भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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.३३८अध्यात्मरामायण[ सर्ग २

रावणाय पुनः शक्तिममोघां प्रीतमानसः ॥४०॥
वैरोचनस्य दौहित्रीं वृत्रज्वालेति विश्रुताम् ।
स्वयन्दत्तामुद्वहत्कुम्भकर्णाय रावणः ॥४१॥
गन्धर्वराजस्य सुतां शैलूषस्य महात्मनः ।
विभीषणस्य भार्यार्थे धर्मज्ञां समुदवहत् ॥४२॥
सरमां नाम सुभगां सर्वलक्षणसंयुताम् ।
ततो मन्दोदरी पुत्रं मेघनादमजीजनत् ॥४३॥
जातमात्रस्तु यो नादं मेघवत्समुमोच ह ।
ततः सर्वेऽब्रुवन्मेघनादोऽयमिति चासकृत् ॥४४॥
कुम्भकर्णस्ततः प्राह निद्रा मां बाधते प्रभो ।
ततश्च कारयामास गुहां दीर्घा सुविस्तराम् ॥४५॥
तत्र सुष्वाप मूढात्मा कुम्भकर्णो विघूर्णितः ।
निद्रिते कुम्भकर्णे तु रावणो लोकरावणः ॥४६॥
ब्राह्मणान् ऋषिमुख्यांश्च देवदानवकिन्नरान् ।
देवश्रियो मनुष्यांश्च निजघ्ने समहोरगान् ॥४७॥
धनदोऽपि ततः श्रुत्वा रावणस्याक्रमं प्रभुः ।
अधर्मं मा कुरुष्वेति दूतवाक्यैर्न्यवारयत् ॥४८॥
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो जगाम धनदालयम् ।
विनिर्जित्य धनाध्यक्षं जहारोत्तमपुष्पकम् ॥४९॥
ततो यमं च वरुणं निर्जित्य समरेऽसुरः ।
स्वर्गलोकमगात्तूर्णं देवराजजिघांसया ॥५०॥
ततोऽभवन्महद्युद्धमिन्द्रेण सह दैवतैः ।
ततो रावणमभ्येत्य बबन्ध त्रिदशेश्वरः ॥५१॥
तच्छ्रुत्वा सहसाऽऽगत्य मेघनादः प्रतापवान् ।
कृत्वा घोरं महद्युद्धं जित्वा त्रिदशपुङ्गवान् ॥५२॥
इन्द्रं गृहीत्वा बद्ध्वाऽसौ मेघनादो महाबलः ।
मोचयित्वा तु पितरं गृहीत्वेन्द्रं ययौ पुरम् ॥५३॥
ब्रह्मा तु मोचयामास देवेन्द्रं मेघनादतः ।
दत्त्वा वरान्वहूस्तस्मै ब्रह्मा स्वभवनं ययौ ॥५४॥ | शक्ति भी दी ॥ ३७-४० ॥ तदनन्तर रावणने, स्वयं लाकर दी हुई वैरोचनकी धेवती वृत्रज्वालाके साथ कुम्भकर्णका विवाह किया ॥ ४१ ॥ तथा गन्धर्वराज महात्मा शैलूषकी पुत्री सरमाको, जो अति सुन्दरी सर्व-सुलक्षणसम्पन्ना और सुसन्न धर्मको जाननेवाली थी, उसने पत्नीरूपसे विभीषणको विवाह दिया । तत्पश्चात् मन्दोदरीने मेघनाद नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥४२-४३॥ जिसने उत्पन्न होते ही मेघके समान शब्द किया । इसलिये सबने बारम्बार यही कहा कि 'यह मेघनाद है' ॥ ४४ ॥ तदनन्तर कुम्भकर्ण बोला— "प्रभो ! मुझे निद्रा सता रही है !" (उसके सुख-पूर्वक सोनेयोग्य कोई स्थान नहीं था इसलिये) फिर उसने एक बड़ी लम्बी-चौड़ी गुहा बनवायी ॥४५॥ वहाँ मन्दमति कुम्भकर्ण खुर्राटे लेता हुआ सो गया । कुम्भकर्णके सो जानेपर सकल लोकोंको रुलानेवाले रावणने ब्राह्मण, मुख्य-मुख्य ऋषि, देवता, दानव, किन्नर, सर्प और मनुष्य सभीको मारा तथा देवताओंकी सम्पत्ति नष्ट कर दी ॥ ४६-४७ ॥<br><br>भगवान् कुबेरने जब रावणकी उच्छृङ्खलताका समाचार सुना तो उन्होंने दूतके मुखसे यह संदेश भेजकर कि 'अधर्म मत करो' उसे रोका ॥ ४८ ॥ इसपर रावण क्रोधित होकर कुबेरकी पुरीपर चढ़ आया और उन्हें परास्त कर उनका अति उत्तम पुष्पक विमान छीन लाया ॥ ४९ ॥ तदनन्तर वह राक्षस युद्धमें यम और वरुणको भी जीतकर इन्द्रका वध करनेकी इच्छासे तुरन्त ही स्वर्गलोकपर चढ़ आया ॥ ५० ॥ वहाँ इन्द्र और अन्य देवताओंके साथ उसका बड़ा घमासान युद्ध हुआ । इस समय देवराज इन्द्रने आगे बढ़कर रावणको बाँध लिया ॥ ५१ ॥ जब यह समाचार महाप्रतापी मेघनादने सुना तो उसने अकस्मात् आकर देवताओंसे घोर युद्ध किया और उन्हें जीतकर इन्द्रको पकड़कर बाँध लिया । फिर महाबली मेघनादने अपने पिताको छुड़ाया और इन्द्रको अपने साथ लेकर लंकापुरीमें लौट आया ॥ ५२-५३ ॥ फिर ब्रह्माजीने जाकर इन्द्रको मेघनादसे छुड़ाया और उसे बहुतसे वर देकर वे अपने लोकको चले गये ॥ ५४ ॥