भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३४४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ३

पूर्वार्जितैः पुण्यपापैर्म्रियन्ते चोद्भवन्ति च ।<br>विष्णुना ये हतास्ते तु प्राप्नुवन्ति हरेर्गतिम् ॥४०॥ | अपने पाप-पुण्योंके अनुसार जन्मते-मरते रहते हैं; किन्तु जो भगवान् विष्णुके हाथसे मारे जाते हैं वे तो विष्णु-पद ही प्राप्त कर लेते हैं” ॥४०॥

श्रुत्वा मुनिमुखात्सर्वं रावणो हृष्टमानसः ।<br>योत्स्येऽहं हरिणा सार्धमिति चिन्तापरोऽभवत् ४१ | श्रीसनत्कुमारजीके मुखसे ये सब बातें सुनकर रावण मन-ही-मन अति प्रसन्न हुआ और वह सोचने लगा कि मैं श्रीहरिके साथ अवश्य युद्ध करूँगा ॥४१॥

मनःस्थितं परिज्ञाय रावणस्य महामुनिः ।<br>उवाच वत्स तेऽभीष्टं भविष्यति न संशयः ॥४२॥<br>कञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व सुखी भव दशानन । | मुनिवरने रावणके चित्तकी बात जानकर कहा—“वत्स ! इसमें सन्देह नहीं तेरी इच्छा अवश्य सफल होगी ॥ ४२ ॥ हे दशानन ! अभी चैनसे रह, कुछ काल और प्रतीक्षा कर ।”

एवमुक्त्वा महाबाहो मुनिः पुनरुवाच तम् ॥४३॥ | हे महाबाहो रघुनाथजी ! रावणसे ऐसा कह मुनि उससे फिर बोले—॥४३॥

तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि ह्यरूपस्यापि मायिनः ।<br>स्थावरेषु च सर्वेषु नदेषु च नदीषु च ॥४४॥ | “रावण ! वे रूप-रहित हैं, तथापि मैं तुझे उन मायावीके (मायासे धारण किये हुए ) रूप बतलाता हूँ। वे नद और नदी आदि समस्त स्थावरोंमें व्याप्त हैं ॥ ४४ ॥

ओङ्कारश्चैव सत्यं च सावित्री पृथिवी च सः ।<br>समस्तजगदाधारः शेषरूपधरो हि सः ॥४५॥ | ओंकार, सत्य, सावित्री, पृथिवी तथा सम्पूर्ण जगत्‌के आधार शेषनाग भी वे ही हैं ॥ ४५ ॥

सर्वे देवाः समुद्राश्च कालः सूर्यश्च चन्द्रमाः ।<br>सूर्योदयो दिवारात्री यमश्चैव तथाऽनिलः ॥४६॥<br>अग्निरिन्द्रस्तथा मृत्युः पर्जन्यो वसवस्तथा ।<br>ब्रह्मा रुद्रादयश्चैव ये चान्ये देवदानवाः ॥४७॥ | सम्पूर्ण देवगण, समुद्र, काल, सूर्य, चन्द्रमा, सूर्योदय, दिन, रात्रि, यम, वायु, अग्नि, इन्द्र, मृत्यु, मेघ, वसुगण, ब्रह्मा और रुद्र आदि तथा और भी जितने देव या दानव हैं वे सब भी उन्हींके रूप हैं ॥ ४६-४७ ॥

विद्योतते ज्वलत्येष पाति चात्तीति विश्वकृत् ।<br>क्रीडां करोत्यन्यथात्मा सोऽयं विष्णुः सनातनः ४८ | सम्पूर्ण विश्वको रचनेवाले वे सनातन विष्णुभगवान् निर्विकार होकर भी ( अपनी मायाके आश्रयसे ) नाना प्रकार-की लीलाएँ करते हैं। वे (विद्युत् होकर) चमकते हैं, (अग्नि होकर) प्रज्वलित होते हैं, (विष्णु-रूपसे) रक्षा करते हैं और (रुद्ररूपसे) सबको भक्षण कर जाते हैं ॥४८॥

तेन सर्वमिदं व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।<br>नीलोत्पलदलश्यामो विद्युद्वर्णाम्बरावृतः ॥४९॥ | यह स्थावर-जंगम सम्पूर्ण त्रिलोकी एकमात्र उन्हींसे व्याप्त है। वे नीलकमलदलके समान श्यामवर्ण और बिजलीकी-सी आभावाला पीताम्बर धारण किये हुए हैं ॥४९॥

शुद्धजाम्बूनदप्रख्यां श्रियं चामाङ्कसंस्थिताम् ।<br>सदानपायिनीं देवीं पश्यन्नालिङ्ग्य तिष्ठति ॥५०॥ | तथा अपने वाम भागमें बैठी हुई शुद्ध सुवर्णकी-सी कान्तिवाली कभी नष्ट न होनेवाली भगवती लक्ष्मीजीकी ओर निहारते हुए उन्हें आलिङ्गन किये विराजमान हैं ॥५०॥

द्रष्टुं न शक्यते कैश्चिद्देवदानवपन्नगैः । | वे किसी भी देव, दानव या नागसे देखे नहीं जा