अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग २] उत्तरकाण्ड ३३७
इत्युक्तो रावणः प्राह नार्हस्येवं प्रभाषितुम् ॥ २८ ॥
वित्तेशो गुरुरस्माकमेवं श्रुत्वा तमब्रवीत् ।
प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यं रावणं दशकन्धरम् ॥ २९ ॥
शृणु रावण यत्नेन नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ।
नाधीता राजधर्मास्ते नीतिशास्त्रं तथैव च ॥ ३० ॥
शूराणां नहि सौभ्रात्रं शृणु मे वदतः प्रभो ।
कश्यपस्य सुता देवा राक्षसाश्च महाबलाः ॥ ३१ ॥
परस्परमयुध्यन्त त्यक्त्वा सौहृदमायुधैः ।
नैवेदानीन्तनं राजन् वैरं देवैरनुष्ठितम् ॥ ३२ ॥
सुमालीके ऐसा कहनेपर रावणने कहा—"आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥ धनपति कुबेर हमारे बड़े हैं।" यह सुनकर प्रहस्तने रावणसे अति नम्रतापूर्वक कहा—॥ २९ ॥ "हे रावण ! मैं जो कुछ कहता हूँ सावधान होकर सुनो । तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। अभी तुमने राजधर्म और नीतिशास्त्रका अध्ययन नहीं किया है ॥ ३० ॥ शूरवीरोंमें भ्रातृत्व नहीं हुआ करता । हे समर्थ ! इस विषयमें मैं जो कुछ निवेदन करता हूँ सुनिये । महर्षि कश्यपजीकी सन्तान देवता और राक्षस बड़े शूरवीर थे ॥ ३१ ॥ इसलिये वे बन्धुत्वको तिलाञ्जलि देकर परस्पर अस्त्र-शस्त्रोंसे लड़ने लगे । हे राजन् ! देवताओंके साथ हमारा वैर कुछ हालहीका नहीं है ( यह तो आरम्भसे ही चला आता है )" ॥ ३२ ॥
प्रहस्तस्य वचः श्रुत्वा दशग्रीवो दुरात्मनः ।
तथेति क्रोधताम्राक्षस्त्रिकूटाचलमन्वगात् ॥ ३३ ॥
दूतं प्रहस्तं सम्प्रेष्य निष्कास्य धनदेश्वरम् ।
लङ्कामाक्रम्य सचिवै राक्षसैः सुखमास्थितः ॥ ३४ ॥
धनदः पितृवाक्येन त्यक्त्वा लङ्कां महायशाः ।
गत्वा कैलासशिखरं तपसाऽतोषयच्छिवम् ॥ ३५ ॥
तेन सख्यमनुप्राप्य तेनैव परिपालितः ।
अलकां नगरीं तत्र निर्ममे विश्वकर्मणा ॥ ३६ ॥
दिक्पालत्वं चकारात्र शिवेन परिपालितः ।
दुरात्मा प्रहस्तके ये वचन सुनकर रावणने कहा—'तो ठीक है।' उस समय उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तुरन्त ही त्रिकूट पर्वतपर पहुँचा ॥ ३३ ॥ उसने प्रहस्तको अपना दूत बनाकर भेजा और कुबेरको लंकापुरीसे निकालकर उसपर अपना अधिकार किया तथा अपने राक्षस-मन्त्रियोंके सहित वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ३४ ॥ महायशस्वी कुबेरने लंकापुरीको छोड़कर पिताके कहनेसे कैलास-पर्वतपर जाकर तपस्याद्वारा श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥ ३५ ॥ तथा उनसे मित्रता स्थापित कर उन्हींसे सुरक्षित हो वहाँ विश्वकर्मासे अलका नामकी नगरी बनवायी ॥ ३६ ॥ वहाँ वे भगवान् शंकरकी रक्षामें रहकर दिक्पालत्व ( एक दिशाका अधिकार ) भोगने लगे ।
रावणो राक्षसैः सार्धमभिषिक्तः सहानुजैः ॥ ३७ ॥
राज्यं चकारासुराणां त्रिलोकीं बाधयन्खलः ।
भगिनीं कालखञ्जाय ददौ विकटरूपिणीम् ॥ ३८ ॥
विद्युज्जिह्वाय नाम्नासौ महामायी निशाचरः ।
ततो मयो विश्वकर्मा राक्षसानां दितेः सुतः ॥ ३९ ॥
सुतां मन्दोदरीं नाम्ना ददौ लोकैकसुन्दरीम् ।
इधर, महादुष्ट रावण राक्षसोंसे अभिषिक्त हो अपने भाइयोंके सहित तीनों लोकोंको कष्ट देता हुआ राक्षसोंका राज्य करने लगा । उस महामायावी राक्षसने अपनी विकरालबदना बहिन कालखञ्जके वंशमें उत्पन्न हुए विद्युज्जिह्व नामक राक्षसको विवाह दी। इसी समय, राक्षसोंके विश्वकर्मा दितिपुत्र मयने अपनी त्रिलोकसुन्दरी कन्या मन्दोदरी रावणको दी, और फिर उसे प्रसन्न-चित्तसे एक अमोघ
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