भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]उत्तरकाण्ड३४३

तथाऽपि वर्ण्यते सद्भिर्लीलामानुषरूपिणः ॥२६॥
यशस्ते सर्वलोकानां पापहर्त्यै सुखाय च ।
य इदं कीर्तयेन्मर्त्यो वालिसुग्रीवयौर्महत् ॥२७॥
जन्म त्वदाश्रयत्वात्स मुच्यते सर्वपातकैः ॥२८॥
...न्यां सम्प्रवक्ष्यामि कथां राम त्वदाश्रयाम्।
सीता हृता यदर्थं सा रावणेन दुरात्मना ॥२९॥
पुरा कृतयुगे राम प्रजापतिसुतं विभुम् ।
सनत्कुमारमेकान्ते समासीनं दशाननः ।
विनयावनतो भूत्वा ह्यभिवाद्येदमब्रवीत् ॥३०॥
को न्वस्मिन्प्रवरो लोके देवानां बलवत्तरः ।
देवाश्च यं समाश्रित्य युद्धे शत्रुं जयन्ति हि ॥३१॥
कं यजन्ति द्विजा नित्यं कं ध्यायन्ति च योगिनः।
एतन्मे शंस भगवन् प्रश्नं प्रश्नविदांवर ॥३२॥
ज्ञात्वा तस्य हृदिस्थं यत्तदशेषेण योगदृक् ।
दशाननमुवाचेदं शृणु वक्ष्यामि पुत्रक ॥३३॥
भर्ता यो जगतां नित्यं यस्य जन्मादिकं नहि ।
सुरासुरैर्नुतो नित्यं हरिर्नारायणोऽव्ययः ॥३४॥
यन्नाभिपङ्कजाज्जातो ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ।
सृष्टं येनैव सकलं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥३५॥
तं समाश्रित्य विबुधा जयन्ति समरे रिपून् ।
योगिनो ध्यानयोगेन तमेवानुजपन्ति हि ॥३६॥
महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच दशाननः ।
दैत्यदानवरक्षांसि विष्णुना निहतानि च ॥३७॥
कां वा गतिं प्रपद्यन्ते प्रेत्य ते मुनिपुङ्गव ।
तमुवाच मुनिश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥३८॥
दैवतैर्निहता नित्यं गत्वा स्वर्गमनुत्तमम् ।
भोगक्षये पुनस्तस्माद्भ्रष्टा भूमौ भवन्ति ते ॥३९॥


पापोंका नाश करनेके लिये और उन्हें सुख देनेके लिये साधुजन आप माया-मानुष-रूप भगवान्‌का सुयश वर्णन करते ही हैं। जो मनुष्य वाली और सुग्रीवके इस महान् चरित्रका कीर्तन करेगा वह आपके आश्रित होनेके कारण सब पापोंसे छूट जायगा ॥२५—२८॥

हे राम ! अब आपसे सम्बन्ध रखनेवाली एक वह कथा और सुनाता हूँ जिस कारण कि दुरात्मा रावणने सीताजीको हरा था ॥ २९॥ पहले एक बार रावणने एकान्तमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र श्रीसनत्‌कुमारजीसे अति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके कहा—॥३०॥ “जिसका आश्रय पाकर देवगण संग्राममें शत्रु-को जीतते हैं इस संसारमें सब देवताओंमें श्रेष्ठ और अधिक बलवान् वह कौन देव है ? ॥३१॥ ब्राह्मणगण किसका पूजन करते हैं और योगीगण किसका ध्यान धरते हैं ? भगवन् ! आप सब प्रकारके प्रश्नोंका उत्तर जाननेवालोंमें श्रेष्ठ हैं, अतः मेरे इस प्रश्नका उत्तर दीजिये” ॥३२॥ भगवान् सनत्कुमारने योगदृष्टिसे रावणके अन्तःकरणकी सब बात जानकर उससे कहा--“वत्स ! मैं तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ, सुनो ॥३३॥ जो सर्वदा सम्पूर्ण संसारका पोषण करनेवाले हैं, जिनके जन्म-मृत्यु आदि नहीं होते, जो देवता और दैत्योंसे सदा वन्दित अविनाशी नारायण श्रीहरि कहलाते हैं ॥ ३४॥ सृष्टि-कर्त्ताओंके स्वामी श्रीब्रह्माजी भी जिनके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, तथा जिन्होंने यह स्थावर-जङ्गम-रूप संसार भी रचा है उन्हींके आश्रयसे देवगण संग्राममें शत्रुओंको जीतते हैं तथा योगिजन भी ध्यानयोगके द्वारा उन्हींका जप करते हैं” ॥३५-३६॥

महर्षि सनत्कुमारके ये वचन सुनकर रावणने फिर पूछा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! उन विष्णुभगवान्‌द्वारा मारे हुए दैत्य, दानव और राक्षसगण मरकर किस गतिको प्राप्त होते हैं ?” तब मुनिवर सनत्कुमारने राक्षसराज रावणसे कहा—॥३७-३८॥ “अन्य साधारण देवताओं-के हाथसे मरकर तो वे अति उत्तम स्वर्गलोकको ही जाते हैं और अपना भोग क्षीण होनेपर वहाँसे गिरकर फिर भूर्लोकमें उत्पन्न होते हैं ॥३९॥ फिर पूर्व-जन्मोंमें किये हुए