भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३४६अध्यात्मरामायण[सर्ग ४

चतुर्थ सर्ग

राम-राज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास।


श्रीमहादेव उवाच

एकदा ब्रह्मणो लोकादायान्तं नारदं मुनिम्।
पर्यटन् रावणो लोकान्दृष्ट्वा नत्वाऽब्रवीद्वचः॥ १ ॥

श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! लोकान्तरोंमें घूमते हुए रावणने एक दिन श्रीनारदजीको ब्रह्मलोकसे आते हुए देखकर उनसे नमस्कार करके पूछा—॥ १ ॥


भगवन्ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं ज्ञाताऽसि जगत्त्रयम्॥ २ ॥

"भगवन् ! मैं बलवानोंके साथ युद्ध करना चाहता हूँ, आप तीनों लोकोंसे परिचित हैं। कृपया बतलाइये, मुझसे लड़नेयोग्य महाबली पुरुष कहाँ हैं ?"॥ २ ॥


मुनिर्ध्यात्वाऽऽह सुचिरं श्वेतद्वीपनिवासिनः।
महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते॥ ३ ॥

तब मुनीश्वरने बहुत देरतक सोचकर कहा— "हे महामते ! श्वेतद्वीपके रहनेवाले बड़े बलवान् और विशाल शरीरवाले हैं; तुम वहीं जाओ ॥ ३ ॥


विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये।
त एव तत्र सञ्जाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥ ४ ॥

जो लोग भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहते हैं अथवा जो स्वयं विष्णुभगवान्‌के ही हाथसे मारे गये हैं वे ही वहाँ उत्पन्न हुए हैं। वे देवता या दानव आदि किसीसे भी नहीं जीते जा सकते" ॥ ४ ॥


श्रुत्वा तद्रावणो वेगान्मन्त्रिभिः पुष्पकेण तान्।
योद्धुकामः समागत्य श्वेतद्वीपसमीपतः॥ ५ ॥

यह सुनकर रावण तुरन्त ही अपने मन्त्रियोंके सहित पुष्पक विमानपर चढ़कर श्वेतद्वीपके निकट आया ॥ ५ ॥


तत्रप्राहततेजस्कं पुष्पकं नाचलत्ततः।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ मन्त्रिणश्च दशाननः॥ ६ ॥

उस द्वीपकी प्रभासे तेजोहीन हो जानेके कारण पुष्पक और आगे नहीं बढ़ सका। अतः विमान और मन्त्रियोंको छोड़कर रावण स्वयं ही चला ॥ ६ ॥


प्रविशन्नेव तद्द्वीपं धृतो हस्तेन योषिता।
पृष्टश्च त्वं कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद ॥ ७ ॥

उस द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसका हाथ पकड़कर पूछा— "बता, तू कौन है ? कहाँसे आया है ? और यहाँ तुझे किसने भेजा है ?" ॥ ७ ॥


इत्युक्तो लीलया स्त्रीभिर्हसन्तीभिः पुनः पुनः।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः॥ ८॥

इसी प्रकार वहाँ बहुत-सी स्त्रियोंने लीलापूर्वक हँसते-हँसते उससे वही बात कही और रावणको उन स्त्रियोंके हाथसे बड़ी कठिनतासे छुटकारा मिला ॥ ८ ॥


आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः।
विष्णुना निहतो यामि वैकुण्ठमिति निश्चितः ॥९॥

यह देखकर उसे असीम आश्चर्य हुआ और वह दुर्बुद्धि सोचने लगा, 'मैं विष्णुभगवान्‌के हाथसे मरकर निःसन्देह वैकुण्ठको जाऊँगा ॥ ९ ॥


मयि विष्णुर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम्।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार विपिनेऽसुरः॥१०॥

अतः मुझे ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे भगवान् विष्णु मुझपर कुपित हों' ऐसा सोचकर ही उस असुरने वनमें श्रीजानकीजीको हर लिया था ॥ १० ॥


जानन्नेव परात्मानं स जहारावनीसुताम्।
मातृवत्पालयामास त्वत्तः काङ्क्षन्वधं स्वकम्॥११॥

हे राम ! आपके हाथसे अपना वध करानेकी इच्छासे ही रावणने आपको परमात्मा जानते हुए भी श्रीसीताजीको चुरा लिया और उनका माताके समान पालन किया ॥ ११॥


राम त्वं परमेश्वरोऽसि सकलं
जानासि विज्ञानदृक्

हे राम ! आप परमेश्वर हैं, आप त्रिकालदर्शी