भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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:३२२अध्यात्मरामायण[सर्ग १६
खे वाद्येषु ध्वनत्सु प्रमुदितहृदयै-<br>      र्देववृन्दैः स्तुवद्भि-<br>र्वर्षद्भिः पुष्पवृष्टिं दिवि मुनिनिकरै-<br>      रीड्यमानः समन्तात् ।<br>रामः श्यामः प्रसन्नस्मितरुचिरमुखः<br>      सूर्यकोटिप्रकाशः<br>सीतासौमित्रिवातात्मजमुनिहरिभिः<br>      सेव्यमानो विभाति ॥७५॥उस समय, जब कि आकाशमें बाजे बज रहे थे, देवताओंका वृन्द स्वर्गमें प्रसन्न हृदयसे स्तुति करता हुआ पुष्प बरसा रहा था तथा महर्षि-मण्डल चारों ओर स्थित होकर स्तुति कर रहा था, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान प्रसन्नतायुक्त मुसकानसे मनोहर मुखवाले श्यामसुन्दर भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान्, मुनिजन तथा वानरगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त सुशोभित हुए ॥ ७५ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥


षोडश सर्ग

वानरोंकी विदा तथा ग्रन्थप्रशंसा।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे ।<br>वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥ १ ॥हे पार्वति ! समस्त लोकोंको सुख देनेवाले राजाधिराज भगवान् रामके राज्याभिषिक्त होनेपर पृथिवी धन-धान्यसे पूर्ण हो गयी और वृक्ष फलयुक्त हो गये ॥ १ ॥
गन्धहीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे ।<br>सहस्रशतसंख्यानां धेनूनां च गवां तथा ॥ २ ॥<br>ददौ शतवृषान्पूर्वं द्विजेभ्यो रघुनन्दनः ।<br>त्रिंशत्कोटिं सुवर्णस्य ब्राह्मणेभ्यो ददौ पुनः ॥ ३ ॥तथा जो पुष्प गन्धहीन थे वे भी सुगन्धयुक्त होकर शोभा पाने लगे । श्रीरघुनाथजी-ने (राज्याभिषिक्त होकर) पहले एक लाख घोड़े, एक लाख दूध देनेवाली गौएँ और सैकड़ों बैल ब्राह्मणोंको दिये और फिर उन्हें तीस करोड़ सुवर्ण-मुद्रा दिये ॥ २-३ ॥
वस्त्राभरणरत्नानि ब्राह्मणेभ्यो मुदा तथा ।<br>सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥ ४ ॥<br>सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो भक्तवत्सलः ।<br>अङ्गदाय ददौ दिव्ये ह्यङ्गदे रघुनन्दनः ॥ ५ ॥तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्न होकर नाना प्रकारके वस्त्र, आभूषण और रत्नादि भी ब्राह्मणों-को दिये । फिर भक्तवत्सल रघुनाथजीने सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त एक सूर्यकी कान्तिके समान चमकती हुई माला अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और अंगदको दो दिव्य अंगद (भुजबन्ध) दिये ॥४-५॥
चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ।<br>सीतायै प्रददौ हारं प्रीत्या रघुकुलोत्तमः ॥ ६ ॥तदनन्तर रघुकुल-तिलक श्रीरामचन्द्रजीने अति प्रेमभावसे करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान अमूल्य मणि और रत्नोंसे विभूषित एक हार श्रीजानकीजीको दिया ॥६॥
अवमुच्यात्मनः कण्ठाद्धारं जनकनन्दिनी ।<br>अवैक्षत हरीन्सर्वांन् भर्तारं च मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥<br>रामस्तामाह वैदेहीमिङ्गितज्ञो विलोकयन् ।श्रीजनकनन्दिनी उस हारको अपने गलेसे उतार-कर बारम्बार अपने पतिदेव और वानरोंकी ओर देखने लगीं ॥ ७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीका संकेत समझ-कर उनकी ओर देखते हुए कहा—"हे सम्पत्ति