अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३३३
| हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः ॥४७॥<br>उवाच तनयां तत्र कैकसीं नाम नामतः ।<br>वत्से विवाहकालस्ते यौवनं चातिवर्तते ॥४८॥<br>प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैर्गृह्यसे शुभे ।<br>सा त्वं वरय भद्रं ते मुनिं ब्रह्मकुलोद्भवम् ॥४९॥<br>स्वयमेव ततः पुत्रा भविष्यन्ति महाबलाः ।<br>ईदृशाः सर्वशोभाढ्या धनदेन समाः शुभे ॥५०॥<br>तथेति साऽऽश्रमं गत्वा मुनेरग्रे व्यवस्थिता ।<br>लिखन्ती भुवमग्रेण पादेनाधोमुखी स्थिता ॥५१॥<br>तामपृच्छन्मुनिः का त्वं कन्याऽसि वरवर्णिनि ।<br>साऽब्रवीत्प्राञ्जलिर्ब्रह्मन् ध्यानेन ज्ञातुमर्हसि ॥५२॥<br>ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ।<br>ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्स्यसि ॥५३॥<br>दारुणायां तु वेलायामागतासि सुमध्यमे ।<br>अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ सम्भविष्यतः ॥५४॥<br>साऽब्रवीन्मुनिशार्दूल त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ।<br>तामाह पश्चिमो यस्ते भविष्यति महामतिः ॥५५॥<br>महाभागवतः श्रीमान् रामभक्त्यैकतत्परः ।<br>इत्युक्ता सा तथा काले सुषुवे दशकन्धरम् ॥५६॥<br>रावणं विंशतिभुजं दशशीर्षं सुदारुणम् ।<br>तद्रक्षोजातमात्रेण चचाल च वसुन्धरा ॥५७॥<br>बभूवुर्नाशहेतूनि निमित्तान्यखिलान्यपि ।<br>कुम्भकर्णस्ततो जातो महापर्वतसन्निभः ॥५८॥<br>ततः शूर्पणखा नाम जाता रावणसोदरी ।<br>ततो विभीषणो जातः शान्तात्मा सौम्यदर्शनः॥५९॥<br>स्वाध्यायी नियताहारो नित्यकर्मपरायणः ।<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा द्विजान् सन्तुष्टचेतसः ॥६०॥ | राक्षसोंके हितका उपाय सोचने लगा ॥ ४७ ॥ वह कैकसी नामवाली अपनी कन्यासे बोला—"बेटी ! तेरे विवाहका समय और यौवनकाल बीता जा रहा है॥ ४८॥ किन्तु हे सुन्दरि ! 'तू छोड़ देगी' इस भयसे तुझे कोई वर वरण नहीं करता । अतः तेरा कल्याण हो, तू स्वयं ही जाकर ब्रह्माजीके वंशमें उत्पन्न हुए मुनिवर विश्रवाको वरण कर । हे शुभे ! उनसे तेरे इस कुबेरके समान सर्वशोभासम्पन्न महाबलवान् पुत्र उत्पन्न होंगे ॥ ४९-५० ॥<br><br>तब वह 'बहुत अच्छा' कह मुनीश्वरके आश्रमपर जाकर खड़ी हो गयी और नीचेको मुख किये चरणनखसे पृथिवी कुरेदने लगी ॥ ५१ ॥ मुनीश्वरने उससे पूछा—"हे सुन्दरवर्णवाली ! तू कौन और किसकी कन्या है ? (तथा किसलिये यहाँ आयी है?)" कैकसीने हाथ जोड़कर कहा—"ब्रह्मन् ! आप ध्यानद्वारा सभी कुछ जान सकते हैं" ॥ ५२ ॥ तब मुनिवरने ध्यानद्वारा सब बात जानकर उससे कहा—"मैं तेरी अभिलाषा जान गया, तू मुझसे पुत्रोंकी इच्छा करती है ॥ ५३ ॥ किन्तु, हे सुन्दरि ! तू इस दारुण समयमें आयी है इसलिये तेरे पुत्र भी दो महाभयंकर राक्षस होंगे" ॥ ५४ ॥ उसने कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! क्या आपके द्वारा भी ऐसे पुत्र होने चाहिये ? तब मुनीश्वरने उससे कहा—"उनके पश्चात् तेरे जो पुत्र होगा वह महाबुद्धिमान्, परम भगवद्भक्त, श्रीसम्पन्न और एकमात्र रामभक्तिमें ही तत्पर होगा।"<br><br>मुनीश्वरके ऐसा कहनेपर उसने यथासमय दश शिर और बीस भुजाओंवाले अति भयंकर रावणको जन्म दिया । उस राक्षसके जन्म लेते ही पृथिवी काँपने लगी ॥ ५५–५७ ॥ और संसारके नाशके समस्त कारण उपस्थित हो गये । उसके पश्चात् महापर्वतके समान बड़े डील-डौलवाला कुम्भकर्ण उत्पन्न हुआ ॥ ५८ ॥ फिर रावणकी बहिन शूर्पणखाका जन्म हुआ और उसके पीछे अति शान्तचित्त सौम्यमूर्ति विभीषण उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त स्वाध्यायशील मिताहारी और नित्यकर्मपरायण था । अत्यन्त दारुण दुष्टात्मा कुम्भकर्ण सन्तुष्टचित्त ब्राह्मण और ऋषियोंके समूहोंको |