भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १६ ] युद्धकाण्ड ३२३


वैदेहि यस्य तुष्टाऽसि देहि तस्मै वरानने ॥ ८ ॥
हनूमते ददौ हारं पश्यतो राघवस्य च ।
तेन हारेणं शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च ॥ ९ ॥

रामोऽपि मारुतिं दृष्ट्वा कृताञ्जलिमुपस्थितम् ।
भक्त्या परमया तुष्ट इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥

हनूमंस्ते प्रसन्नोऽस्मि वरं वरय काङ्क्षितम् ।
दास्यामि देवैरपि यद्दुर्लभं भुवनत्रये ॥ ११ ॥

हनूमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ।
त्वन्नाम स्मरतो राम न तृप्यति मनो मम ॥ १२ ॥

अतस्त्वन्नाम सततं स्मरन् स्थास्यामि भूतले ।
यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् ॥ १३ ॥

मम तिष्ठतु राजेन्द्र वरोऽयं मेऽभिकाङ्क्षितः ।
रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ १४ ॥

कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ।
तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते ॥ १५ ॥

स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्वे ममाज्ञया ।
इत्युक्तो मारुतिस्ताभ्यामीश्वराभ्यां प्रहृष्टधीः ॥ १६ ॥

आनन्दाश्रुपरीताक्षो भूयोभूयः प्रणम्य तौ ।
कृच्छ्राद्ययौ तपस्तप्तुं हिमवन्तं महामतिः ॥ १७ ॥

ततो गुहं समासाद्य रामः प्राञ्जलिमब्रवीत् ।
सखे गच्छ पुरं रम्यं शृङ्गवेरमनुत्तमम् ॥ १८ ॥

मामेव चिन्तयन्नित्यं भुङ्क्ष्व भोगान्निजार्जितान् ।
अन्ते ममैव सारूप्यं प्राप्स्यसे त्वं न संशयः ॥ १९ ॥

इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै दिव्यान्याभरणानि च ।
राज्यं च विपुलं दत्त्वा विज्ञानं च ददौ विभुः ॥ २० ॥

रामेणालिङ्गितो हृष्टो ययौ स्वभवनं गुहः ।


जनकनन्दिनि ! तुम जिससे प्रसन्न हो उसे यह हार दे दो" ॥ ८ ॥ तब सीताजीने श्रीरामचन्द्रजीके सामने ही वह हार हनुमान्‌जीको दे दिया। उस हारको पहन और गौरवान्वित हो श्रीहनुमान्‌जी अत्यन्त शोभाको प्राप्त हुए ॥ ९ ॥

भगवान् रामने भी सामने हाथ जोड़े खड़े हुए हनुमान्‌जीसे उनकी भक्तिके कारण अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—॥ १०॥ "हनुमन् ! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो माँग लो। जो वर त्रिलोकीमें देवताओंको भी मिलना कठिन है वह भी मैं तुम्हें अवश्य दूँगा !" ॥ ११ ॥ तब हनुमान्‌जीने अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहा—"हे रामजी ! आपका नाम-स्मरण करते हुए मेरा चित्त तृप्त नहीं होता ॥ १२॥ अतः मैं निरन्तर आपका नाम-स्मरण करता हुआ पृथिवीपर रहूँ । हे राजेन्द्र ! मेरा मनोवाञ्छित वर यही है कि जबतक संसारमें आपका नाम रहे तबतक मेरा शरीर भी रहे।" श्रीरामचन्द्रजीने कहा—"ऐसा ही हो, तुम जीवन्मुक्त होकर संसारमें सुखपूर्वक रहो ॥ १३-१४॥ कल्पका अन्त होनेपर तुम मेरा सायुज्य प्राप्त करोगे, इसमें सन्देह नहीं।" फिर जानकीजीने उनसे कहा—"हे मारुते ! तुम जहाँ कहीं भी रहोगे वहीं मेरी आज्ञासे तुम्हारे पास सम्पूर्ण भोग उपस्थित हो जायँगे।" अपने प्रभु भगवान् राम और सीताजीके इस प्रकार कहनेपर महामति हनुमान्‌जी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ १५-१६ ॥ और फिर नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर बड़ी कठिनतासे, तपस्या करनेके लिये हिमालयपर चले गये ॥ १७ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़े खड़े हुए गुहके पास जाकर कहा—"मित्र ! अब तुम अपने परम रमणीय ग्राम श्रृंगवेरपुरको जाओ ॥ १८ ॥ वहाँ मेरा ही चिन्तन करते हुए अपने शुभकर्मोंसे प्राप्त हुए भोगों-को भोगो । इसमें सन्देह नहीं, अन्तमें तुम मेरा ही सारूप्य प्राप्त करोगे" ॥ १९ ॥ ऐसा कह भगवान् रामने उसे दिव्य आभूषण, बहुत-सा राज्य और तत्त्व-ज्ञानका उपदेश दिया ॥ २० ॥ फिर श्रीरघुनाथजीसे आलिंगित होकर गुह अपने घरको गया । और भी