसराजके मारे

सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३२१


पुनश्च सर्वं भवतः प्रसादात्-
प्राप्तं हतो राक्षसदुष्टशत्रुः ॥ ६४॥
जानेपर आपकी कृपासे मुझे वह सब सुख फिर प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥

देवा ऊचुः
हता यज्ञभागा धरादेवदत्ता
मुरारे खलेनादिदैत्येन विष्णो।
हतोऽद्य त्वया नो वितानेषु भागाः
पुरावद्भवष्यिन्ति युष्मत्प्रसादात् ॥६५॥
**देवगण बोले—**हे मुरारे ! हे विष्णो ! इस दुष्ट आदिदैत्यने ब्राह्मणोंद्वारा दिये हुए हमारे समस्त यज्ञ-भागोंको हर लिया था। अब आपने उसे मार डाला, अतः आपकी कृपासे अब हमें फिर पहलेके समान ही यज्ञोंमें भाग मिलने लगेंगे ॥ ६५ ॥

पितर ऊचुः
हतोऽद्य त्वया दुष्टदैत्यो महात्मन्
गयादौ नरैर्दत्तपिण्डादिकान्नः।
बलादत्ति हत्वा गृहीत्वा समस्ता-
निदानीं पुनर्लब्धसत्त्वा भवामः॥६६॥
**पितृगण बोले—**हे महात्मन् ! यह दुष्ट दैत्य गया आदि पुण्य-क्षेत्रोंमें मनुष्योंके दिये हुए हमारे पिण्डोदकादिको बलात्कारसे छीन कर खा लेता था; आज आपने इसे मार डाला। अतः अब अपना भाग प्राप्त करके हम फिर शक्ति प्राप्त कर लेंगे ॥ ६६ ॥

यक्षा ऊचुः
सदा विष्टिकर्मण्यनेनाभियुक्ता
वहामो दशास्यं बलाद्दुःखयुक्ताः।
दुरात्मा हतो रावणो राघवेश
त्वया ते वयं दुःखजाताद्विमुक्ताः ॥६७॥
**यक्ष बोले—**हे रघुनाथजी ! यह रावण हमें बलात्कारसे वेगारमें लगा देता था और हम इसकी पालकी आदिमें जुतकर बड़ा कष्ट मानकर इसे ले चलते थे। अतः आज इस दुरात्माको मारकर आपने हमें अनेकों दुःखोंसे छुड़ा दिया ॥ ६७ ॥

गन्धर्वा ऊचुः
वयं सङ्गीतनिपुणा गायन्तस्ते कथामृतम्।
आनन्दामृतसन्दोहयुक्ताः पूर्णाः स्थिताः पुरा॥६८॥
पश्चादुरात्मना राम रावणेनाभिविद्रुताः।
तमेव गायमानाश्च तदाराधनतत्पराः ॥६९॥
स्थितास्त्वया परित्राता हतोऽयं दुष्टराक्षसः।
**गन्धर्व बोले—**प्रभो ! हम संगीतकुशल लोग आपकी अमृततुल्य कथाओंका गान करते हुए पहले आनन्दामृतसमूहसे युक्त होकर मग्न रहते थे ॥ ६८ ॥ किन्तु फिर दुरात्मा रावणद्वारा आक्रान्त होकर हम उसीके गुणगान और उसीकी सेवामें तत्पर हो गये। इस दुष्ट राक्षसको मारकर अब आपने हमें भी बचा लिया।

एवं महोरगाः सिद्धाः किन्नरा मरुतस्तथा ॥७०॥
वसवो मुनयो गावो गुह्यकाश्च पतत्रिणः।
सप्रजापतयश्चैते तथा चाप्सरसां गणाः ॥७१॥
सर्वे रामं समासाद्य दृष्ट्वा नेत्रमहोत्सवम्।
स्तुत्वा पृथक् पृथक् सर्वे राघवेणाभिवन्दिताः ॥७२॥
ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे ब्रह्मरुद्रादयस्तथा।
प्रशंसन्तो मुदा रामं गायन्तस्तस्य चेष्टितम् ॥७३॥
ध्यायन्तस्त्वभिषेकार्द्रं सीतालक्ष्मणसंयुतम्।
सिंहासनस्थं राजेन्द्रं ययुः सर्वे हृदि स्थितम् ॥७४॥
इसी प्रकार सिद्ध, किन्नर, मरुत्, वसु, मुनि, गौ, गुह्यक, पक्षी, प्रजापति और अप्सराओंके समूह सभी भगवान् रामके पास पृथिवीलोकमें आये और उन नयनानन्दवर्धन प्रभुके दर्शन कर उनकी पृथक्-पृथक् स्तुति की तथा उनसे प्रशंसित हो अपने-अपने लोकोंको चले गये। तदनन्तर ब्रह्मा और महादेव आदि भी आनन्दपूर्वक भगवान् रामकी प्रशंसा करते, उनकी लीलाओंका गान करते और सिंहासनपर विराजमान अभिषेकसे आर्द्र राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका सीताजी और लक्ष्मणके सहित हृदयमें ध्यान करते वहाँसे विदा हुए ॥६९-७४॥


४१

युद्धकाण्ड - सर्ग १६: वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा

:३२२अध्यात्मरामायण[सर्ग १६
खे वाद्येषु ध्वनत्सु प्रमुदितहृदयै-<br>      र्देववृन्दैः स्तुवद्भि-<br>र्वर्षद्भिः पुष्पवृष्टिं दिवि मुनिनिकरै-<br>      रीड्यमानः समन्तात् ।<br>रामः श्यामः प्रसन्नस्मितरुचिरमुखः<br>      सूर्यकोटिप्रकाशः<br>सीतासौमित्रिवातात्मजमुनिहरिभिः<br>      सेव्यमानो विभाति ॥७५॥उस समय, जब कि आकाशमें बाजे बज रहे थे, देवताओंका वृन्द स्वर्गमें प्रसन्न हृदयसे स्तुति करता हुआ पुष्प बरसा रहा था तथा महर्षि-मण्डल चारों ओर स्थित होकर स्तुति कर रहा था, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान प्रसन्नतायुक्त मुसकानसे मनोहर मुखवाले श्यामसुन्दर भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, मुनिजन तथा वानरगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त सुशोभित हुए ॥ ७५ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥


षोडश सर्ग

वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे ।<br>वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥ १ ॥हे पार्वति ! समस्त लोकोंको सुख देनेवाले राजाधिराज भगवान् रामके राज्याभिषिक्त होनेपर पृथिवी धन-धान्यसे पूर्ण हो गयी और वृक्ष फलयुक्त हो गये ॥ १ ॥
गन्धहीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे ।<br>सहस्रशतसंख्यानां धेनूनां च गवां तथा ॥ २ ॥<br>ददौ शतवृषान्पूर्वं द्विजेभ्यो रघुनन्दनः ।<br>त्रिंशत्कोटिं सुवर्णस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ३ ॥तथा जो पुष्प गन्धहीन थे वे भी सुगन्धयुक्त होकर शोभा पाने लगे । श्रीरघुनाथजी-ने (राज्याभिषिक्त होकर) पहले एक लाख घोड़े, एक लाख दूध देनेवाली गौएँ और सैकड़ों बैल ब्राह्मणोंको दिये और फिर उन्हें तीस करोड़ सुवर्ण-मुद्रा दिये ॥ २-३ ॥
वस्त्राभरणरत्नानि ब्राह्मणेभ्यो मुदा तथा ।<br>सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥ ४ ॥<br>सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो भक्तवत्सलः ।<br>अङ्गदाय ददौ दिव्ये ह्यङ्गदे रघुनन्दनः ॥ ५ ॥तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्न होकर नाना प्रकारके वस्त्र, आभूषण और रत्नादि भी ब्राह्मणों-को दिये । फिर भक्तवत्सल रघुनाथजीने सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त एक सूर्यकी कान्तिके समान चमकती हुई माला अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और अंगदको दो दिव्य अंगद (भुजबन्ध) दिये ॥४-५॥
चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ।<br>सीतायै प्रददौ हारं प्रीत्या रघुकुलोत्तमः ॥ ६ ॥तदनन्तर रघुकुल-तिलक श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रेमभावसे करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान अमूल्य मणि और रत्नोंसे विभूषित एक हार श्रीजानकीजीको दिया ॥६॥
अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ।<br>अवैक्षत हरीन्सर्वांन् भर्तारं च मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥<br>रामस्तामाह वैदेहीमिङ्गितज्ञो विलोकयन् ।श्रीजनकनन्दिनी उस हारको अपने गलेसे उतार-कर बारम्बार अपने पतिदेव और वानरोंकी ओर देखने लगीं ॥ ७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीका संकेत समझ-कर उनकी ओर देखते हुए कहा—"हे सम्पत्ति

सर्ग १६ ] युद्धकाण्ड ३२३


वैदेहि यस्य तुष्टाऽसि देहि तस्मै वरानने ॥ ८ ॥
हनूमते ददौ हारं पश्यतो राघवस्य च ।
तेन हारेणं शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च ॥ ९ ॥

रामोऽपि मारुतिं दृष्ट्वा कृताञ्जलिमुपस्थितम् ।
भक्त्या परमया तुष्ट इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥

हनूमंस्ते प्रसन्नोऽस्मि वरं वरय काङ्क्षितम् ।
दास्यामि देवैरपि यद्दुर्लभं भुवनत्रये ॥ ११ ॥

हनूमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ।
त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम ॥ १२ ॥

अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले ।
यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् ॥ १३ ॥

मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः ।
रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ १४ ॥

कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ।
तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते ॥ १५ ॥

स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्वे ममाज्ञया ।
इत्युक्तो मारुतिस्ताभ्यामीश्वराभ्यां प्रहृष्टधीः ॥ १६ ॥

आनन्दाश्रुपरीताक्षो भूयोभूयः प्रणम्य तौ ।
कृच्छ्राद्ययौ तपस्तप्तुं हिमवन्तं महामतिः ॥ १७ ॥

ततो गुहं समासाद्य रामः प्राञ्जलिमब्रवीत् ।
सखे गच्छ पुरं रम्यं शृङ्गवेरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥

मामेव चिन्तयन्नित्यं भुङ्क्ष्व भोगान्निजार्जितान् ।
अन्ते ममैव सारूप्यं प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥ १९ ॥

इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यान्याभरणानि च ।
राज्यं च विपुलं दत्त्वा विज्ञानं च ददौ विभुः ॥ २० ॥

रामेणालिङ्गितो हृष्टो ययौ स्वभवनं गुहः ।


जनकनन्दिनि ! तुम जिससे प्रसन्न हो उसे यह हार दे दो" ॥ ८ ॥ तब सीताजीने श्रीरामचन्द्रजीके सामने ही वह हार हनुमान्‌जीको दे दिया। उस हारको पहन और गौरवान्वित हो श्रीहनुमान्‌जी अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥

भगवान् रामने भी सामने हाथ जोड़े खड़े हुए हनुमान्‌जीसे उनकी भक्तिके कारण अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ १०॥ "हनुमन् ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो माँग लो। जो वर त्रिलोकीमें देवताओंको भी मिलना कठिन है वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूँगा !" ॥ ११ ॥ तब हनुमान्‌जीने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा—"हे रामजी ! आपका नाम-स्मरण करते हुए मेरा चित्त तृप्त नहीं होता ॥ १२॥ अतः मैं निरन्तर आपका नाम-स्मरण करता हुआ पृथिवीपर रहूँ । हे राजेन्द्र ! मेरा मनोवाञ्छित वर यही है कि जबतक संसारमें आपका नाम रहे तबतक मेरा शरीर भी रहे।" श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"ऐसा ही हो, तुम जीवन्मुक्त होकर संसारमें सुखपूर्वक रहो ॥ १३-१४॥ कल्पका अन्त होनेपर तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं।" फिर जानकीजीने उनसे कहा—"हे मारुते ! तुम जहाँ कहीं भी रहोगे वहीं मेरी आज्ञासे तुम्हारे पास सम्पूर्ण भोग उपस्थित हो जायँगे।" अपने प्रभु भगवान् राम और सीताजीके इस प्रकार कहनेपर महामति हनुमान्‌जी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १५-१६ ॥ और फिर नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर बड़ी कठिनतासे, तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये ॥ १७ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़े खड़े हुए गुहके पास जाकर कहा—"मित्र ! अब तुम अपने परम रमणीय ग्राम श्रृंगवेरपुरको जाओ ॥ १८ ॥ वहाँ मेरा ही चिन्तन करते हुए अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त हुए भोगों-को भोगो । इसमें सन्देह नहीं, अन्तमें तुम मेरा ही सारूप्य प्राप्त करोगे" ॥ १९ ॥ ऐसा कह भगवान् रामने उसे दिव्य आभूषण, बहुत-सा राज्य और तत्त्व-ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २० ॥ फिर श्रीरघुनाथजीसे आलिंगित होकर गुह अपने घरको गया । और भी

३२४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १६


ये चान्ये वानराः श्रेष्ठा अयोध्थां समुपागताः ॥२१॥<br>अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजयामास राघवः ।<br>सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः ॥२२॥<br>यथार्हं पूजितास्तेन रामेण परमात्मना ।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥२३॥जो-जो वानरश्रेष्ठ अयोध्यामें आये थे श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका भी अमूल्य वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कार किया । इस प्रकार विभीषणके सहित सुग्रीव आदि समस्त वानरगण परमात्मा रामसे यथोचित सत्कार पाकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥२१-२३॥
सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे किष्किन्धां प्रययुर्मुदा ।<br>विभीषणस्तु सम्प्राप्य राज्यं निहतकण्टकम् ॥२४॥<br>रामेण पूजितः प्रीत्या ययौ लङ्कामनिन्दितः ।<br>राघवो राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः ॥२५॥सुग्रीवादि समस्त वानरगण प्रसन्न-चित्तसे किष्किन्धाको गये और भगवान् रामसे सत्कृत हो अनिन्दित विभीषण अपना निष्कण्टक राज्य पाकर प्रीतिपूर्वक लंकाको गये तथा सबके ऊपर दया करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी अपने सम्पूर्ण राज्यका शासन करने लगे ॥२४-२५॥
अनिच्छन्नपि रामेण यौवराज्येऽभिषेचितः ।<br>लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् ॥२६॥भगवान् रामने श्रीलक्ष्मणजीको उनकी इच्छा न होनेपर भी युवराज-पदपर अभिषिक्त किया और वे भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक रामजीकी सेवामें रहने लगे ॥२६॥
रामस्तु परमात्माऽपि कर्माध्यक्षोऽपि निर्मलः ।<br>कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा ॥२७॥<br>आनन्देनापि तुष्टः सन् लोकानामुपदेशकॄत् ।<br>अश्वमेधादियज्ञैश्च सर्वैर्विपुलदक्षिणैः ॥२८॥<br>अयजतपरमानन्दो मानुषं वपुराश्रितः ।<br>न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥२९॥<br>न व्याधिजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ।<br>लोके दस्युभयं नासीदनर्थो नास्ति कश्चन ॥३०॥परमात्मा रामने समस्त कर्मोंके साक्षी, नित्य निर्मलस्वरूप, कर्तृत्वादिसे रहित, सर्वदा निर्विकार और आनन्दतृप्त होकर भी समस्त लोकोंको उपदेश करनेके लिये मनुष्यरूप धारण कर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अश्वमेधादि समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान किया । महाराज रामके राज्य-शासन करते समय कभी विधवाओंका क्रन्दन नहीं हुआ; सर्पों, व्याधियों और लुटेरोंका भय नहीं था और न कोई अनर्थ ही होता था ॥२७-३०॥
वृद्धेषु सत्सु बालानां नासीन्मृत्युभयं तथा ।<br>रामपूजापराः सर्वे सर्वे राघवचिन्तकाः ॥३१॥वृद्धोंके रहते हुए बालकोंकी मृत्युका भय नहीं था, सब लोग भगवान् रामकी पूजा और उनका स्मरण करने-वाले थे ॥३१॥
ववर्षुर्जलदास्तोयं यथाकालं यथारुचि ।<br>प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ॥३२॥मेघ सर्वदा ठीक समयपर यथेष्ट जल बरसाते थे, प्रजा अपना-अपना धर्म पालन करने-वाली और वर्णाश्रमके गुणोंसे युक्त थी ॥३२॥
औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत्प्रजाः ।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वधर्मपरायणः ॥३३॥<br>दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमुपास्त सः ॥३४॥तथा श्रीरामचन्द्रजी भी अपनी प्रजाका सगे पुत्रोंके समान पितृवत् पालन करते थे, इस प्रकार सर्वलक्षणसम्पन्न, सर्वधर्मपरायण भगवान् रामने दश सहस्र वर्ष राज्य-शासन किया ॥३३-३४॥
इदं रहस्यं धनधान्यक्राद्धिम-<br>दीर्घायुरारोग्यकरं सुपुण्यदम् ।<br>पवित्रमाध्यात्मिकसंज्ञितं पुरा<br>रामायणं भाषितमादिशम्भुना ॥३५॥धन-धान्यादि समस्त वैभव देनेवाले तथा दीर्घायु, आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाले इस आध्यात्मिक रामायण नामक परम पवित्र और गोपनीय रहस्यको पूर्वकालमें श्रीआदिमहादेवने पार्वतीजीको सुनाया

| सर्ग १६ ] | युद्धकाण्ड | ३२५ | | :--- | :--- |

| शृणोति भक्त्या मनुजः समाहितो<br>भक्त्या पठेद्वा परितुष्टमानसः।<br>सर्वाः समाप्नोति मनोगताशिषो<br>विमुच्यते पातककोटिभिः क्षणात्॥३६॥<br><br>रामाभिषेकं प्रयतः शृणोति यो<br>धनाभिलाषी लभते महद्धनम्।<br>पुत्राभिलाषी सुतमार्यसम्मतं<br>प्राप्नोति रामायणमादितः पठन् ॥३७॥<br><br>शृणोति योऽध्यात्मिकरामसंहितां<br>प्राप्नोति राजा भुवमृद्धसम्पदम्।<br>शत्रून्विजित्यारिभिरप्रधर्षितो<br>व्यपेतदुःखो विजयी भवेन्नृपः ॥३८॥<br><br>स्त्रियोऽपि शृण्वन्त्यधिरामसंहितां<br>भवन्ति ता जीविसुताश्च पूजिताः।<br>वन्ध्यापि पुत्रं लभते सुरूपिणं<br>कथामिमां भक्तियुता शृणोति या॥३९॥<br><br>श्रद्धान्वितो यः शृणुयात्पठेन्नरो<br>विजित्य कोपं च तथा विमत्सरः।<br>दुर्गाणि सर्वाणि विजित्य निर्भयो<br>भवेत्सुखी राघवभक्तिसंयुतः ॥४०॥<br><br>सुराः समस्ता अपि यान्ति तुष्टतां<br>विघ्नाः समस्ता अपयान्ति शृण्वताम्।<br>अध्यात्मरामायणमादितो नृणां<br>भवन्ति सर्वा अपि सम्पदः पराः ॥४१॥<br><br>रजस्वला वा यदि रामतत्परा<br>शृणोति रामायणमेतदादितः।<br>पुत्रं प्रसूते ऋषभं चिरायुषं<br>पतिव्रता लोकसुपूजिता भवेत् ॥४२॥<br><br>पूजयित्वा तु ये भक्त्या नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।<br>सर्वैः पापैर्विनिर्मुक्ता विष्णोर्यान्ति परं पदम्॥४३॥<br><br>अध्यात्मरामचरितं कृत्स्नं शृण्वन्ति भक्तितः।<br>पठन्ति वा स्वयं वक्त्रात्तेषां रामः प्रसीदति ॥४४॥<br><br>राम एव परं ब्रह्म तस्मिंस्तुष्टेऽखिलात्मनि। | था ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक समाहित-चित्तसे सुनता अथवा प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह अपने मनकी समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है और एक क्षणमें ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस रामाभिषेकका एकाग्र-चित्तसे श्रवण करता है वह महान् सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो पुत्राभिलाषी इस ग्रन्थका आरम्भसे ही पाठ करता है वह सत्पुरुषोंद्वारा सम्मान पानेयोग्य पुत्र पाता है ॥ ३७ ॥ जो राजा इस अध्यात्मरामायणका श्रवण करता है वह धन-धान्यसम्पन्न पृथिवी प्राप्त करता है और शत्रुओंसे अपमानित न होकर सब प्रकारके दुःखसे छूटकर विजय लाभ करता है ॥ ३८ ॥ स्त्रियोंमें भी जो कोई इस आध्यात्मिक रामसंहिताको सुनती हैं उनकी सन्तान चिरजीवी होती है और वे स्वयं उनसे सम्मानित होती हैं तथा जो वन्ध्या भी इस कथाका भक्तिपूर्वक श्रवण करती है वह सुन्दर रूपवान् पुत्र प्राप्त करती है ॥३९॥ जो मनुष्य क्रोधको जीतकर ईर्ष्यारहित हो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है वह समस्त अवगुणोंको जीतकर निर्भय, सुखी और रामभक्तिसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४० ॥ इस अध्यात्मरामायणका आरम्भसे ही श्रवण करनेवाले पुरुषोंसे समस्त देवगण प्रसन्न हो जाते हैं, उनके सम्पूर्ण विघ्न दूर हो जाते हैं और उन्हें सब प्रकारकी उत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४१ ॥ यदि रजस्वला स्त्री भगवान् रामका स्मरण करती हुई आदिसे ही इस रामायणका श्रवण करे तो अति उत्तम और दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करती है और वह स्वयं संसारसे सम्मानित पतिव्रता होती है ॥ ४२ ॥ जो लोग इसका भक्तिपूर्वक पूजन कर इसे नित्यप्रति नमस्कार करते हैं वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥<br><br>जो पुरुष इस सम्पूर्ण अध्यात्मरामायणको भक्तिपूर्वक सुनते अथवा स्वयं अपने मुखसे ही पढ़ते हैं उनसे भगवान् राम प्रसन्न होते हैं ॥ ४४ ॥ भगवान् राम ही परब्रह्म हैं; अतः उन सर्वात्मा रामके प्रसन्न |

३२६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १६

धर्मार्थकाममोक्षाणां यद्यदिच्छति तद्भवेत् ॥४५॥ श्रोतव्यं नियमेनैतद्रामायणमखण्डितम् । आयुष्यमारोग्यकरं कल्पकोट्यघनाशनम् ॥४६॥ देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहाः सर्वे महर्षयः । रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरस्तथा ॥४७॥ अध्यात्मरामायणमेतदद्भुतं वैराग्यविज्ञानयुतं पुरातनम् । पठन्ति शृण्वन्ति लिखन्ति ये नरा- स्तेषां भवेऽस्मिन्न पुनर्भवो भवेत् ॥४८॥ आलोड्याखिलवेदराशिमसकृ- द्यत्तारकं ब्रह्म त- द्रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः । उद्धृत्याखिलसारसङ्ग्रहामदं सङ्क्षेपतः प्रस्फुटं श्रीरामस्य निगूढतत्त्वमखिलं प्राह प्रियायै भवः ॥४९॥ | होनेपर धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमेंसे जिसकी इच्छा हो वही मिल सकता है ॥ ४५ ॥ इसलिये आयु और आरोग्यकी देनेवाली तथा करोड़ों कल्पोंके पापसमूहका नाश करनेवाली इस रामायणका निरन्तर नित्यप्रति नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥४६॥ इसका श्रवण करनेसे समस्त देवगण, सम्पूर्ण ग्रह एवं महर्षिगण प्रसन्न हो जाते हैं तथा पितृगण भी तृप्ति लाभ करते हैं ॥४७॥ जो पुरुष ज्ञान-वैराग्यसे युक्त इस अति अद्भुत प्राचीन अध्यात्मरामायणको पढ़ते, लिखते अथवा सुनते हैं उनका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता ॥ ४८ ॥ भूतनाथ भगवान् शंकरने बारम्बार समस्त वेद-राशिका मन्थन करके यह निश्चय किया कि तारक मन्त्र 'राम' विष्णु-भगवान्की गुप्त मूर्ति है । अतः उन्होंने समस्त वेदों-के सार (उपनिषदों) का संग्रहरूप यह भगवान् रामका सम्पूर्ण गुप्त तत्त्व अपनी प्रिया श्रीपार्वतीजीको संक्षेपसे सुनाया ॥ ४९ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


समाप्तमिदं युद्धकाण्डम् ।

उत्तरकाण्ड

श्रीसीतारामभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण

उत्तरकाण्ड

यद्रूपराकेशमयूखमालाऽनुरञ्जिता राजरमाऽपि रेजे ।
तं राघवेन्द्रं विबुधेन्द्रवन्द्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

(इस पृष्ठ पर केवल श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की मूर्ति/चित्र अंकित है, कोई पाठ्य सामग्री (Text) नहीं है।)

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क्रीडा-विपिनमें श्रीराम-सीता

लसत केलिवनबीच सिय-सियपिय-जोरी सुभग।
उमगत आनंद-वीचि उर-अम्बुधि छवि-ससि निरखि ॥

उत्तरकाण्ड - सर्ग १: अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र

अध्यात्मरामायण

उत्तरकाण्ड


प्रथम सर्ग

भगवान् रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र सुनाना।


जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः।
दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः ॥१॥

अनुवाद: श्रीकौसल्याजीके हृदयको आनन्दित करनेवाले, दशवदन रावणको मारनेवाले, रघुवंशतिलक दशरथकुमार कमलनयन भगवान् रामकी जय हो ॥१॥

पार्वत्युवाच

अथ रामः किमकरोत्कौसल्यानन्दवर्धनः ।
हत्वा मृधे रावणादीन् राक्षसान्भीमविक्रमः ॥ २ ॥
अभिषिक्तस्त्वयोध्यायां सीतया सह राघवः ।
मायामानुषतां प्राप्य कति वर्षाणि भूतले ॥ ३ ॥
स्थितवान् लीलया देवः परमात्मा सनातनः ।
अत्यजन्मानुषं लोकं कथमन्ते रघूद्वहः ॥ ४ ॥
एतदाख्याहि भगवन् श्रद्दधत्या मम प्रभो ।
कथापीयूषमास्वाद्य तृष्णा मेऽतीव वर्धते ।
रामचन्द्रस्य भगवन् ब्रूहि विस्तरशः कथाम् ॥ ५ ॥

अनुवाद: श्रीपार्वतीजी बोलीं—कौसल्याजीके आनन्दको बढ़ानेवाले महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणादि राक्षसोंको मारकर अयोध्यापुरीमें सीताजीके सहित राज्याभिषिक्त होनेके अनन्तर कौन-सा कार्य किया ? लीलाहीसे माया-मानव भावको प्राप्त हुए वे सनातन परमात्मा पृथ्वीतलपर कितने वर्ष रहे ? तथा अन्तमें उन रघुनन्दनने इस मर्त्यलोकका किस प्रकार त्याग किया ? ॥२-४॥ हे प्रभो ! मुझ श्रद्धावतीको आप यह सब वृत्तान्त सुनाइये । हे भगवन् ! श्रीरामकथामृतको आस्वादन करनेसे मेरी तृष्णा बहुत ही बढ़ती जाती है, इसलिये आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथा विस्तारपूर्वक कहिये ॥५॥

श्रीमहादेव उवाच

राक्षसानां वधं कृत्वा राज्ये रामे उपस्थिते ।
आययुर्मुनयः सर्वे श्रीराममभिवन्दितुम् ॥ ६ ॥
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुराङ्गिराः ।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः॥ ७ ॥

अनुवाद: श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! राक्षसोंका वध करनेके अनन्तर भगवान् रामके राजपदपर विराजमान होनेपर समस्त मुनिजन उनका अभिवादन करनेके लिये आये ॥६॥ उस समय विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि तथा निर्मल स्वभाव सप्तर्षिगण और अपने शिष्यों तथा अन्यान्य मुनिजनोंके सहित अगस्त्यजी आये । उन अगस्त्यजी.