अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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अध्यात्मरामायण
उत्तरकाण्ड
प्रथम सर्ग
भगवान् रामके यहाँ अगस्त्यादि मुनीश्वरोंका आना और रावणादि राक्षसोंका पूर्वचरित्र सुनाना।
जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः।
दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः ॥१॥
अनुवाद: श्रीकौसल्याजीके हृदयको आनन्दित करनेवाले, दशवदन रावणको मारनेवाले, रघुवंशतिलक दशरथकुमार कमलनयन भगवान् रामकी जय हो ॥१॥
पार्वत्युवाच
अथ रामः किमकरोत्कौसल्यानन्दवर्धनः ।
हत्वा मृधे रावणादीन् राक्षसान्भीमविक्रमः ॥ २ ॥
अभिषिक्तस्त्वयोध्यायां सीतया सह राघवः ।
मायामानुषतां प्राप्य कति वर्षाणि भूतले ॥ ३ ॥
स्थितवान् लीलया देवः परमात्मा सनातनः ।
अत्यजन्मानुषं लोकं कथमन्ते रघूद्वहः ॥ ४ ॥
एतदाख्याहि भगवन् श्रद्दधत्या मम प्रभो ।
कथापीयूषमास्वाद्य तृष्णा मेऽतीव वर्धते ।
रामचन्द्रस्य भगवन् ब्रूहि विस्तरशः कथाम् ॥ ५ ॥
अनुवाद: श्रीपार्वतीजी बोलीं—कौसल्याजीके आनन्दको बढ़ानेवाले महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने युद्धमें रावणादि राक्षसोंको मारकर अयोध्यापुरीमें सीताजीके सहित राज्याभिषिक्त होनेके अनन्तर कौन-सा कार्य किया ? लीलाहीसे माया-मानव भावको प्राप्त हुए वे सनातन परमात्मा पृथ्वीतलपर कितने वर्ष रहे ? तथा अन्तमें उन रघुनन्दनने इस मर्त्यलोकका किस प्रकार त्याग किया ? ॥२-४॥ हे प्रभो ! मुझ श्रद्धावतीको आप यह सब वृत्तान्त सुनाइये । हे भगवन् ! श्रीरामकथामृतको आस्वादन करनेसे मेरी तृष्णा बहुत ही बढ़ती जाती है, इसलिये आप श्रीरामचन्द्रजीकी कथा विस्तारपूर्वक कहिये ॥५॥
श्रीमहादेव उवाच
राक्षसानां वधं कृत्वा राज्ये रामे उपस्थिते ।
आययुर्मुनयः सर्वे श्रीराममभिवन्दितुम् ॥ ६ ॥
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुराङ्गिराः ।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः॥ ७ ॥
अनुवाद: श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! राक्षसोंका वध करनेके अनन्तर भगवान् रामके राजपदपर विराजमान होनेपर समस्त मुनिजन उनका अभिवादन करनेके लिये आये ॥६॥ उस समय विश्वामित्र, असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि तथा निर्मल स्वभाव सप्तर्षिगण और अपने शिष्यों तथा अन्यान्य मुनिजनोंके सहित अगस्त्यजी आये । उन अगस्त्यजी.