भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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| सर्ग १६ ] | युद्धकाण्ड | ३२५ | | :--- | :--- |

| शृणोति भक्त्या मनुजः समाहितो<br>भक्त्या पठेद्वा परितुष्टमानसः।<br>सर्वाः समाप्नोति मनोगताशिषो<br>विमुच्यते पातककोटिभिः क्षणात्॥३६॥<br><br>रामाभिषेकं प्रयतः शृणोति यो<br>धनाभिलाषी लभते महद्धनम्।<br>पुत्राभिलाषी सुतमार्यसम्मतं<br>प्राप्नोति रामायणमादितः पठन् ॥३७॥<br><br>शृणोति योऽध्यात्मिकरामसंहितां<br>प्राप्नोति राजा भुवमृद्धसम्पदम्।<br>शत्रून्विजित्यारिभिरप्रधर्षितो<br>व्यपेतदुःखो विजयी भवेन्नृपः ॥३८॥<br><br>स्त्रियोऽपि शृण्वन्त्यधिरामसंहितां<br>भवन्ति ता जीविसुताश्च पूजिताः।<br>वन्ध्यापि पुत्रं लभते सुरूपिणं<br>कथामिमां भक्तियुता शृणोति या॥३९॥<br><br>श्रद्धान्वितो यः शृणुयात्पठेन्नरो<br>विजित्य कोपं च तथा विमत्सरः।<br>दुर्गाणि सर्वाणि विजित्य निर्भयो<br>भवेत्सुखी राघवभक्तिसंयुतः ॥४०॥<br><br>सुराः समस्ता अपि यान्ति तुष्टतां<br>विघ्नाः समस्ता अपयान्ति शृण्वताम्।<br>अध्यात्मरामायणमादितो नृणां<br>भवन्ति सर्वा अपि सम्पदः पराः ॥४१॥<br><br>रजस्वला वा यदि रामतत्परा<br>शृणोति रामायणमेतदादितः।<br>पुत्रं प्रसूते ऋषभं चिरायुषं<br>पतिव्रता लोकसुपूजिता भवेत् ॥४२॥<br><br>पूजयित्वा तु ये भक्त्या नमस्कुर्वन्ति नित्यशः।<br>सर्वैः पापैर्विनिर्मुक्ता विष्णोर्यान्ति परं पदम्॥४३॥<br><br>अध्यात्मरामचरितं कृत्स्नं शृण्वन्ति भक्तितः।<br>पठन्ति वा स्वयं वक्त्रात्तेषां रामः प्रसीदति ॥४४॥<br><br>राम एव परं ब्रह्म तस्मिंस्तुष्टेऽखिलात्मनि। | था ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक समाहित-चित्तसे सुनता अथवा प्रसन्न-चित्तसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह अपने मनकी समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है और एक क्षणमें ही करोड़ों पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३६ ॥ जो धनकी इच्छा रखनेवाला पुरुष इस रामाभिषेकका एकाग्र-चित्तसे श्रवण करता है वह महान् सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो पुत्राभिलाषी इस ग्रन्थका आरम्भसे ही पाठ करता है वह सत्पुरुषोंद्वारा सम्मान पानेयोग्य पुत्र पाता है ॥ ३७ ॥ जो राजा इस अध्यात्मरामायणका श्रवण करता है वह धन-धान्यसम्पन्न पृथिवी प्राप्त करता है और शत्रुओंसे अपमानित न होकर सब प्रकारके दुःखसे छूटकर विजय लाभ करता है ॥ ३८ ॥ स्त्रियोंमें भी जो कोई इस आध्यात्मिक रामसंहिताको सुनती हैं उनकी सन्तान चिरजीवी होती है और वे स्वयं उनसे सम्मानित होती हैं तथा जो वन्ध्या भी इस कथाका भक्तिपूर्वक श्रवण करती है वह सुन्दर रूपवान् पुत्र प्राप्त करती है ॥३९॥ जो मनुष्य क्रोधको जीतकर ईर्ष्यारहित हो इसे श्रद्धापूर्वक सुनता या पढ़ता है वह समस्त अवगुणोंको जीतकर निर्भय, सुखी और रामभक्तिसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ४० ॥ इस अध्यात्मरामायणका आरम्भसे ही श्रवण करनेवाले पुरुषोंसे समस्त देवगण प्रसन्न हो जाते हैं, उनके सम्पूर्ण विघ्न दूर हो जाते हैं और उन्हें सब प्रकारकी उत्तम सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ४१ ॥ यदि रजस्वला स्त्री भगवान् रामका स्मरण करती हुई आदिसे ही इस रामायणका श्रवण करे तो अति उत्तम और दीर्घायु पुत्र उत्पन्न करती है और वह स्वयं संसारसे सम्मानित पतिव्रता होती है ॥ ४२ ॥ जो लोग इसका भक्तिपूर्वक पूजन कर इसे नित्यप्रति नमस्कार करते हैं वे समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परम धामको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥<br><br>जो पुरुष इस सम्पूर्ण अध्यात्मरामायणको भक्तिपूर्वक सुनते अथवा स्वयं अपने मुखसे ही पढ़ते हैं उनसे भगवान् राम प्रसन्न होते हैं ॥ ४४ ॥ भगवान् राम ही परब्रह्म हैं; अतः उन सर्वात्मा रामके प्रसन्न |

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