भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १५] युद्धकाण्ड ३२१


पुनश्च सर्वं भवतः प्रसादात्-
प्राप्तं हतो राक्षसदुष्टशत्रुः ॥ ६४॥
जानेपर आपकी कृपासे मुझे वह सब सुख फिर प्राप्त हो गया ॥ ६४ ॥

देवा ऊचुः
हता यज्ञभागा धरादेवदत्ता
मुरारे खलेनादिदैत्येन विष्णो।
हतोऽद्य त्वया नो वितानेषु भागाः
पुरावद्भवष्यिन्ति युष्मत्प्रसादात् ॥६५॥
**देवगण बोले—**हे मुरारे ! हे विष्णो ! इस दुष्ट आदिदैत्यने ब्राह्मणोंद्वारा दिये हुए हमारे समस्त यज्ञ-भागोंको हर लिया था। अब आपने उसे मार डाला, अतः आपकी कृपासे अब हमें फिर पहलेके समान ही यज्ञोंमें भाग मिलने लगेंगे ॥ ६५ ॥

पितर ऊचुः
हतोऽद्य त्वया दुष्टदैत्यो महात्मन्
गयादौ नरैर्दत्तपिण्डादिकान्नः।
बलादत्ति हत्वा गृहीत्वा समस्ता-
निदानीं पुनर्लब्धसत्त्वा भवामः॥६६॥
**पितृगण बोले—**हे महात्मन् ! यह दुष्ट दैत्य गया आदि पुण्य-क्षेत्रोंमें मनुष्योंके दिये हुए हमारे पिण्डोदकादिको बलात्कारसे छीन कर खा लेता था; आज आपने इसे मार डाला। अतः अब अपना भाग प्राप्त करके हम फिर शक्ति प्राप्त कर लेंगे ॥ ६६ ॥

यक्षा ऊचुः
सदा विष्टिकर्मण्यनेनाभियुक्ता
वहामो दशास्यं बलाद्दुःखयुक्ताः।
दुरात्मा हतो रावणो राघवेश
त्वया ते वयं दुःखजाताद्विमुक्ताः ॥६७॥
**यक्ष बोले—**हे रघुनाथजी ! यह रावण हमें बलात्कारसे वेगारमें लगा देता था और हम इसकी पालकी आदिमें जुतकर बड़ा कष्ट मानकर इसे ले चलते थे। अतः आज इस दुरात्माको मारकर आपने हमें अनेकों दुःखोंसे छुड़ा दिया ॥ ६७ ॥

गन्धर्वा ऊचुः
वयं सङ्गीतनिपुणा गायन्तस्ते कथामृतम्।
आनन्दामृतसन्दोहयुक्ताः पूर्णाः स्थिताः पुरा॥६८॥
पश्चादुरात्मना राम रावणेनाभिविद्रुताः।
तमेव गायमानाश्च तदाराधनतत्पराः ॥६९॥
स्थितास्त्वया परित्राता हतोऽयं दुष्टराक्षसः।
**गन्धर्व बोले—**प्रभो ! हम संगीतकुशल लोग आपकी अमृततुल्य कथाओंका गान करते हुए पहले आनन्दामृतसमूहसे युक्त होकर मग्न रहते थे ॥ ६८ ॥ किन्तु फिर दुरात्मा रावणद्वारा आक्रान्त होकर हम उसीके गुणगान और उसीकी सेवामें तत्पर हो गये। इस दुष्ट राक्षसको मारकर अब आपने हमें भी बचा लिया।

एवं महोरगाः सिद्धाः किन्नरा मरुतस्तथा ॥७०॥
वसवो मुनयो गावो गुह्यकाश्च पतत्रिणः।
सप्रजापतयश्चैते तथा चाप्सरसां गणाः ॥७१॥
सर्वे रामं समासाद्य दृष्ट्वा नेत्रमहोत्सवम्।
स्तुत्वा पृथक् पृथक् सर्वे राघवेणाभिवन्दिताः ॥७२॥
ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे ब्रह्मरुद्रादयस्तथा।
प्रशंसन्तो मुदा रामं गायन्तस्तस्य चेष्टितम् ॥७३॥
ध्यायन्तस्त्वभिषेकार्द्रं सीतालक्ष्मणसंयुतम्।
सिंहासनस्थं राजेन्द्रं ययुः सर्वे हृदि स्थितम् ॥७४॥
इसी प्रकार सिद्ध, किन्नर, मरुत्, वसु, मुनि, गौ, गुह्यक, पक्षी, प्रजापति और अप्सराओंके समूह सभी भगवान् रामके पास पृथिवीलोकमें आये और उन नयनानन्दवर्धन प्रभुके दर्शन कर उनकी पृथक्-पृथक् स्तुति की तथा उनसे प्रशंसित हो अपने-अपने लोकोंको चले गये। तदनन्तर ब्रह्मा और महादेव आदि भी आनन्दपूर्वक भगवान् रामकी प्रशंसा करते, उनकी लीलाओंका गान करते और सिंहासनपर विराजमान अभिषेकसे आर्द्र राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका सीताजी और लक्ष्मणके सहित हृदयमें ध्यान करते वहाँसे विदा हुए ॥६९-७४॥


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