भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३४० अध्यात्मरामायण [सर्ग २


अस्थिभ्यः पर्वता जाताः केशेभ्यो मेघसंहतिः॥६८॥
ओषध्यस्तव रोमेभ्यो नखेभ्यश्च खरादयः।
त्वं विश्वरूपः पुरुषो मायाशक्तिसमन्वितः ॥६९॥
नानारूप इवाभासि गुणव्यतिकरे सति।
त्वामाश्रित्यैव विबुधाः पिबन्त्यमृतमध्वरे ॥७०॥
त्वया सृष्टमिदं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
त्वामाश्रित्यैव जीवन्ति सर्वे स्थावरजङ्गमाः ॥७१॥
त्वद्भक्तमखिलं वस्तु व्यवहारेऽपि राघव।
क्षीरमध्यगतं सर्पिर्यथा व्याप्याखिलं पयः ॥७२॥
त्वद्भासा भासतेऽर्कादि न त्वं तेनावभाससे।
सर्वगं नित्यमेकं त्वां ज्ञानचक्षुर्विलोकयेत् ॥७३॥
नाज्ञानचक्षुस्त्वां पश्येदन्धदृग्भास्करं यथा।
योगिनस्त्वां विचिन्वन्ति स्वदेहे परमेश्वरम्॥७४॥
अतन्निरसनमुखैर्वेदशीर्षैरहर्निशम् ।
त्वत्पादभक्तिलेशेन गृहीता यदि योगिनः ॥७५॥
विचिन्वन्तो हि पश्यन्ति चिन्मात्रं त्वां न चान्यथा।
मया प्रलपितं किञ्चित्सर्वज्ञस्य तवाग्रतः।
क्षन्तुमर्हसि देवेश तवानुग्रहभागहम् ॥७६॥
दिग्देशकालपरिहीनमनन्यमेकं
चिन्मात्रमक्षरमजं चलनादिहीनम्।
सर्वज्ञमीश्वरमनन्तगुणं व्युदस्त-
मायं भजे रघुपतिं भजतामभिन्नम् ॥७७॥

महादेवजी, अस्थियोंसे पर्वतसमूह, केशोंसे मेघ, रोमोंसे ओषधियाँ तथा नखोंसे गधे आदि उत्पन्न हुए हैं। अपनी मायाशक्तिसे युक्त आप ही विश्वरूप परम पुरुष हैं॥६८-६९॥ प्रकृतिके गुणोंके युक्त होनेपर आप ही नानारूप-से दिखायी देने लगते हैं; आपहीके आश्रयमें देवगण यज्ञोंमें अमृतपान करते हैं॥७०॥ यह सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् आपनेही रचा है और समस्त चराचर प्राणी आपहीके आश्रयमें जीवित रहते हैं॥७१॥ हे रघुनाथजी ! जिस प्रकार दूधमें मिला हुआ घी उसमें सर्वत्र व्याप्त रहता है उसी प्रकार व्यवहारकालमें भी सम्पूर्ण वस्तुएँ आपहीसे व्याप्त रहती हैं॥७२॥ सूर्य-चन्द्रादि भी सब आपहीके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं किन्तु आप उनसे प्रकाशित नहीं होते। आप सर्वगत, नित्य और एक हैं, जिस पुरुषको ज्ञानदृष्टि प्राप्त हो जाती है वही आपको देख सकता है॥७३॥ जिस प्रकार अन्धेको सूर्य नहीं दिखायी दे सकता उसी प्रकार जो ज्ञाननेत्रसे रहित हैं वह आपका दर्शन नहीं कर सकता। योगिजन अनात्म-पदार्थोंका बाध करनेवाले उपनिषद्वाक्योंद्वारा अहर्निश आप परमात्माको अपने शरीरमें ही खोजते हैं। यदि उन योगियोंपर आपके चरणोंकी भक्तिका लेशमात्र भी प्रभाव होता है तभी वे खोजते-खोजते अन्तमें चिन्मात्रस्वरूप आपको देख पाते हैं, और किसी प्रकार नहीं। मैंने आप सर्वज्ञके सामने कुछ प्रलाप (बकवाद) किया है, सो आप क्षमा करें, क्योंकि हे देवेश्वर! मैं आपकी कृपाका पात्र हूँ॥७४—७६॥ जो दिशा, देश और कालसे रहित तथा अनन्य, एक, चिन्मात्र, अविनाशी, अजन्मा और चलनादि क्रियासे रहित हैं उन सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, अनन्तगुणसम्पन्न, मायाहीन और अपने भक्तजनोंसे सदा अभिन्न रहनेवाले रघुनाथजीको मैं भजता हूँ॥७७॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥