भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग २ ]उत्तरकाण्ड३३९
रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु ।<br>कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः ॥५५॥<br>तत्र नन्दीश्वरेणैव शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ।<br>वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छेति कोपिना ॥५६॥<br>ततोऽप्यगणयन् वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ।<br>तेन बद्धो दशग्रीवः पुलस्त्येन विमोचितः ॥५७॥<br>ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् ।<br>धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः ॥५८॥<br>भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं हरिः ।<br>विसर्जयामास ततस्तेन सख्यं चकार सः ॥५९॥<br>रावणः परमप्रीत एवं लोकान्महाबलः ।<br>चकार स्ववशे राम बुभुजे स्वयमेव तान् ॥६०॥<br>एवम्प्रभावो राजेन्द्र दशग्रीवः सहेन्द्रजित् ।<br>त्वया विनिहतः सङ्ख्ये रावणो लोकरावणः ॥६१॥<br>मेघनादश्च निहतो लक्ष्मणेन महात्मना ।<br>कुम्भकर्णश्च निहतस्त्वया पर्वतसन्निभः ॥६२॥<br>भवान्नारायणः साक्षाज्जगतामादिकृद्विभुः ।<br>त्वत्स्वरूपमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥६३॥<br>त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>अग्निस्ते मुखतो जातो वाचा सह रघूत्तम ॥६४॥<br>बाहुभ्यां लोकपालांश्चाद्यश्चक्षुर्भ्यां चन्द्रभास्करौ ।<br>दिशश्च विदिशश्चैव कर्णाभ्यां ते समुत्थिताः ॥६५॥<br>घ्राणात्प्राणः समुत्पन्नश्चाश्विनौ देवसत्तमौ ।<br>जङ्घाजानूरुजघनाद्भूवर्लोकादयोऽभवन् ॥६६॥<br>कुक्षिदेशात्समुत्पन्नाश्चत्वारः सागरा हरे ।<br>स्तनाभ्यामिन्द्रवरुणौ वालखिल्याश्च रेतसः ॥६७॥<br>मेढ्राद्यमो गुदान्मृत्युर्मन्यो रुद्रस्त्रिलोचनः ।विजयी रावणने क्रमसे सब लोकोंको जीतकर अपनी परिघके समान बड़ी-बड़ी भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठा लिया ॥५५॥ वहाँ नन्दीश्वरने क्रोधित होकर राक्षसराज रावणको शाप दिया कि 'तू मनुष्य और वानरोंके हाथसे मारा जायगा' ॥५६॥ किन्तु रावणने इस शापको कुछ भी न गिना और तुरन्त ही हैहयराज (सहस्रार्जुन) की राजधानीको चल दिया । वहाँ सहस्रार्जुनने रावणको बाँध लिया । तब उसे पुलस्त्यजीने जाकर छुड़ाया ॥५७॥ फिर वह अत्यन्त बली वानरराज वालीको मारनेके लिये उद्यत हुआ, किन्तु उल्टे उन्होंने रावणको अपनी काँखमें दबा लिया ॥५८॥ और फिर चारों समुद्रोंपर घुमाकर उसे छोड़ दिया । तब रावणने उनसे मित्रता कर ली ॥५९॥ हे राम ! इस प्रकार महाबली रावण सम्पूर्ण लोकोंको अपने अधीन कर उन्हें प्रसन्नतापूर्वक स्वयं ही भोगने लगा ॥६०॥<br>हे राजेन्द्र ! ये दशानन और इन्द्रजित् ऐसे प्रभावशाली थे । (उनमेंसे) लोकोंको रुलानेवाले रावणको आपने मारा और मेघनादका वध महात्मा लक्ष्मणजीने किया तथा पर्वतके समान दीर्घकाय कुम्भकर्णका भी आपनेही संहार किया ॥६१-६२॥ आप सब लोकोंके रचनेवाले साक्षात् सर्वव्यापक नारायणदेव हैं । यह सारा चराचर जगत् आपहीका स्वरूप है ॥६३॥ लोकपितामह ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट हुए कमलसे उत्पन्न हुए हैं तथा हे रघुश्रेष्ठ ! वाणीके सहित अग्निदेवने आपके मुखसे जन्म लिया है ॥६४॥ आपकी भुजाओंसे लोकपालोंके समूह, नेत्रोंसे चन्द्रमा और सूर्य तथा कानोंसे दिशा-विदिशाएँ उत्पन्न हुई हैं ॥६५॥ इसी प्रकार आपकी घ्राणेन्द्रियसे प्राण और देवताओंमें श्रेष्ठ अश्विनीकुमार प्रकट हुए हैं तथा जङ्घा, जानु, उरु और जघनादि अङ्गोंसे भुवर्लोक आदि हुए हैं ॥६६॥ हे हरे ! आपकी कुक्षिसे चार समुद्र, स्तनोंसे इन्द्र और वरुण तथा वीर्यसे बालखिल्यादि मुनीश्वर हुए हैं ॥६७॥ आपकी उपस्थेन्द्रियसे यम, गुदासे मृत्यु, क्रोधसे त्रिनयन