अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ३३६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| विभीषण त्वया वत्स कृतं धर्मार्थमुत्तमम् ।<br>तपस्ततो वरं वत्स वृणीष्वाभिमतं हितम् ॥१७॥<br>विभीषणोऽपि तं नत्वा प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।<br>देव मे सर्वदा बुद्धिर्धर्मे तिष्ठतु शाश्वती ।<br>मा रोचयत्वधर्मे मे बुद्धिः सर्वत्र सर्वदा ॥१८॥<br>ततः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>वत्स त्वं धर्मशीलोऽसि तथैव च भविष्यसि॥१९॥<br>अयाचितोऽपि ते दास्ये ह्यमरत्वं विभीषण ।<br>कुम्भकर्णमथोवाच वरं वरय सुव्रत ॥२०॥<br>वाण्या व्याप्त्तोऽथ तं प्राह कुम्भकर्णः पितामहम् ।<br>स्वप्स्यामि देव षण्मासान्दिनमेकं तु भोजनम्॥२१॥<br>एवमस्त्विति तं प्राह ब्रह्मा दृष्ट्वा दिवौकसः ।<br>सरस्वती च तद्वक्त्रान्निर्गता प्रययौ दिवम् ॥२२॥<br>कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ।<br>अनभिप्रेतमेवास्यात्किं निर्गतमहो विधिः ॥२३॥ | "वत्स विभीषण ! तुमने यह श्रेष्ठ तप धर्मसम्पादनके लिये किया है, इसलिये बेटा ! तुम्हें जो हितकर वर अभीष्ट हो माँगो" ॥ १७ ॥ तब विभीषणने उन्हें नमस्कार कर उनसे हाथ जोड़कर कहा—"भगवन् ! मेरी बुद्धि सर्वदा निश्चलरूपसे धर्ममें ही रहे, उसकी कभी किसी अवस्थामें भी अधर्ममें रुचि न हो" ॥ १८ ॥ इसपर ब्रह्माजीने अति प्रसन्न होकर विभीषणसे कहा—"बेटा ! तुम बड़े धर्मनिष्ठ हो, तुम जैसा चाहते हो वैसा ही होगा ॥ १९ ॥ हे विभीषण ! यद्यपि तुमने माँगा नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें अमरत्वका वर और देता हूँ।" तदनन्तर वे कुम्भकर्णसे बोले—"हे सुव्रत ! तुम वर माँगो" ॥ २० ॥ तब कुम्भकर्णने (देवताओंकी प्रेरणासे फैलायी हुई ) सरस्वती देवीकी मायासे मोहित होकर ब्रह्माजीसे कहा—"हे देव ! मैं छः महीने सोऊँ और एक दिन भोजन करूँ" ॥ २१ ॥ ब्रह्माजीने उससे, देवताओंकी ओर देखते हुए कहा—" ऐसा ही हो।" उनके ऐसा कहते ही सरस्वती तुरन्त ही उसके मुखसे निकलकर स्वर्गलोकको चली गयीं ॥ २२ ॥ तब दुष्टचित्त कुम्भकर्णने मन-ही-मन दुःखित होकर सोचा—"अहो ! भाग्यका चक्र तो देखो, जिसकी मुझे इच्छा ही नहीं है ऐसी बात मेरे मुखसे क्यों निकल गयी ?" ॥ २३ ॥ |
| सुमाली वरलब्धांस्तान् ज्ञात्वा पौत्रान् निशाचरान्<br>पातालान्निर्भयः प्रायात् प्रहस्तादिभिरन्वितः॥२४॥<br>दशग्रीवं परिष्वज्य वचनं चेदमब्रवीत् ।<br>दिष्ट्या ते पुत्र संवृत्तो वाञ्छितो मे मनोरथः॥२५॥<br>यद्भयाच्च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् ।<br>तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ॥२६॥<br>अस्माभिः पूर्वमुषिता लङ्केयं धनदेन ते ।<br>भ्रात्राऽऽक्रान्तामिदानीं त्वं प्रत्यानेतुमिहार्हसि २७<br>साम्ना वाऽथ बलेनापि राज्ञां बन्धुः कुतः सुहृत् । | अपने नाती तीनों राक्षसोंको वर मिलनेका समाचार सुनकर सुमाली प्रहस्तादि राक्षसोंको साथ लिये निर्भयतापूर्वक पातालसे आया ॥ २४ ॥ और रावणको हृदयसे लगाकर बोला—"बेटा ! बड़े आनन्दकी बात है कि आज मेरा चाहा हुआ तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया ॥ २५ ॥ जिसके भयसे हम लंकापुरीको छोड़कर पाताललोकको चले गये थे हे महाबाहो ! आज हमारा वह विष्णुका भय जाता रहा ॥ २६ ॥ इस लंकापुरीमें, जो अब तुम्हारे भाई कुबेरके अधिकारमें है पहले हम रहा करते थे। अब तुम्हें इसे सामनीतिसे अथवा बलपूर्वक फिर लौटा लेना चाहिये, (बन्धुत्वका विचार न करना चाहिये) क्योंकि राजाओंके बन्धु उनके कब हितकारी हुए हैं ? |