अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ अध्यात्मरामायणं [ सर्ग १
दास्यामि पुत्रमेकं ते उभयोर्वंशवर्धनम् ॥३४॥
ततः प्रासूत सा पुत्रं पुलस्त्याल्लोकविश्रुतम् । विश्रवा इति विख्यातः पौलस्त्यो ब्रह्मविन्मुनिः ३५ तस्य शीलादिकं दृष्ट्वा भरद्वाजो महामुनिः । भार्यार्थं स्वां दुहितरं ददौ विश्रवसे मुदा ॥३६॥ तस्यां तु पुत्रः सञ्जज्ञे पौलस्त्याल्लोकसम्मतः । पितृतुल्यो वैश्रवणो ब्रह्मणा चानुमोदितः ॥३७॥ ददौ तत्तपसा तुष्टो ब्रह्मा तस्मै वरं शुभम् । मनोऽभिलषितं तस्य धनेशत्वमखण्डितम् ॥३८॥ ततो लब्धवरः सोऽपि पितरं द्रष्टुमागतः । पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता ॥३९॥ नमस्कृत्याथ पितरं निवेद्य तपसः फलम् । प्राह मे भगवान् ब्रह्मा दत्त्वा वरमनिन्दितम् ॥४०॥ निवासाय न मे स्थानं दत्तवान्परमेश्वरः । ब्रूहि मे नियतं स्थानं हिंसा यत्र न कस्यचित् ॥४१॥ विश्रवा अपि तं प्राह लङ्कानाम पुरी शुभा । राक्षसानां निवासाय निर्मिता विश्वकर्मणा ॥४२॥ त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्ते रसातलम् । सा पुरी दुष्प्रधर्षान्यैर्मध्ये सागरमास्थिता ॥४३॥ तत्र वासाय गच्छ त्वं नान्यैः साऽधिष्ठिता पुरा । पित्रादिष्टस्त्वसौ गत्वा तां पुरीं धनदोऽविशत् ॥४४॥ स तत्र सुचिरं कालमुवास पितृसम्मतः ।
कस्यचित्त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः ॥४५॥ रसातलान्मर्त्यलोकं चचार पिशिताशनः । गृहीत्वा तनयां कन्यां साक्षाद्देवीमिव श्रियम् ॥४६॥ अपश्यद्धनदं देवं चरन्तं पुष्पकेण सः ।
"मैं तुझे दोनों वंशों (मातृपक्ष और पितृपक्ष) को बढ़ानेवाला एक पुत्र दूँगा" ॥३४॥
तब उस कन्याने पुलस्त्यजीद्वारा एक त्रिलोक- विख्यात पुत्रको जन्म दिया, जो पुलस्त्य-पुत्र ब्रह्म- वेत्ता मुनिवर विश्रवाके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३५ । विश्रवाका शील-स्वभावादि देखकर महामुनि भरद्वाजने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पुत्री ब्याह दी ॥ ३६ ॥ उससे पुलस्त्यनन्दन विश्रवाने एक त्रिलोकमें प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न किया । वह विश्रवाका पुत्र अपने पिता- हीके समान था तथा ब्रह्माजीने भी उसकी प्रशंसा की थी ॥ ३७ ॥ उसके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने उसे मनोवाञ्छित श्रेष्ठ वर देकर अखण्डित धनेश्वरता दी ॥ ३८ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे धनाध्यक्ष होकर वह उन्हींके दिये हुए महातेजस्वी पुष्पक विमानपर चढ़कर अपने पितासे मिलनेके लिये आया ॥ ३९ ॥ और उन्हें अपने तपका फल निवेदन कर प्रणाम करके बोला— "भगवान् ब्रह्माजीने मुझे यह अत्युत्तम वर दिया है ॥ ४० ॥ किन्तु उन परमेश्वरने मुझे रहनेके लिये कोई स्थान नहीं दिया । अतः आप मुझे कोई ऐसा निश्चित स्थान बताइये जहाँ रहनेसे किसीकी हिंसा न हो" ॥ ४१ ॥ तब विश्रवाने उससे कहा— "(दानवोंके) विश्वकर्माने लंका नामकी एक सुन्दर पुरी राक्षसोंके रहनेके लिये बनायी है ॥ ४२ ॥ किन्तु दैत्य- लोग विष्णुभगवान्के भयसे उसे छोड़कर रसातलको चले गये हैं। उस पुरीका किसी शत्रुसे आक्रान्त होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि वह समुद्रके बीचमें बसी हुई है ॥ ४३ ॥ तुम वहीं रहनेके लिये जाओ । उस पुरीपर इससे पहले और किसीका अधिकार नहीं हुआ।" तब धनपति कुबेरने पिताकी आज्ञासे जाकर उस पुरीमें प्रवेश किया ॥ ४४ ॥ वहाँ अपने पिताकी सम्मतिसे उन्होंने बहुत समयतक निवास किया ।
किसी समय सुमाली नामक एक मांस-भोजी राक्षस साक्षात् लक्ष्मीदेवीके समान रूपवती अपनी छोटी पुत्री- को साथ लिये रसातलसे आकर मर्त्यलोकमें घूम रहा था ॥ ४५-४६ ॥ उसने भगवान् कुबेरको पुष्पक विमान- पर चढ़कर विचरते देखा । तब महामति सुमाली