भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३४२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

भानुरप्यागतस्तत्र तदानीमेव भामिनीम् ।
दृष्ट्वा कामवशो भूत्वा ग्रीवादेशेऽसृजन्महत् ॥ १३ ॥
बीजं तस्यास्ततः सद्यो महाकायोऽभवद्धरिः ।
तस्य दत्त्वा हनूमन्तं सहायार्थं गतो रविः ॥ १४ ॥
पुत्रद्वयं समादाय गत्वा सा निद्रिता क्वचित् ।
प्रभातेऽपश्यदात्मानं पूर्ववद्वानराकृतिम् ॥ १५ ॥
फलमूलादिभिः सार्धं पुत्राभ्यां सहितः कपिः ।
नत्वा चतुर्मुखस्याग्रे ऋक्षराजः स्थितः सुधीः ॥ १६ ॥
ततोऽब्रवीत्समाश्वास्य बहुशः कपिकुञ्जरम् ।
तत्रैकं देवदूतमाहूयामरसन्निभम् ॥ १७ ॥
गच्छ दूत मयाऽऽदिष्टो गृहीत्वा वानरोत्तमम् ।
किष्किन्धां दिव्यनगरीं निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ १८ ॥
सर्वसौभाग्यवलितां देवैरपि दुरासदाम् ।
तस्यां सिंहानेने वीरं राजानमभिषेचय ॥ १९ ॥
सप्तद्वीपगता ये ये वानराः सन्ति दुर्जयाः ।
सर्वे ते ऋक्षराजस्य भविष्यन्ति वशेऽनुगाः ॥ २० ॥
यदा नारायणः साक्षाद्रामो भूत्वा सनातनः ।
भूभारासुरनाशाय सम्भविष्यति भूतले ॥ २१ ॥
तदा सर्वे सहायार्थं तस्य गच्छन्तु वानराः ।
इत्युक्तो ब्रह्मणा दूतो देवानां स महामतिः ॥ २२ ॥
यथाऽऽज्ञप्तस्तथा चक्रे ब्रह्मणा तं हरीश्वरम् ।
देवदूतस्ततो गत्वा ब्रह्मणे तन्न्यवेदयत् ॥ २३ ॥
तदादि वानराणां सा किष्किन्धाऽभून्नृपाश्रयः । २४ ।
सर्वेश्वरस्त्वमेवासीरिदानीं ब्रह्मणाऽर्थितः ।
भूमेर्भारो हृतः कृत्स्नस्त्वया लीलानृदेहिना ।
सर्वभूतान्तरस्थस्य नित्यमुक्तचिदात्मनः ॥ २५ ॥
अखण्डानन्तरूपस्य कियानेष पराक्रमः ।


उसी समय वहाँ सूर्यदेव भी आये। उस सुन्दरीको देखकर वे कामवश हो गये तथा उसकी ग्रीवापर अपना उग्र वीर्य छोड़ा। उससे उसी समय एक बहुत बड़े शरीरवाला वानर उत्पन्न हुआ। सूर्यदेव उसकी सहायताके लिये उसको हनुमान्‌जी देकर चले गये ॥१३-१४॥

उन दोनों पुत्रोंको लेकर वह स्त्री कहीं जाकर सो गयी। दूसरे दिन सबेरे (उठनेपर) उसने पहलेके समान अपनेको फिर वानररूप ही देखा ॥१५॥ फिर वह परम बुद्धिमान् ऋक्षराज फल-मूलादि लेकर अपने पुत्रोंके सहित ब्रह्माजीकी सभामें आया और उन्हें नमस्कार कर उनके आगे खड़ा हो गया ॥१६॥ तब ब्रह्माजीने उस वानर-वीरको बहुत कुछ समझाया और एक देवतुल्य देवदूतको बुलाकर उससे कहा—॥१७॥ 'हे दूत ! तू मेरी आज्ञासे इन वानरश्रेष्ठको लेकर विश्वकर्माकी बनायी हुई किष्किन्धा नामकी दिव्य पुरीको जा ॥१८॥ वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न है और देवताओंके लिये भी दुर्जय है। उसके सिंहासनपर इस वीरका राज्याभिषेक कर दे ॥१९॥ सातों द्वीपोंमें जो-जो बड़े दुर्जय वानर-वीर हैं वे सब ऋक्षराजके अधीन रहेंगे ॥२०॥ जिस समय साक्षात् सनातन पुरुष नारायणदेव पृथिवीका भार उतारनेके लिये भूलोकमें रामरूपसे अवतीर्ण हों उस समय समस्त वानरगण उनकी सहायताके लिये जायें।' ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर उस महाबुद्धिमान् देवदूतने जिस प्रकार उनकी आज्ञा हुई थी उसी प्रकार उस वानरराजकी सब व्यवस्था कर दी और फिर ब्रह्माजीके पास जाकर उन्हें सब समाचार सुना दिया। तबसे वह किष्किन्धापुरी वानरोंकी राजधानी हो गयी ॥२१-२४॥

हे राम ! आप सबके स्वामी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे अब माया-मानव-रूप धारणकर आपने पृथिवीका सब भार उतार दिया। जो सब भूतोंके भीतर विराजमान नित्यमुक्त और चेतनस्वरूप हैं उन अखण्ड और अनन्तरूप आपके लिये यह ऐसा कौन बड़ा पराक्रम है ? तथापि सम्पूर्ण लोकोंके

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