अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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भक्षयन्नृपिसङ्घांश्च विचचारातिदारुणः।
रावणोऽपि महासत्त्वो लोकानां भयदायकः।
ववृधे लोकनाशाय ह्यादयो देहिनामिव ॥६१॥
राम त्वं सकलान्तरस्थमभितो जानासि विज्ञानदृक्
साक्षी सर्वहृदि स्थितो हि परमो नित्योदितो निर्मलः।
त्वं लीलामनुजाकृतिः स्वमहिमन् मायागुणैर्नज्यसे
लीलार्थं प्रतिचोदितोऽद्य भवता वक्ष्यामि रक्षोद्भवम् ॥६२॥
जानामि केवलमनन्तमचिन्त्यशक्तिं
चिन्मात्रमक्षरमजं विदितात्मतत्त्वम्।
त्वां राम गूढनिजरूपमनुप्रवृत्तो
मूढोऽप्यहं भवदनुग्रहतश्चरामि ॥६३॥
एवं वदन्तमिनवंशपवित्रकीर्तिः
कुम्भोद्भवं रघुपतिः प्रहसन्नभाषे।
मायाश्रितं सकलमेतदनन्यकत्वा-
न्मत्कीर्तनं जगति पापहरं निबोध ॥६४॥
भक्षण करता हुआ पृथिवीपर घूमने लगा। तथा सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करनेवाला महाबली रावण भी प्राणियोंका नाश करनेवाले रोगके समान त्रिलोकीको नष्ट करनेके लिये बढ़ने लगा ॥५९--६१॥
हे राम ! आप सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं और साक्षीरूपसे अपनी ज्ञानदृष्टिद्वारा सबके हृदयस्थित विचारोंको भली भाँति जानते हैं। आप परम श्रेष्ठ, नित्य-प्रबुद्ध और निर्मल हैं। हे अपनी महिमामें स्थित रहनेवाले परमेश्वर ! आपने लीलासे ही यह मनुष्यरूप धारण किया है, किन्तु आप मायाके गुणोंसे लिप्त नहीं होते। आपने लीलावश मुझसे पूछा है, इसीलिये मैं यह राक्षसोंका जन्मवृत्तान्त सुना रहा हूँ ॥ ६२ ॥ हे राम! मैं आपको एकमात्र, अनन्त, अचिन्त्यशक्ति, चिन्मात्र, अक्षर, अजन्मा और आत्मबोधस्वरूप जानता हूँ तथा (मायाके द्वारा) अपने स्वरूपको गुप्त रखनेवाले आपमें (भजनद्वारा) परायण हो मैं मूढ़ भी आपकी कृपासे स्वच्छन्द विचरता रहता हूँ ॥ ६३ ॥ अगस्त्यजीके इस प्रकार कहनेपर सूर्यवंशके सुयशस्वरूप श्रीरघुनाथजीने अगस्त्यजीसे हँसकर कहा—"यह सम्पूर्ण संसार मायामय है, क्योंकि वास्तवमें यह मुझसे पृथक् नहीं है; हे मुने ! तुम मेरे गुण-कीर्तनको ही इस संसारमें सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला जानो ॥ ६४ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
राक्षसोंके राज्यस्थापनका विवरण।
श्रीमहादेव उवाच
श्रीरामवचनं श्रुत्वा परमानन्दनिर्भरः।
मुनिः प्रोवाच सदसि सर्वेषां तत्र शृण्वताम् ॥ १ ॥
अथ वित्तेश्वरो देवस्तत्र कालेन केनचित्।
आययौ पुष्पकारूढः पितरं द्रष्टुमञ्जसा ॥ २ ॥
दृष्ट्वा तं कैकसी तत्र आजमानं महौजसम्।
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! रघुनाथजीके ये वचन सुनकर अगस्त्य मुनि अत्यन्त आनन्दसे भर गये और उस सभामें सबके सुनते हुए फिर कहने लगे—॥ १ ॥ "हे राम! किसी समय धनपति कुबेरजी अकस्मात् अपने पितासे मिलनेके लिये पुष्पक विमानपर चढ़कर आये ॥ २ ॥ जब राक्षसी कैकसीने महातेजस्वी कुबेरको पिताके पास विराजमान देखा तो