भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355
३२६अध्यात्मरामायण[ सर्ग १६

धर्मार्थकाममोक्षाणां यद्यदिच्छति तद्भवेत् ॥४५॥ श्रोतव्यं नियमेनैतद्रामायणमखण्डितम् । आयुष्यमारोग्यकरं कल्पकोट्यघनाशनम् ॥४६॥ देवाश्च सर्वे तुष्यन्ति ग्रहाः सर्वे महर्षयः । रामायणस्य श्रवणे तृप्यन्ति पितरस्तथा ॥४७॥ अध्यात्मरामायणमेतदद्भुतं वैराग्यविज्ञानयुतं पुरातनम् । पठन्ति शृण्वन्ति लिखन्ति ये नरा- स्तेषां भवेऽस्मिन्न पुनर्भवो भवेत् ॥४८॥ आलोड्याखिलवेदराशिमसकृ- द्यत्तारकं ब्रह्म त- द्रामो विष्णुरहस्यमूर्तिरिति यो विज्ञाय भूतेश्वरः । उद्धृत्याखिलसारसङ्ग्रहामदं सङ्क्षेपतः प्रस्फुटं श्रीरामस्य निगूढतत्त्वमखिलं प्राह प्रियायै भवः ॥४९॥ | होनेपर धर्म, अर्थ, काम, मोक्षमेंसे जिसकी इच्छा हो वही मिल सकता है ॥ ४५ ॥ इसलिये आयु और आरोग्यकी देनेवाली तथा करोड़ों कल्पोंके पापसमूहका नाश करनेवाली इस रामायणका निरन्तर नित्यप्रति नियमपूर्वक श्रवण करना चाहिये ॥४६॥ इसका श्रवण करनेसे समस्त देवगण, सम्पूर्ण ग्रह एवं महर्षिगण प्रसन्न हो जाते हैं तथा पितृगण भी तृप्ति लाभ करते हैं ॥४७॥ जो पुरुष ज्ञान-वैराग्यसे युक्त इस अति अद्भुत प्राचीन अध्यात्मरामायणको पढ़ते, लिखते अथवा सुनते हैं उनका इस संसारमें फिर जन्म नहीं होता ॥ ४८ ॥ भूतनाथ भगवान् शंकरने बारम्बार समस्त वेद-राशिका मन्थन करके यह निश्चय किया कि तारक मन्त्र 'राम' विष्णु-भगवान्की गुप्त मूर्ति है । अतः उन्होंने समस्त वेदों-के सार (उपनिषदों) का संग्रहरूप यह भगवान् रामका सम्पूर्ण गुप्त तत्त्व अपनी प्रिया श्रीपार्वतीजीको संक्षेपसे सुनाया ॥ ४९ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


समाप्तमिदं युद्धकाण्डम् ।

अध्यात्म रामायण · पृष्ठ 355, कुल 423 में से · BharatKosha