भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 423 में से

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सगे ३ ] उत्तरकाण्ड ३४१


तृतीय सर्ग

वाली और सुग्रीवका पूर्वचरित्र तथा रावण-सनत्कुमार-संवाद ।

श्रीराम उवाचश्रीरामचन्द्रजी बोले—हे मुने ! मैं वाली और सुग्रीवके जन्मका यथावत् वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। मैंने सुना है कि ये इन्द्र और सूर्य ही वानररूपसे उत्पन्न हुए थे ॥१॥
वालिसुग्रीवयोजन्म श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।<br>रवीन्द्रौ वानराकारौ सञ्जात इति नः श्रुतम् ॥ १ ॥
अगस्त्य उवाचअगस्त्यजी बोले—हे राम ! मेरु पर्वतके मणिके समान प्रकाशमान सुवर्णमय मध्यशिखरपर ब्रह्माजीकी सौ योजन विस्तारवाली सभा है ॥२॥ उसमें चतुर्मुख ब्रह्माजी किसी समय ध्यानस्थ हुए बैठे थे, उस समय उनके नेत्रोंसे बहुत-से दिव्य आनन्दाश्रु गिरे ॥३॥ उन्हें अपने हाथमें लेकर ब्रह्माजीने कुछ चिन्तन कर पृथिवीपर डाल दिया। पृथिवीपर गिरते ही उनसे एक बहुत बड़ा वानर उत्पन्न हुआ ॥४॥ उससे ब्रह्माजीने कहा "वत्स ! तू कुछ समय यहाँ मेरे पास इस सर्वशोभासम्पन्न स्थानमें रह, इससे तेरा कल्याण होगा" ॥५॥ ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर वह वानरश्रेष्ठ वहीं रहने लगा । इस प्रकार बहुत समय बीत जानेपर एक दिन उस परमबुद्धिमान् ऋक्षराजने* फल-मूलादिके लिये घूमते-घूमते एक दिव्य जलपूर्ण और रत्नजटित शिलाओंसे सुशोभित बावड़ी देखी ॥६-७॥ जब वह वहाँ पानी पीनेके लिये गया तो उसने जलमें एक छायामय वानर देखा। उसे अपना प्रतिद्वन्द्वी वानर समझकर वह जलमें कूद पड़ा ॥८॥ किन्तु वहाँ कोई भी वानर न मिलनेपर वह तुरन्त ही उछलकर बाहर निकल आया और अपनेको एक अति सुन्दरी रमणीके रूपमें देखकर बड़ा ही चकित हुआ ॥९॥
मेरोः स्वर्णमयस्याद्रेर्मध्यशृङ्गे मणिप्रभे ।<br>तस्मिन्सभाऽऽस्ते विस्तीर्णा ब्रह्मणः शतयोजना ॥ २॥
तस्यां चतुर्मुखः साक्षात्कदाचिद्योगमास्थितः ।<br>नेत्राभ्यां पतितं दिव्यमानन्दसलिलं बहु ॥ ३ ॥
तद्गृहीत्वा करे ब्रह्मा ध्यात्वा किञ्चित्तदत्यजत् ।<br>भूमौ पतितमात्रेण तस्माज्जातो महाकपिः ॥ ४ ॥
तमाह द्रुहिणो वत्स किञ्चित्कालं वसत्र मे ।<br>समीपे सर्वशोभाढ्ये ततः श्रेयो भविष्यति ॥ ५ ॥
इत्युक्तो न्यवसत्तत्र ब्रह्मणा वानरोत्तमः ।<br>एवं बहुतिथे काले गते ऋक्षांधिपः सुधीः ॥ ६ ॥
कदाचित्पर्यटन्नद्रौ फलमूलार्थमुद्यतः ।<br>अपश्यद्दिव्यसलिलां वापीं मणिशिलान्विताम् ॥ ७ ॥
पानीयं पातुमागच्छत्तत्र छायामयं कपिम् ।<br>दृष्ट्वा प्रतिकपिं मत्वा निपपात जलान्तरे ॥ ८ ॥
तत्रादृष्ट्वा हरिं शीघ्रं पुनरुत्प्लुत्य वानरः ।<br>अपश्यत्सुन्दरीं रामामात्मानं विस्मयं गतः ॥ ९ ॥
ततः सुरेशो देवेशं पूजयित्वा चतुर्मुखम् ।<br>गच्छन्मध्याह्नसमये दृष्ट्वा नारीं मनोरमाम् ॥ १० ॥उस समय देवराज इन्द्र मध्याह्न कालमें ब्रह्माजीकी पूजा करके लौट रहे थे । उस परमसुन्दरी स्त्रीको देखकर वे कामदेवके बाणोंसे बिंध गये और उनका उत्तम वीर्य स्खलित हो गया । वह वीर्य उस स्त्रीको प्राप्त न होकर उसके बालोंको छूता हुआ पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१०-११॥ उससे इन्द्रके समान पराक्रमी वालीका जन्म हुआ । देवराज इन्द्र उसे एक सुवर्णमयी माला देकर स्वर्गलोकको चले गये ॥१२॥
कन्दर्पशरविद्धाङ्गस्त्यक्तवान्वीर्यमुत्तमम् ।<br>तामप्राप्यैव तद्वीजं वालदेशेऽपतद्भुवि ॥ ११ ॥
वाली समभवत्तत्र शक्रतुल्यपराक्रमः ।<br>तस्य दत्त्वा सुरेशानः स्वर्णमालां दिवं गतः ॥ १२॥

* यह उस वानरका नाम था ।

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