भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]
उत्तरकाण्ड
३४५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यस्य प्रसादं कुरुते स चैनं द्रष्टुमर्हति ॥५१॥<br><br>न च यज्ञतपोभिर्वा न दानाध्ययनादिभिः ।<br>शक्यते भगवान्द्रष्टुमुपायैरितरैरपि ॥५२॥<br><br>भक्तैस्तद्गतप्राणैस्तच्चित्तैर्धूतकल्मषैः ।<br>शक्यते भगवान्विष्णुर्वेदान्तामलदृष्टिभिः ॥५३॥<br><br>अथवा द्रष्टुमिच्छा ते शृणु त्वं परमेश्वरम् ।<br>त्रेतायुगे स देवेशो भविता नृपविग्रहः ॥५४॥<br><br>हितार्थं देवमर्त्यानामिक्ष्वाकूणां कुले हरिः ।<br>रामो दाशरथिर्भूत्वा महासत्त्वपराक्रमः ॥५५॥<br><br>पितुर्नियोगात्स भ्रात्रा भार्यया दण्डके वने ।<br>विचरिष्यति धर्मात्मा जगन्मात्रा स्वमायया ॥५६॥<br><br>एवं ते सर्वमाख्यातं मया रावण विस्तरात् ।<br>भजस्व भक्तिभावेन सदा रामं श्रिया युतम् ॥५७॥सकते; जिसपर उनकी प्रसन्नता होती है वही उनका दर्शन कर सकता है ॥५१॥ यज्ञ, तप, दान, अध्ययन अथवा और किसी भी उपायसे भगवान् नहीं देखे जा सकते ॥५२॥ जो उनके भक्त हैं, जिनके प्राण और मन उन्हींमें लगे रहते हैं तथा वेदान्त-विचारसे जिनकी दृष्टि मलहीन हो गयी है उन निष्पाप महात्माओंको ही भगवान् विष्णुके दर्शन हो सकते हैं ॥५३॥ अब यदि तुझे भी (बिना किसी उपायके ही) उन परमेश्वरके दर्शनोंकी इच्छा है तो सुन—वे देवाधिदेव श्रीहरि, त्रेतायुगमें देव और मनुष्योंके कल्याणके लिये, राजवेषसे, इक्ष्वाकुके वंशमें दशरथजीके पुत्र महावीर और पराक्रमी भगवान् राम होकर अवतीर्ण होंगे ॥५४-५५॥ वे परम धार्मिक रघुनाथजी पिताकी आज्ञासे अपने भाई (लक्ष्मण) और अपनी स्त्री जगज्जननी मायाके सहित दण्डक वनमें विचरेंगे ॥५६॥ हे रावण ! इस प्रकार यह सारा तत्त्व मैंने तुझे विस्तारसे सुना दिया । अब तू लक्ष्मीजी सहित भगवान् रामका सदा भक्तिपूर्वक भजन कर" ॥५७॥

अगस्त्य उवाच

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं श्रुत्वाऽसुराध्यक्षो ध्यात्वा किञ्चिद्विचार्य च ।<br>त्वया सह विरोधेप्सुर्मुमुदे रावणो महान् ॥५८॥<br><br>युद्धार्थी सर्वतो लोकान् पर्यटन् समवस्थितः ।<br>एतदर्थं महाराज रावणोऽतीव बुद्धिमान् ।<br>हृतवान् जानकीं देवीं त्वत्ताऽऽत्मवधकाङ्क्षया ॥५९॥<br><br>इमां कथां यः शृणुयात्पठेद्वा<br>संश्रावयेद्वा श्रवणार्थिनां सदा ।<br>आयुष्यमारोग्यमनन्तसौख्यं<br>प्राप्नोति लाभं धनमक्षयं च ॥६०॥अगस्त्यजी बोले—हे राम ! यह सुनकर राक्षसराज रावणने कुछ देर सोच-विचार करनेके अनन्तर आपके साथ विरोध करना निश्चित किया और ऐसा निश्चय कर वह मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ ॥५८॥ वह युद्धकी इच्छासे सम्पूर्ण लोकोंमें घूमने लगा । हे महाराज ! आपके हाथसे मारे जानेकी इच्छासे ही महाबुद्धिमान् रावणने देवी जानकीजीको चुरा लिया था ॥५९॥ जो पुरुष इस कथाको सुने या पढ़ेगा अथवा सुननेकी इच्छावालोंको सदा सुनावेगा वह दीर्घ-आयु, आरोग्य, अनन्त सुख, इच्छित लाभ और अक्षय धन प्राप्त करेगा ॥६०॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥