अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग २ ] उत्तरकाण्ड ३३५
| राक्षसी पुत्रसामीप्यं गत्वा रावणमब्रवीत् ॥ ३ ॥ | वह अपने पुत्र रावणके पास जाकर बोली—॥ ३ ॥ |
| पुत्र पश्य धनाध्यक्षं ज्वलन्तं स्वेन तेजसा । | "बेटा ! अपने तेजसे प्रकाशमान इस धनपतिको देखो |
| त्वमप्येवं यथा भूयास्तथा यत्नं कुरु प्रभो ॥ ४ ॥ | और हे समर्थ ! तुम भी वही प्रयत्न करो जिससे ऐसे हो जाओ" ॥४॥ यह सुनकर रावणने तुरन्त ही बड़े रोषसे |
| तच्छ्रुत्वा रावणो रोषात् प्रतिज्ञामकरोद्द्रुतम् । | प्रतिज्ञा की—"हे शुभव्रतवाली ! तुम खेद न करो, |
| धनेन समो वाऽपि ह्यधिको वाऽचिरेण तु ॥ ५ ॥ | देखो, मातः ! मैं शीघ्र ही कुबेरके समान अथवा इससे भी अधिक ऐश्वर्यशाली हो जाऊँगा।" |
| भविष्याम्यम्ब मां पश्य सन्तापं त्यज सुव्रते । | |
| इत्युक्त्वा दुष्करं कर्तुं तपः स दशकन्धरः ॥ ६ ॥ | ऐसा कह भाइयोंके सहित रावण इच्छित फल-प्राप्तिके लिये गोकर्ण-क्षेत्रमें दुष्कर तपस्या करने चला |
| अगमत्फलसिद्धयर्थं गोकर्णं तु सहानुजः । | गया । वहाँ वे तीनों भाई अपने-अपने व्रतमें दृढ़ रहकर |
| स्वं स्वं नियममास्थाय भ्रातरस्ते तपो महत् ॥ ७ ॥ | समस्त लोकोंको तपानेवाला अति महान् तप करने |
| आस्थिता दुष्करं घोरं सर्वलोकैकतापनम् । | लगे । उनमेंसे कुम्भकर्णने दश हजार वर्ष तप किया |
| दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्कषः ॥ ८ ॥ | ॥ ५–८ ॥ सत्यधर्मपरायण धर्मात्मा विभीषण भी |
| बिभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः । | पाँच हजार वर्षतक एक ही पाँवसे खड़े रहे ॥ ९ ॥ |
| पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ॥ ९ ॥ | रावण एक हजार दिव्य वर्षतक निराहार रहा, फिर |
| दिव्यवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः । | सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर उसने अपना एक मस्तक अग्नि-में हवन कर दिया। इसी प्रकार उसे नौ हजार दिव्य वर्ष- |
| पूर्णे वर्षसहस्रे तु शीर्षमग्नौ जुहाव सः । | बीत गये ॥ १० ॥ जब दश हजार वर्ष बीतनेको हुए |
| एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः ॥१०॥ | और जिस समय रावण अपना दशवाँ शिर भी |
| अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः । | काटनेको उद्यत हुआ तो धर्मात्मा ब्रह्माजी प्रकट हुए |
| छेत्तुकामस्य धर्मात्मा प्रादुश्चाथ प्रजापतिः । | और बोले—"बेटा रावण ! मैं प्रसन्न हूँ ॥ ११ ॥ तू |
| वत्स वत्स दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥११॥ | वर माँग, मैं तेरी जो इच्छा होगी वही पूर्ण करूँगा।" |
| वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि काङ्क्षितम् । | यह सुन रावणने अति प्रसन्न होकर कहा—॥१२॥ "हे |
| दशग्रीवोऽपि तच्छ्रुत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१२॥ | ईश्वर ! यदि आप मुझे वर ही देना चाहते हैं तो मैं अमरता |
| अमरत्वं वृणोमीश वरदो यदि मे भवान् । | माँगता हूँ । मैं गरुड, सर्प, यक्ष, देव और दानव आदि किसीसे भी न मारा जा सकूँ । ( बस, मैं यही वर |
| सुपर्णनागयक्षाणां देवतानां तथाऽसुरैः । | माँगता हूँ ) बेचारे मनुष्य तो तिनकोंके समान हैं— |
| अवध्यत्वं तु मे देहि तृणभूता हि मानुषाः ॥१३॥ | ( उनसे मुझे भय नहीं है) ॥ १३ ॥ तब ब्रह्माजीने 'ऐसा ही हो' यह कहकर रावणसे फिर कहा—"हे |
| तथास्त्विति प्रजाध्यक्षः पुनराह दशाननम् । | असुरश्रेष्ठ ! तुमने अपने जो शिर अग्निमें होम दिये |
| अग्नौ हुतानि शीर्षाणि यानि तेऽसुरपुङ्गव ॥१४॥ | हैं वे पहलेके समान फिर हो जायँगे तथा हे साधुश्रेष्ठ ! |
| भविष्यन्ति यथापूर्वंमक्षयाणि च सत्तम ॥१५॥ | उनका कभी नाश न होगा" ॥ १४-१५ ॥ |
| एवमुक्त्वा ततो राम दशग्रीवं प्रजापतिः । | हे राम ! रावणसे इस प्रकार कह फिर भक्तवत्सल |
| विभीषणमुवाचेदं प्रणतं भक्तवत्सलः ॥१६॥ | ब्रह्माजीने अति विनीत विभीषणसे कहा—॥ १६ ॥ |