भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३२४ अध्यात्मरामायण [सर्ग १६


ये चान्ये वानराः श्रेष्ठा अयोध्थां समुपागताः ॥२१॥<br>अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजयामास राघवः ।<br>सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः ॥२२॥<br>यथार्हं पूजितास्तेन रामेण परमात्मना ।<br>प्रहृष्टमनसः सर्वे जग्मुरेव यथागतम् ॥२३॥जो-जो वानरश्रेष्ठ अयोध्यामें आये थे श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका भी अमूल्य वस्त्र और आभूषणोंसे सत्कार किया । इस प्रकार विभीषणके सहित सुग्रीव आदि समस्त वानरगण परमात्मा रामसे यथोचित सत्कार पाकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥२१-२३॥
सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे किष्किन्धां प्रययुर्मुदा ।<br>विभीषणस्तु सम्प्राप्य राज्यं निहतकण्टकम् ॥२४॥<br>रामेण पूजितः प्रीत्या ययौ लङ्कामनिन्दितः ।<br>राघवो राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः ॥२५॥सुग्रीवादि समस्त वानरगण प्रसन्न-चित्तसे किष्किन्धाको गये और भगवान् रामसे सत्कृत हो अनिन्दित विभीषण अपना निष्कण्टक राज्य पाकर प्रीतिपूर्वक लंकाको गये तथा सबके ऊपर दया करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी अपने सम्पूर्ण राज्यका शासन करने लगे ॥२४-२५॥
अनिच्छन्नपि रामेण यौवराज्येऽभिषेचितः ।<br>लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् ॥२६॥भगवान् रामने श्रीलक्ष्मणजीको उनकी इच्छा न होनेपर भी युवराज-पदपर अभिषिक्त किया और वे भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक रामजीकी सेवामें रहने लगे ॥२६॥
रामस्तु परमात्माऽपि कर्माध्यक्षोऽपि निर्मलः ।<br>कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा ॥२७॥<br>आनन्देनापि तुष्टः सन् लोकानामुपदेशकॄत् ।<br>अश्वमेधादियज्ञैश्च सर्वैर्विपुलदक्षिणैः ॥२८॥<br>अयजतपरमानन्दो मानुषं वपुराश्रितः ।<br>न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥२९॥<br>न व्याधिजं भयं चासीद्रामे राज्यं प्रशासति ।<br>लोके दस्युभयं नासीदनर्थो नास्ति कश्चन ॥३०॥परमात्मा रामने समस्त कर्मोंके साक्षी, नित्य निर्मलस्वरूप, कर्तृत्वादिसे रहित, सर्वदा निर्विकार और आनन्दतृप्त होकर भी समस्त लोकोंको उपदेश करनेके लिये मनुष्यरूप धारण कर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंवाले अश्वमेधादि समस्त यज्ञोंका अनुष्ठान किया । महाराज रामके राज्य-शासन करते समय कभी विधवाओंका क्रन्दन नहीं हुआ; सर्पों, व्याधियों और लुटेरोंका भय नहीं था और न कोई अनर्थ ही होता था ॥२७-३०॥
वृद्धेषु सत्सु बालानां नासीन्मृत्युभयं तथा ।<br>रामपूजापराः सर्वे सर्वे राघवचिन्तकाः ॥३१॥वृद्धोंके रहते हुए बालकोंकी मृत्युका भय नहीं था, सब लोग भगवान् रामकी पूजा और उनका स्मरण करने-वाले थे ॥३१॥
ववर्षुर्जलदास्तोयं यथाकालं यथारुचि ।<br>प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ॥३२॥मेघ सर्वदा ठीक समयपर यथेष्ट जल बरसाते थे, प्रजा अपना-अपना धर्म पालन करने-वाली और वर्णाश्रमके गुणोंसे युक्त थी ॥३२॥
औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत्प्रजाः ।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वधर्मपरायणः ॥३३॥<br>दशवर्षसहस्राणि रामो राज्यमुपास्त सः ॥३४॥तथा श्रीरामचन्द्रजी भी अपनी प्रजाका सगे पुत्रोंके समान पितृवत् पालन करते थे, इस प्रकार सर्वलक्षणसम्पन्न, सर्वधर्मपरायण भगवान् रामने दश सहस्र वर्ष राज्य-शासन किया ॥३३-३४॥
इदं रहस्यं धनधान्यक्राद्धिम-<br>दीर्घायुरारोग्यकरं सुपुण्यदम् ।<br>पवित्रमाध्यात्मिकसंज्ञितं पुरा<br>रामायणं भाषितमादिशम्भुना ॥३५॥धन-धान्यादि समस्त वैभव देनेवाले तथा दीर्घायु, आरोग्य और पुण्यकी वृद्धि करनेवाले इस आध्यात्मिक रामायण नामक परम पवित्र और गोपनीय रहस्यको पूर्वकालमें श्रीआदिमहादेवने पार्वतीजीको सुनाया