भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 423 में से

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पृष्ठ 362

सर्ग १ ] उत्तरकाण्ड [ ३३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा तु भाषितं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।<br>विस्मयं परमं गत्वा रामः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥२१॥<br><br>रावणादीनतिक्रम्य कुम्भकर्णादिराक्षसान् ।<br>त्रिलोकजयिनो हित्वा किं प्रशंसथ रावणिम् ॥२२॥उन आत्मनिष्ठ मुनीश्वरोंका भाषण सुन श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो उनसे हाथ जोड़कर पूछा ॥ २१॥ “हे मुनिगण ! आपलोग त्रिलोकविजयी रावण और कुम्भकर्णादि राक्षसोंको छोड़कर रावणके पुत्र मेघनादकी ही प्रशंसा क्यों करते हैं ?” ॥२२॥
ततस्तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः ।<br>कुम्भयोनिर्महातेजा रामं प्रीत्या वचोऽब्रवीत् ॥२३॥महात्मा रघुनाथजीके ये वचन सुनकर परम तेजस्वी मुनिवर अगस्त्यजीने उनसे अति प्रीतिपूर्वक कहा—॥२३॥
शृणु राम यथा वृत्तं रावणे रावणस्य च ।<br>जन्म कर्म वरप्रदानं सङ्क्षेपाददतो मम ॥२४॥“हे राम ! तुम रावण और उसके पुत्रके जन्म, कर्म और वर-प्राप्ति आदिका वृत्तान्त सुनो; मैं उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ ॥ २४ ॥
पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः ।<br>तपस्तप्तुं गतो विद्वान्मेरोः पार्श्वे महामतिः ॥२५॥हे राम ! पूर्वकालमें सतयुगमें ब्रह्माके पुत्र महामति विद्वान् पुलस्त्यजी तप करनेके लिये सुमेरु पर्वतपर गये ॥२५॥
तृणबिन्दोराश्रमेऽसौ न्यवसन्मुनिपुङ्गवः ।<br>तपस्तेपे महातेजाः स्वाध्यायनिरतः सदा ॥२६॥वे महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ तृणबिन्दुके आश्रममें रहने लगे और वहाँ निरन्तर स्वाध्याय ( प्रणव-जप ) में तत्पर रह तप करने लगे ॥ २६ ॥
तत्राश्रमे महारम्ये देवगन्धर्वकन्यकाः ।<br>गायन्त्यो ननृतुस्तत्र हसन्त्यो वादयन्ति च ॥२७॥<br><br>पुलस्त्यस्य तपोविघ्नं चक्रुः सर्वा अनिन्दिताः ।<br>ततः क्रुद्धो महातेजा व्याजहार वचो महत् ॥२८॥उस महा-रमणीय आश्रममें देवता और गन्धर्वोंकी सुन्दरी कन्याएँ गाती, बजाती और हँसती हुई नाचने तथा पुलस्त्यजीके तपमें विघ्न डालने लगीं तब महातेजस्वी पुलस्त्यजी अत्यन्त क्रुद्ध होकर बोले—॥२७-२८॥
या मे दृष्टिपथं गच्छेत्सा गर्भं धारयिष्यति ।<br>ताः सर्वाः शापसंविग्ना न तं देशं प्रचक्रमुः ॥२९॥“जिस (देव या गन्धर्व) कन्यापर मेरी दृष्टि पड़ जायगी वही गर्भवती हो जायगी ।” तब उस शापसे भयभीत होकर उनमेंसे कोई भी उस स्थानपर न आयी ॥२९॥
तृणबिन्दोस्तु राजर्षेः कन्या तन्नाशृणोद्वचः ।<br>विचचार मुनेरग्रे निर्भया तं प्रपश्यती ॥३०॥किन्तु राजर्षि तृणबिन्दुंकी कन्याने ये वाक्य नहीं सुने; इसलिये वह मुनीश्वरके सामने निर्भयतापूर्वक उन्हें देखती हुई घूमती रही ॥३०॥
बभूव पाण्डुरतनुर्व्यञ्जितान्तःशरीरजा ।<br>दृष्ट्वा सा देहवैवर्ण्यं भीता पितरमन्वगात् ॥३१॥इससे वह (गर्भा-वस्थाको प्राप्त होकर) पीली पड़ गयी, तथा उसके स्तन (स्थूल होकर) साफ प्रकट होने लगे। अपने शरीरको विवर्ण हुआ देख वह डरती हुई अपने पिताके पास आयी ॥ ३१ ॥
तृणबिन्दुश्च तां दृष्ट्वा राजर्षिरमितद्युतिः ।<br>ध्यात्वा मुनिकृतं सर्वमवैद्विज्ञानचक्षुषा ॥३२॥जब उसे महातेजस्वी राजर्षि तृणबिन्दुने देखा तो उन्होंने ध्यानद्वारा अपनी ज्ञानदृष्टिसे मुनिवर पुलस्त्यका सब कृत्य जान लिया ॥३२॥
तां कन्यां मुनिवर्याय पुलस्त्याय ददौ पिता ।<br>तां प्रगृह्याब्रवीत्कन्यां बाढमित्येव स द्विजः ॥३३॥तब पिता तृणबिन्दुने वह कन्या मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्यको दी और उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया ॥३३॥
शुश्रूषणपरां दृष्ट्वा मुनिः प्रीतोऽब्रवीद्वचः ।उसे अत्यन्त शुश्रूषापरायण देख मुनिवर पुलस्त्यने उससे प्रसन्न होकर कहा—
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