भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

अगस्त्यः सहशिष्यैश्च मुनिभिः सहितोऽभ्यगात् ।<br>द्वारमासाद्य रामस्य द्वारपालमथाब्रवीत् ॥ ८ ॥<br>ब्रूहि रामाय मुनयः समागत्य बहिःस्थिताः ।<br>अगस्त्यप्रमुखाः सर्वे आशीर्भिरभिनन्दितुम् ॥ ९ ॥ | ने भगवान् रामके द्वारपर पहुँचकर द्वारपालसे कहा—<br>॥ ७-८॥ तुम महाराज रामसे जाकर कहो कि आपका<br>आशीर्वादोंसे अभिनन्दन करनेके लिये अगस्त्य आदि<br>समस्त मुनिगण आये हैं और बाहर खड़े हुए हैं ॥ ९ ॥ प्रतीहारस्ततो राममगस्त्यवचनाद्द्रुतम् ।<br>नमस्कृत्याऽब्रवीद्वाक्यं विनयावनतः प्रभुम् ॥ १० ॥<br>कृताञ्जलिरुवाचेदमगस्त्यो मुनिभिः सह ।<br>देव त्वद्दर्शनार्थाय प्राप्तो बहिरुपस्थितः ॥ ११ ॥<br>तमुवाच द्वारपालं प्रवेशय यथासुखम् ।<br>पूजिता विविशुर्वेश्म नानारत्नविभूषितम् ॥ १२ ॥<br>दृष्ट्वा रामो मुनीन् शीघ्रं प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।<br>पाद्यार्घ्यादिभिरापूज्य गां निवेद्य यथाविधि ॥ १३॥<br>नत्वा तेभ्यो ददौ दिव्यान्द्यासनानि यथार्हतः ।<br>उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः ॥ १४ ॥<br>सम्पृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ।<br>कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनन्दन ॥ १५ ॥<br>दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिन्दम ।<br>नहि भारः स ते राम रावणो राक्षसेश्वरः ॥ १६ ॥<br>सधनुस्त्वं हि लोकांस्त्रीन् विजेतुं शक्त एव हि ।<br>दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे राक्षसा रावणादयः ॥ १७ ॥<br>सह्यमेतन्महाबाहो रावणस्य निबर्हणम् ।<br>असह्यमेतत्सम्प्राप्तं रावणेर्न्निषूदनम् ॥ १८ ॥<br>अन्तकप्रतिमाः सर्वे कुम्भकर्णादयो मृधे ।<br>अन्तकप्रतिमैर्बाणैर्हतास्ते रघूसत्तम ॥ १९ ॥<br>दत्ता चेयं त्वयाऽस्माकं पुरा ह्यभयदक्षिणा ।<br>हंत्वा रक्षोगणान्सङ्ख्ये कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ २० ॥ | तब द्वारपाल अगस्त्यजीके कहनेसे तुरन्त ही<br>भगवान् रामको नमस्कार कर उनसे अति विनयपूर्वक<br>यों कहने लगा ॥ १० ॥ वह हाथ जोड़कर बोला— "देव !<br>आपके दर्शनोंके लिये मुनियोंके सहित श्रीअगस्त्यजी<br>आये हैं और बाहर खड़े हुए हैं" ॥ ११ ॥ भगवान्<br>रामने द्वारपालसे कहा— "उन्हें आनन्दपूर्वक भीतर<br>ले आओ।" तब मुनियोंने विधिवत् पूजित होकर<br>नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित महलमें प्रवेश किया<br>॥ १२ ॥ भगवान् राम मुनियोंको देखते ही तुरन्त<br>हाथ जोड़कर खड़े हो गये और अर्घ्य-पाद्यादिसे<br>उनका पूजनकर उन्हें विधिपूर्वक एक-एक गौ भेंट की<br>॥ १३ ॥ फिर उन सबको नमस्कार कर यथायोग्य दिव्य<br>आसन दिये। उनपर वे मुनिगण भगवान् रामसे<br>पूजित होकर अति हर्षपूर्वक विराजमान हुए ॥ १४ ॥<br>श्रीरामचन्द्रजीद्वारा कुशल पूछे जानेपर सबने अपनी<br>कुशल कही और उनसे बोले— "हे रघुनन्दन ! हे<br>महाबाहो ! तुम्हारे राज्यमें तो सर्वत्र कुशल है न !<br>॥ १५ ॥ हे शत्रुदमन ! आज हम बड़े भाग्यसे आप-<br>को शत्रुहीन देख रहे हैं। हे राम ! आपके लिये<br>राक्षसराज रावण (का मारना) कुछ भारी नहीं<br>था ॥ १६ ॥ क्योंकि आप धनुष धारण करनेपर तीनों<br>लोकोंको जीतनेमें भी समर्थ हैं । (हमारे) सौभाग्यसे<br>आपने रावण आदि सभी राक्षसोंको मार डाला ॥ १७ ॥<br>और हे महाबाहो ! रावणका मारना तो फिर भी<br>सुगम था परन्तु रावणके पुत्र मेघनादका वध करना<br>तो बड़ा ही दुष्कर कार्य था ॥ १८ ॥ ये कुम्भकर्णादि<br>सभी राक्षस युद्धमें कालके समान थे। हे रघुश्रेष्ठ !<br>वे सब आपके कालके समान कराल बाणोंसे मारे<br>गये ॥ १९ ॥ आपने हमें तो पहले ही अभयदान दे<br>दिया था । अब आप स्वयं भी इन राक्षसोंको युद्धमें<br>मारकर कृतकृत्य हुए जीवित हैं ॥ २० ॥