भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ
३४६अध्यात्मरामायण[सर्ग ४

चतुर्थ सर्ग

राम-राज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास।


श्रीमहादेव उवाच

एकदा ब्रह्मणो लोकादायान्तं नारदं मुनिम्।
पर्यटन् रावणो लोकान्दृष्ट्वा नत्वाऽब्रवीद्वचः॥ १ ॥

श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! लोकान्तरोंमें घूमते हुए रावणने एक दिन श्रीनारदजीको ब्रह्मलोकसे आते हुए देखकर उनसे नमस्कार करके पूछा—॥ १ ॥


भगवन्ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं ज्ञाताऽसि जगत्त्रयम्॥ २ ॥

"भगवन् ! मैं बलवानोंके साथ युद्ध करना चाहता हूँ, आप तीनों लोकोंसे परिचित हैं। कृपया बतलाइये, मुझसे लड़नेयोग्य महाबली पुरुष कहाँ हैं ?"॥ २ ॥


मुनिर्ध्यात्वाऽऽह सुचिरं श्वेतद्वीपनिवासिनः।
महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते॥ ३ ॥

तब मुनीश्वरने बहुत देरतक सोचकर कहा— "हे महामते ! श्वेतद्वीपके रहनेवाले बड़े बलवान् और विशाल शरीरवाले हैं; तुम वहीं जाओ ॥ ३ ॥


विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये।
त एव तत्र सञ्जाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥ ४ ॥

जो लोग भगवान् विष्णुकी पूजामें तत्पर रहते हैं अथवा जो स्वयं विष्णुभगवान्‌के ही हाथसे मारे गये हैं वे ही वहाँ उत्पन्न हुए हैं। वे देवता या दानव आदि किसीसे भी नहीं जीते जा सकते" ॥ ४ ॥


श्रुत्वा तद्रावणो वेगान्मन्त्रिभिः पुष्पकेण तान्।
योद्धुकामः समागत्य श्वेतद्वीपसमीपतः॥ ५ ॥

यह सुनकर रावण तुरन्त ही अपने मन्त्रियोंके सहित पुष्पक विमानपर चढ़कर श्वेतद्वीपके निकट आया ॥ ५ ॥


तत्रप्राहततेजस्कं पुष्पकं नाचलत्ततः।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ मन्त्रिणश्च दशाननः॥ ६ ॥

उस द्वीपकी प्रभासे तेजोहीन हो जानेके कारण पुष्पक और आगे नहीं बढ़ सका। अतः विमान और मन्त्रियोंको छोड़कर रावण स्वयं ही चला ॥ ६ ॥


प्रविशन्नेव तद्द्वीपं धृतो हस्तेन योषिता।
पृष्टश्च त्वं कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद ॥ ७ ॥

उस द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसका हाथ पकड़कर पूछा— "बता, तू कौन है ? कहाँसे आया है ? और यहाँ तुझे किसने भेजा है ?" ॥ ७ ॥


इत्युक्तो लीलया स्त्रीभिर्हसन्तीभिः पुनः पुनः।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः॥ ८॥

इसी प्रकार वहाँ बहुत-सी स्त्रियोंने लीलापूर्वक हँसते-हँसते उससे वही बात कही और रावणको उन स्त्रियोंके हाथसे बड़ी कठिनतासे छुटकारा मिला ॥ ८ ॥


आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः।
विष्णुना निहतो यामि वैकुण्ठमिति निश्चितः ॥९॥

यह देखकर उसे असीम आश्चर्य हुआ और वह दुर्बुद्धि सोचने लगा, 'मैं विष्णुभगवान्‌के हाथसे मरकर निःसन्देह वैकुण्ठको जाऊँगा ॥ ९ ॥


मयि विष्णुर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम्।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार विपिनेऽसुरः॥१०॥

अतः मुझे ऐसा कार्य करना चाहिये जिससे भगवान् विष्णु मुझपर कुपित हों' ऐसा सोचकर ही उस असुरने वनमें श्रीजानकीजीको हर लिया था ॥ १० ॥


जानन्नेव परात्मानं स जहारावनीसुताम्।
मातृवत्पालयामास त्वत्तः काङ्क्षन्वधं स्वकम्॥११॥

हे राम ! आपके हाथसे अपना वध करानेकी इच्छासे ही रावणने आपको परमात्मा जानते हुए भी श्रीसीताजीको चुरा लिया और उनका माताके समान पालन किया ॥ ११॥


राम त्वं परमेश्वरोऽसि सकलं
जानासि विज्ञानदृक्

हे राम ! आप परमेश्वर हैं, आप त्रिकालदर्शी

सर्ग ४] उत्तरकाण्ड ३९७


भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलना-एवं विकल्पसे रहित होकर अपनी ज्ञान-दृष्टिसे भूत,
साक्षी विकल्पोज्झितः।भविष्य और वर्तमान ये सब कुछ जानते हैं, हे
भक्तानामनुवर्तनाय सकलांस्वामिन् ! आप अपने भक्तोंको मार्ग दिखानेके लिये
कुर्वन् क्रियासंहतिंही सारी लीलाएँ रचते हैं तथा आप सम्पूर्ण
त्वं शृण्वन्मनुजाकृतिर्मुनिवचोलोकोंसे पूजित होकर भी मनुष्यरूपसे हम-जैसे
भासीश लोकाञ्चितः ॥१२॥मुनियोंके वचन सुनते हुए दिखलायी दे रहे हैं॥१२॥
स्तुत्वैवं राघवं तेन पूजितः कुम्भसम्भवः।इसप्रकार श्रीरघुनाथजीकी स्तुतिकर और उनसे
स्वाश्रमं मुनिभिः सार्धं प्रययौ हृष्टमानसः ॥१३॥सत्कार पा श्रीअगस्त्यजी अन्य मुनीश्वरोंके साथ प्रसन्न-चित्तसे अपने आश्रमको चले गये ॥ १३ ॥
रामस्तु सीतया सार्धं भ्रातृभिः सह मन्त्रिभिः।लक्ष्मीपति भगवान् राम सीताजी, भाइयों तथा
संसारीव रमानाथो रममाणोऽवसद्गृहे ॥१४॥मन्त्रियोंके सहित संसारी पुरुषोंके समान रमण (आचरण) करते हुए घरमें रहने लगे ॥ १४ ॥
अनासक्तोऽपि विषयान्वभुजे प्रियया सह।उन्होंने असंग होते हुए भी अपनी प्रियाके साथ नाना प्रकारके भोगोंको भोगा। वे सदा ही हनुमान्
हनुमत्प्रमुखैः सद्भिर्वानरैः परिवेष्टितः ॥१५॥आदि श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे रहते थे ॥ १५ ॥ एक बार
पुष्पकं चागमद्राममेकदा पूर्ववत्प्रभुम्।पहलेहीके समान भगवान् रामके पास पुष्पक विमान आया और बोला—"भगवन् ! मुझे कुबेरजीने अपने
प्राह देवं कुबेरेण प्रेषितं त्वामहं ततः ॥१६॥यहाँसे फिर आपकीही सेवामें भेजा है ॥ १६ ॥ (वे कहते हैं कि ) पहले तुझे रावणने जीता था
जितं त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितम्।और फिर उससे श्रीरामचन्द्रजीने जीता है। अतः
अतस्त्वं राघवं नित्यं वह यावद्वसेद्भुवि ॥१७॥जबतक वे पृथिवीतलपर रहें तबतक तू उन्हींको धारण कर ॥ १७॥ जिस समय रघुनाथजी वैकुण्ठको
यदा गच्छेद्रुघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा।चले जायँ उस समय तू मेरे पास आ जाना।" यह
तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह पुष्पकं सूर्यसन्निभम् ॥१८॥सुनकर श्रीरघुनाथजीने सूर्यके समान देदीप्यमान पुष्पकसे कहा—॥ १८ ॥ "तेरा कल्याण हो, जिस
यदा स्मरामि भद्रं ते तदाऽऽगच्छ ममान्तिकम्।समय मैं तेरा स्मरण करूँ उसी समय तू मेरे पास आ जाना, अब तू जा और मेरी आज्ञासे गुप्तरूपसे
तिष्ठान्तर्धाय सर्वत्र गच्छेदानीं ममाज्ञया ॥१९॥सर्वत्र रह" ॥ १९ ॥ पुष्पकको इसप्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजी अपने भाइयों और मन्त्रियोंके साथ
इत्युक्त्वा रामचन्द्रोऽपि पौरकार्याणि सर्वशः।मिलकर पुरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य यथायोग्य रीतिसे
भ्रातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं यथान्यायं चकार सः ॥२०॥करने लगे ॥ २० ॥
राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ।त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासन-
वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहाः ॥२१॥कालमें पृथिवी धनधान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे ॥ २१ ॥ श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त
जना धर्मपराः सर्वे पतिभक्तिपराः स्त्रियः।पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति-सेवामें तत्पर रहती
नापश्यत्पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे ॥२२॥थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना
३४८.अध्यात्मरामायण[सर्गः ४
समारुह्य विमानाग्र्यं राघवः सीतया सह ।<br>वानरैर्भ्रातृभिः सार्धं सञ्चचारावनिं प्रभुः ॥२३॥<br>अमानुषाणि कार्याणि चकार बहुशो भुवि ।<br>ब्राह्मणस्य सुतं दृष्ट्वा बालं मृतमकालतः ॥२४॥<br>शोचन्तं ब्राह्मणं चापि ज्ञात्वा रामो महामतिः।<br>तपस्यन्तं वने शूद्रं हत्वा ब्राह्मणबालकम् ॥२५॥<br>जीवयामास शूद्रस्य ददौ स्वर्गमनुत्तमम् ।<br>लोकानाम्युपदेशार्थं परमात्मा रघूत्तमः ॥२६॥<br>कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः ।<br>सीतां च रमयामास सर्वभोगैरमानुषैः ॥२७॥<br>शशास रामो धर्मेण राज्यं परमधर्मवित् ।<br>कथां संस्थापयामास सर्वलोकमलापहाम् ॥२८॥<br>दशवर्षसहस्राणि मायामानुषविग्रहः ।<br>चकार राज्यं विधिवल्लोकवन्द्यपदाम्बुजः ॥२९॥पड़ता था ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीताजी, भाइयों और वानरोंके साथ विमानपर चढ़कर पृथिवीपर घूमा करते थे ॥२३॥ उन्होंने संसारमें बहुत-सी अमानवीय लीलाएँ कीं । एक बार एक ब्राह्मण-पुत्रको बाल्यावस्थामें ही असमय मरा देख और उस ब्राह्मणको बहुत शोक करते जान रघुश्रेष्ठ परमात्मा महामति रामने वनमें तपस्या करते हुए एक शूद्रको (उसका कारण मानकर) मारा और उस बालकको जीवित किया तथा शूद्रको अत्युत्तम स्वर्गलोक दिया ॥२४-२६ ॥ उन्होंने लोगोंको उपदेश देनेके लिये जगह-जगह करोड़ों शिव-लिंग स्थापित किये और सीताजीका सब प्रकारके अलौकिक भोगोंसे अनुरञ्जन किया ॥ २७ ॥ इस प्रकार परमधार्मिक भगवान् राम धर्मपूर्वक राज्य-शासन करते रहे और उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके पाप दूर करनेवाली अपनी पवित्र कीर्ति-कथा संसारमें स्थापित की ॥ २८ ॥ तीनों लोक जिनके चरणकमलोंकी वन्दना करते हैं उन माया-मानव-शरीरधारी श्रीरामचन्द्रजीने विधिपूर्वक दश हजार वर्ष राज्य किया ॥ २९ ॥
एकपत्नीव्रतो रामो राजर्षिः सर्वदा शुचिः ।<br>गृहमेधीयमखिलमाचरन् शिक्षयन् जनान् ॥३०॥<br>सीता प्रेम्णाऽनुवृत्त्या च प्रश्रयेण दमेन च ।<br>भर्तुर्मनोहरा साध्वी भावज्ञा सा हिया भिया ॥३१॥<br>एकदा क्रीडाविपिने सर्वभोगसमन्विते ।<br>एकान्ते दिव्यभवने सुखासीनं रघूत्तमम् ॥३२॥<br>नीलमाणिक्यसंकाशं दिव्याभरणभूषितम् ।<br>प्रसन्नवदनं शान्तं विद्युत्पुञ्जनिभाम्बरम् ॥३३॥<br>सीता कमलपत्राक्षी सर्वाभरणभूषिता ।<br>राममाह कराभ्यां सा लालयन्ती पदाम्बुजे ॥३४॥राजर्षि भगवान् राम एकपत्नीव्रतका पालन करने-वाले थे। वे पवित्र-चरित्र रामजी लोगोंको शिक्षा देते हुए गृहस्थाश्रमके समस्त धर्मोंका पालन करते रहे ॥३०॥ साध्वी सीताजी भी उनके हृदयका रुख परखने-वाली थीं। उन्होंने अपने प्रेम, आज्ञापालन, नम्रता, इन्द्रियसंयम, लज्जा और भीरुता आदि गुणोंसे पतिका मन हर लिया था ॥ ३१ ॥ एक दिन श्रीरघुनाथजी अपने क्रीडावनके सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न भवनमें एकान्तमें सुखपूर्वक बैठे थे। उनके शरीरकी आभा नीलमाणिके समान थी, वे दिव्य भूषणोंसे भूषित थे, उनका मुख प्रसन्न और भाव गम्भीर था तथा वे विद्युत्पुञ्जके समान देदीप्यमान पीताम्बर धारण किये थे। उस समय सर्वालङ्कारसुसज्जिता कमलदललोचना श्रीसीताजीने अपने करकमलोंसे रघुनाथजीकी चरणसेवा करते हुए उनसे कहा-॥ ३२-३४ ॥ “हे देवाधिदेव ! हे

उत्तरकाण्ड - सर्ग ४: रामराज्यका वर्णन तथा सीता-वनवास

सर्ग ४ ] : उत्तरकाण्ड ३४९


संस्कृत (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
देवदेव जगन्नाथ परमात्मन्सनातन ।<br>चिदानन्दादिमध्यान्तरहिताशेषकारण ॥३५॥<br>देव देवाः समासाद्य मामेकान्तेऽब्रुवन्वचः ।<br>बहुशोऽर्थ्यमानास्ते वैकुण्ठागमनं प्रति ॥३६॥<br>त्वया समेतश्चिच्छक्त्या रामस्तिष्ठति भूतले ।<br>विसृज्यास्मान्स्वकं धाम वैकुण्ठं च सनातनम्॥३७॥<br>आस्ते त्वया जगद्धात्रि रामः कमललोचनः ।<br>अग्रतो याहि वैकुण्ठं त्वं तथा चेद्रघूत्तमः ॥३८॥<br>आगमिष्यति वैकुण्ठं सनाथान्नः करिष्यति ।<br>इति विज्ञापिताऽहं तैर्मया विज्ञापितो भवान् ॥३९॥<br>यद्युक्तं तत्कुरुष्वाद्य नाहमाज्ञापये प्रभो ।<br>सीतायास्तद्वचः श्रुत्वा रामो ध्यात्वाऽब्रवीत्क्षणम्४०<br>देवि जानामि सकलं तत्रोपायं वदामि ते ।<br>कल्पयित्वा मिषं देवि लोकवादं त्वदाश्रयम्॥४१॥<br>त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीत इवापरः ।<br>भविष्यतः कुमारौ द्वौ वाल्मीकेराश्रमान्तिके॥४२॥<br>इदानीं दृश्यते गर्भः पुनरागत्य मेऽन्तिकम् ।<br>लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं कृत्वा शपथमादरात् ॥४३॥<br>भूमेर्विवरमात्रेण वैकुण्ठं यास्यसि द्रुतम् ।<br>पश्चादहं गमिष्यामि एष एव सुनिश्चयः ॥४४॥<br>इत्युक्त्वा तां विसृज्याथ रामो ज्ञानैकलक्षणः ।<br>मन्त्रिभिर्मन्त्रतत्त्वज्ञैर्बलमुख्यैश्च संवृतः ॥४५॥<br>तत्रोपविष्टं श्रीरामं सुहृदः पर्युपासत ।<br>हास्यप्रौढकथासुज्ञा हासयन्तः स्थिता हरिम् ॥४६॥<br>कथाप्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् ।<br>पौरा जानपदा मे किं वदन्तीह शुभाशुभम् ॥४७॥जगन्नाथ ! हे सनातन परमात्मन् ! हे चिदानन्द-स्वरूप ! हे आदि, मध्य और अन्तसे रहित सबके कारण ! हे देव ! देवताओंने आकर मुझसे एकान्तमें बहुत कुछ प्रार्थना करते हुए आपके वैकुण्ठ पधारनेके विषयमें कहा है ॥ ३५-३६ ॥ वे कहते हैं कि 'तुझ चिच्छक्तिसे युक्त होकर ही राम हम सबको और अपने सनातन स्थान वैकुण्ठको छोड़कर पृथिवीतलमें ठहरे हुए हैं ॥ ३७ ॥ हे जगद्धात्रि ! कमलनयन राम सदा तेरे साथ ही रहते हैं । यदि तू पहले वैकुण्ठको चली जाय तो श्रीरघुनाथजी भी वहाँ आकर हमें सनाथ कर देंगे ।' मुझसे उन्होंने इसप्रकार कहा है सो मैंने आपको सुना दिया ॥ ३८-३९ ॥ हे प्रभो ! मेरा कोई आदेश तो है नहीं, अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें ।”<br><br>सीताजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने कुछ देर सोचकर कहा- ॥ ४० ॥ “देवि ! मैं यह सब जानता हूँ । उसके लिये मैं तुम्हें उपाय बतलाता हूँ । मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले लोकापवादके मिषसे तुम्हें लोकनिन्दासे डरनेवाले अन्य पुरुषोंके समान वनमें त्याग दूँगा । वहाँ श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमके पास तुम्हारे दो बालक होंगे ॥ ४१-४२ ॥ इस समय तुम्हारे शरीरमें गर्भावथाके चिह्न दिखायी दे रहे हैं । (बालकोंके उत्पन्न होनेपर) तुम मेरे पास फिर आओगी और लोकोंकी प्रतीतिके लिये आदरपूर्वक शपथ करके तुरन्त ही पृथिवीके (फटनेपर उसके) छिद्रद्वारा वैकुण्ठको चली जाओगी । पीछे मैं भी वहाँ आ जाऊँगा; बस, अब यही निश्चय रहा" ॥४३-४४॥<br><br>एकमात्र ज्ञानस्वरूप भगवान् रामने सीताजीसे ऐसा कह उन्हें अन्तःपुरको भेज दिया और स्वयं नीतिशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियों तथा मुख्य-मुख्य सेनापतियोंसे घिरकर वहाँ विराजमान हुए । सुहृद्गण वहाँ बैठे हुए रामकी परिचर्यामें लगे हुए थे और हास्योक्तिमें कुशल विदूषकगण उन्हें हँसा रहे थे ॥ ४५-४६ ॥<br><br>तब भगवान् रामने प्रसंगवश विजय-नामक एक दूतसे पूछा- "मेरे, सीताके, मेरी माता और
३५०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

सीतां वा मातरं वा मे भ्रातॄन्वा कैकयीमथ।<br>न भेतव्यं त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममोपरि ॥४८॥ | भाइयोंके अथवा कैकेयीके विषयमें पुरवासी लोग क्या कहते हैं? मैं तुम्हें अपनी शपथ कराता हूँ, तुम भय न करके सच-सच कहना" ॥४७-४८॥ इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदन्ति ते ।<br>कृतं सुदुष्करं सर्वं रामेण विदितात्मना ॥४९॥<br>किन्तु हत्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ।<br>अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा स्वं वेश्म प्रत्यपादयत् ॥५०॥<br>कीदृशं हृदये तस्य सीतासम्भोगजं सुखम् ।<br>या हृता विजनेऽरण्ये रावणेन दुरात्मना ॥५१॥<br>अस्माकमपि दुष्कर्म योषितां मर्षं भवेत् ।<br>यादृग् भवति वै राजा तादृश्यो नियतं प्रजाः ॥५२॥ | भगवान्‌के इस प्रकार पूछनेपर विजयने कहा—<br>"देव ! सभी लोग कहते हैं कि आत्मज्ञानी महाराज रामने जो कार्य किये हैं वे सभी बड़े दुष्कर हैं ॥४९॥ किन्तु उन्होंने रावणको मारकर सीताको बिना किसी प्रकारका सन्देह किये ही अपने साथ लाकर घर रख लिया ( यह ठीक नहीं किया) ॥५०॥ भला, जिस सीताको दुरात्मा रावणने निर्जन वनमें हर लिया था न जाने उसके साथ भोग भोगते हुए उन्हें क्या सुख मिलता है? ॥५१॥ अब हमें भी अपनी स्त्रियोंके दुश्चरित्रको सहन करना पड़ेगा, क्योंकि जैसा राजा होता है प्रजा भी निःसन्देह वैसी ही होती है" ॥५२॥ श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनान्पर्यपृच्छत ।<br>तेऽपि नत्वाऽब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥५३॥ | उसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने आत्मीयोंसे पूछा। उन्होंने भी रघुनाथजीको प्रणाम करके यही कहा कि निःसन्देह ऐसी ही बात है ॥५३॥ ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा ।<br>आहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥५४॥<br>लोकापवादस्तु महान्सीतामाश्रित्य मेऽभवत् ।<br>सीतां प्रातः समानीय वाल्मीकेराश्रमान्तिके ॥५५॥<br>त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण ।<br>वक्ष्यसे यदि वा किञ्चित्तदा मां हतवानसि ॥५६॥ | तब श्रीरामचन्द्रजीने मन्त्रीगण, विजय और अपने सुहृदोंको विदाकर श्रीलक्ष्मणजीको बुलाया और उनसे इस प्रकार कहने लगे—"भैया लक्ष्मण ! सीताके कारण मेरी बड़ी लोकनिन्दा हो रही है। अतः तुम कल सबेरे ही सीताको रथपर चढ़ाकर वाल्मीकि मुनिके आश्रमके समीप छोड़ आओ । इस विषयमें यदि तुम कुछ कहोगे तो मानो मेरी हत्या ही करोगे" ॥५४-५६॥ इत्युक्तो लक्ष्मणो भीत्या प्रातरुत्थाय जानकीम् ।<br>सुमन्त्रेण रथे कृत्वा जगाम सहसा वनम् ॥५७॥<br>वाल्मीकेराश्रमस्यान्ते त्यक्त्वा सीतामुवाच सः।<br>लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने॥५८॥<br>दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणः शीघ्रं गतवान् रामसन्निधिम् ॥ | भगवान्‌की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मणजी डर गये । उन्होंने सबेरे उठते ही सुमन्त्रसे रथ जुड़वाया और उसमें जानकीजीको चढ़ाकर तुरन्त वनको चल दिये ॥५७॥ वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर पहुँचते ही उन्होंने सीताको उतार दिया और उनसे कहा—"रघुनाथजीने लोकापवादसे डरकर तुम्हें त्याग दिया है ॥५८॥ हे मातः ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, अब तुम मुनीश्वरके आश्रमपर चली जाओ ।" सीताजीसे इस प्रकार कह लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीरामचन्द्रजीके पास चले आये ॥ ५९ ॥ सीताऽपि दुःखसन्तप्ता विललापातिमुञ्चवत् । | उस समय सीताजी अत्यन्त दुःखार्ता होकर अति

सर्ग ५ ] : उत्तरकाण्ड ३५१


शिष्यैः श्रुत्वा च वाल्मीकिः सीतां ज्ञात्वा स दिव्यदृक्।<br>अर्घ्यादिभिः पूजयित्वा समाश्वास्य च जानकीम् ।<br>ज्ञात्वा भविष्यं सकलमार्पयन्मुनियोषितम् ॥६१॥मूर्खा स्त्रियोंके समान विलाप करने लगीं। महर्षि वाल्मीकिने जब शिष्योंके मुखसे यह बात सुनी (कि एक स्त्री रो रही है) तो उन्होंने दिव्यदृष्टिसे जान लिया कि वह सीताजी ही हैं ॥६०॥ मुनि भविष्यमें होनेवाली सब बातें जानते थे। अतः उन्होंने अर्ध्यादिसे सीताजीका पूजन किया और उन्हें समझा-बुझाकर मुनिपत्नियोंको सौंप दिया ॥६१॥ वे मुनि-पत्नियाँ मुनीश्वरके कहनेसे उन्हें साक्षात् परमात्माकी भार्या लक्ष्मीजी जानकर नित्यप्रति भक्ति-भावसे उनकी पूजा करतीं और सदा ही अत्यन्त आदरसे नम्रतापूर्वक उनकी सेवा करती थीं ॥६२॥ इधर, सीताजीको त्याग देनेपर, जिनके चरणकमलोंका मुनिजन सेवन करते हैं वे विज्ञानचक्षु, अद्वितीय, आदिदेव परमात्मा राम भी समस्त भोगोंको छोड़कर वैराग्यपूर्वक मुनियोंके समान रहने लगे ॥६३॥
तास्तां सम्पूजयन्ति स्म सीतां भक्त्या दिने दिने ।<br>ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन योषितः ।<br>सेवा चक्रुः सदा तस्या विनयादिभिरादरात् ॥६२॥
रामोऽपि सीतारहितः परात्मा<br>विज्ञानदृक्केवल आदिदेवः ।<br>सन्त्यज्य भोगानखिलान्विरक्तो<br>मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेविताङ्घ्रिः ॥६३॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

रामगीता।

श्रीमहादेव उवाच<br>ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना<br>विधाय रामायणकीर्त्तिमुत्तमाम् ।<br>चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो<br>राजर्षिचर्यैरभिसेवितं यथा ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती! तदनन्तर, रघुश्रेष्ठ भगवान् राम, संसारके मङ्गलके लिये धारण किये अपने दिव्यमङ्गल देहसे रामायणरूप अति उत्तमकीर्तिकी स्थापना कर पूर्वकालमें जैसा आचरण राजर्षिश्रेष्ठोंने किया है वैसा ही स्वयं भी करने लगे ॥१॥
सौमित्रिणा पृष्ट उदारबुद्धिना<br>रामः कथाः प्राह पुरातनीः शुभाः ।<br>राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो<br>द्विजस्य तिर्यक्त्वमथाह राघवः ॥ २ ॥उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर वे प्राचीन उत्तम कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रसंगमें श्रीरघुनाथजीने, राजा नृगको प्रमादवश ब्राह्मणके शापसे तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका वृत्तान्त भी सुनाया ॥ २ ॥
कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं<br>रामं रमालालितपादपङ्कजम् ।<br>सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः<br>प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥किसी दिन, भगवान् राम, जिनके चरणकमलोंकी सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजीने (उनके पास जा) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीतभावसे कहा- ॥ ३ ॥ "हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त-
३५२अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

त्वं शुद्धबोधोऽसि हि सर्वदेहिना-
मात्माऽध्यक्षीशोऽसि निराकृतिः स्वयम्।
प्रतीयसे ज्ञानदृशां महामते
पादाब्जभृङ्गाहितसङ्गसङ्गिनाम् ॥ ४ ॥

अहं प्रपन्नोऽस्मि पदाम्बुजं प्रभो
भवापवर्गं तव योगिभावितम्।
यथाऽञ्जसाऽज्ञानमपारवारिधिं
सुखं तरिष्यामि तथानुशाधि माम् ॥५॥

श्रुत्वाऽथ सौमित्रिवचोऽखिलं तदा
प्राह प्रपन्नार्तिहरः प्रसन्नधीः।
विज्ञानमज्ञानतमःप्रशान्तये
श्रुतिप्रपन्नं क्षितिपालभूषणः ॥ ६ ॥

आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताः क्रियाः
कृत्वा समासादितशुद्धमानसः।
समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः
समाश्रयेत्सद्गुरुमात्मलब्धये ॥७॥

क्रिया शरीरोद्भवहेतुरादृता
प्रियाप्रियौ तौ भवतः सुरागिणः।
धर्मेतरौ तत्र पुनः शरीरकं
पुनः क्रिया चक्रवदीर्यते भवः ॥ ८ ॥

अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणं
तद्धानमेवात्र विधौ विधीयते।
विद्यैव तन्नाशविधौ पटीयसी
न कर्म तज्जं सविरोधिमीरितम् ॥ ९ ॥

नाज्ञानहानिर्न च रागसंक्षयो
भवेत्ततः कर्म सदोषमुद्भवेत्।
ततः पुनः संसृतिरप्यवारिता
तस्माद्बुधो ज्ञानविचारवान्भवेत् ॥१०॥ | देहधारियोंके आत्मा, सबके स्वामी और स्वरूपसे निरा-कार हैं। जो आपके चरणकमलोंके लिये भ्रमररूप हैं उन परमभागवतोंके सहवासके रसिकोंको ही आप ज्ञानदृष्टिसे दिखलायी देते हैं॥ ४॥ हे प्रभो! योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसारसे छुड़ानेवाले उन आपके चरणकमलोंकी मैं शरण हूँ, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे मैं सुगमतासे ही अज्ञानरूपी अपार समुद्रके पार हो जाऊँ” ॥ ५ ॥<br><br>श्रीलक्ष्मणजीके ये सब वचन सुनकर शरणागत-वत्सल भूपालशिरोमणि भगवान् राम, सुननेके लिये उत्सुक हुए लक्ष्मणको उनके अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये प्रसन्नचित्तसे ज्ञानोपदेश करने लगे ॥६॥ (वे बोले—) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रमके लिये (शास्त्रोंमें) बतलायी हुई क्रियाओंका यथावत् पालन कर, चित्त शुद्ध हो जानेपर उन कर्मोंको छोड़ दे और शमदमादि साधनोंसे सम्पन्न हो आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये सद्गुरुकी शरणमें जाय ॥ ७ ॥ कर्म देहान्तरकी प्राप्तिके लिये ही स्वीकार किये गये हैं, क्योंकि उनमें प्रेम रखनेवाले पुरुषोंसे इष्ट-अनिष्ट दोनों ही प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं। उनसे धर्म और अधर्म दोनोंहीकी प्राप्ति होती है और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है जिससे फिर कर्म होते हैं। इसी प्रकार यह संसार चक्रके समान चलता रहता है ॥८॥ संसारका मूल कारण अज्ञान ही है और इन (शास्त्रीय) विधिवाक्योंमें उस (अज्ञान) का नाश ही (संसारसे मुक्त होनेका) उपाय बतलाया गया है। अज्ञानका नाश करनेमें ज्ञान ही समर्थ हैं, कर्म नहीं, क्योंकि उस (अज्ञान) से उत्पन्न होनेवाला कर्म उसका विरोधी नहीं हो सकता * ॥ ९ ॥ कर्मद्वारा अज्ञानका नाश अथवा रागका क्षय नहीं हो सकता बल्कि उससे दूसरे सदोष कर्मकी उत्पत्ति होती है। उससे पुनः संसारकी प्राप्ति होना अनिवार्य है। इसलिये बुद्धिमान्-को ज्ञान-विचारमें ही तत्पर होना चाहिये ॥१०॥


* 'सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य' अर्थात् जो कार्य जिस सम्बन्धसे उत्पन्न होता है वह उस सम्बन्धके नाशका कारण नहीं हो सकता। इसी न्यायके अनुसार अज्ञानसे उत्पन्न कर्मके द्वारा अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता।

सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५३


मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद

ननु क्रिया वेदमुखेन चोदिता
तथैव विद्या पुरुषार्थसाधनम् ।
कर्तव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता
विद्यासहायत्वमुपैति सा पुनः ॥ ११ ॥

अकर्मकृतौ दोषमपि श्रुतिर्जगौ
तस्मात्सदा कार्यमिदं मुमुक्षुणा ।
ननु स्वतन्त्रा ध्रुवकार्यकारिणी
विद्या न किञ्चिन्मनसाऽप्यपेक्षते ॥ १२ ॥

न सत्यकार्योऽपि हि यद्वदध्वरः
प्रकाङ्क्षतेऽन्यानपि कारकादिकान् ।
तथैव विद्या विधिभिः प्रकाशितै-
र्विशिष्यते कर्मभिरेव मुक्तये ॥ १३ ॥

हिन्दी अनुवाद:
कुछ वितर्कवादी ऐसा कहते हैं कि—जिसप्रकार वेदके कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थका साधक है वैसे ही कर्म वेदविहित हैं; और प्राणियोंके लिये कर्मोंकी अवश्य-कर्त्तव्यताका विधान भी है, इसलिये वे कर्म-ज्ञानके सहकारी हो जाते हैं। साथ ही श्रुतिने कर्म न करनेमें दोष भी बतलाया है; इसलिये मुमुक्षु-को कर्म सदा ही करते रहना चाहिये, और यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देनेवाला है, उसे मनसे भी किसी औरकी सहायता-की आवश्यकता नहीं है, तो उसका यह कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसप्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होनेपर भी अन्य कारकादिकी अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधिसे प्रकाशित कर्मोंके द्वारा ही ज्ञान मुक्तिका साधक हो सकता है (अतः कर्मोंका त्याग उचित नहीं है) ॥ ११–१३ ॥


केचिद्वदन्तीति वितर्कवादिन-
स्तदप्यसद्दृष्टविरोधकारणात् ।
देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया
विद्या गताऽहङ्कृतितः प्रसिद्धयति ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद:
(सिद्धान्ती--) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं उनके कथनमें प्रत्यक्ष विरोध होनेके कारण वह ठीक नहीं है, क्योंकि कर्म देहाभिमानसे होता है और ज्ञान अहंकारके नाश होनेपर सिद्ध होता है ॥ १४ ॥


विशुद्धविज्ञानविरोचनाञ्चिता
विद्याऽऽत्मवृत्तिश्चरमेति भण्यते ।
उदेति कर्माखिलकारकादिभि-
र्निहन्ति विद्याऽखिलकारकादिकम् ॥ १५ ॥

हिन्दी अनुवाद:
(वेदान्त-वाक्योंका विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञानके प्रकाशसे उद्भासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है उसीका नाम विद्या (आत्मज्ञान) है। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादिकी सहायतासे होता है किन्तु विद्या समस्त कारकादिका (अनित्यत्वकी भावनाद्वारा) नाश कर देती है ॥ १५ ॥


तस्मात्त्यजेत्कार्यमशेषतः सुधी-
र्विद्याविरोधान्न समुच्चयो भवेत् ।
आत्मानुसन्धानपरायणः सदा
निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिगोचरः ॥ १६ ॥

हिन्दी अनुवाद:
इसलिये समस्त इन्द्रियोंके विषयोंसे निवृत्त होकर निरन्तर आत्मानुसन्धानमें लगा हुआ बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका सर्वथा त्याग कर दे। क्योंकि विद्याका विरोधी होनेके कारण कर्मका उसके साथ समुच्चय नहीं हो सकता ॥ १६ ॥


यावच्छरीरादिषु माययाऽऽत्मधी-
स्तावद्विधेयो विधिवাদকर्मणाम् ।
नेतीति वाक्यैरखिलं निषिध्य त-
ज्ज्ञात्वा परात्मानमथ त्यजेत्क्रियाः ॥ १७ ॥

हिन्दी अनुवाद:
जबतक मायासे मोहित रहनेके कारण मनुष्यका शरीरादिमें आत्मभाव है तभीतक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्त्तव्य है। 'नेति-नेति' आदि वाक्योंसे सम्पूर्ण अनात्म-वस्तुओंका निषेध करके अपने परमात्मस्वरूपको जान लेनेपर फिर उसे समस्त कर्मोंको छोड़ देना चाहिये॥ १७ ॥


यदा परात्मात्मविभेदभेदकं
विज्ञानमात्मन्यवभाति भास्वरम् ।

हिन्दी अनुवाद:
जिस समय परमात्मा और जीवात्माके भेदको दूर करने-वाला प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरणमें स्पष्टतया भासित...

उत्तरकाण्ड - सर्ग ५: रामगीता

३५४अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

तदैव माया प्रविलीयतेऽञ्जसा<br>सकारका कारणमात्मसंसृतेः ॥१८॥<br>श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा<br>कथं भविष्यत्यपि कार्यकारिणी ।<br>विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयरू-<br>स्तस्मादविद्या न पुनर्भाविष्यति ॥१९॥<br>यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते<br>कर्ताऽहमस्येति मतिः कथं भवेत् ।<br>तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते<br>विद्या विमोक्षाय विभाति केवला ॥२०॥<br>सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं<br>न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम् ।<br>एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-<br>र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम् ॥२१॥<br>विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया<br>क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः ।<br>फलैः पृथक्त्वाद्वहुकारकैः क्रतुः<br>संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम् ॥२२॥<br>सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधी-<br>रज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः ।<br>तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभि-<br>र्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥२३॥<br>श्रद्धान्वितस्तत्त्वमसीति वाक्यतो<br>गुरोः प्रसादादपि शुद्धमानसः ।<br>विज्ञाय चैकात्म्यमथात्मजीवयोः<br>सुखी भवेन्मेरुरिवाप्रकम्पनः ॥२४॥<br>आदौ पदार्थावगतिर्हि कारणं | होने लगता है उसी समय आत्माके लिये संसार-प्राप्तिकी कारण माया अनायास ही कारकादिके सहित लीन हो जाती है ॥१८॥ श्रुति-प्रमाणसे उसके नष्ट कर दिये जानेपर फिर वह किसप्रकार अपना कार्य करनेमें समर्थ हो सकती है ? इसलिये उस एकमात्र ज्ञानस्वरूप निर्मल और अद्वितीय बोधकी प्राप्ति होनेपर फिर अविद्या उत्पन्न नहीं हो सकती ॥१९॥ जब एक बार नष्ट हो जानेपर अविद्याका फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान्‌को 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है ? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और (कर्मादिकी) अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है ॥२०॥ इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध श्रुति* भी स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मोंका त्याग करना ही अच्छा है, तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखाकी श्रुति† भी कहती है कि मोक्षका साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं ॥२१॥ और तुमने जो ज्ञानकी समानतामें यज्ञादिका दृष्टान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनोंके फल अलग-अलग हैं । इसके अतिरिक्त यज्ञ तो (होता, ऋत्विक्, यजमान आदि) बहुत-से कारकोंसे सिद्ध होता है और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात् वह कारकादिसे साध्य नहीं है) ॥२२॥ (कर्मके त्याग करनेसे) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा — ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियोंको हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी-को नहीं । इसलिये विकाररहित चित्तवाले बोधवान् पुरुषको विहित कर्मोंका भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये ॥२३॥<br><br>फिर शुद्ध-चित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरुकी कृपासे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके द्वारा परमात्मा और जीवात्माकी एकता जानकर सुमेरुके समान निश्चल एवं सुखी हो जाय ॥२४॥ यह नियम ही है कि प्रत्येक वाक्यका अर्थ जाननेमें पहले उसके पदोंके |


* 'न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥ तै० आ० प्र० १० अ० १०
† 'एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्'

सर्ग ५ ]उत्तरकाण्ड३५५


वाक्यार्थविज्ञानविधौ विधानतः ।<br>तत्त्वम्पदार्थौ परमात्मजीवका-<br>वसीति चैकात्म्यमथानयोर्भवेत् ॥२५॥अर्थका ज्ञान ही कारण है । इस 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'तत्' और 'त्वम्' पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं और 'असि' उन दोनोंकी एकता करता है ॥२५॥
प्रत्यक्परोक्षादिविरोधमात्मनो-<br>र्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम् ।<br>संशोधितां लक्षणया च लक्षितां<br>ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत् ॥२६॥इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरणका साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोधको छोड़कर और लक्षणावृत्तिसे लक्षित उनकी शुद्ध चेतनताको ग्रहण कर उसे ही अपना आत्मा जाने और इसप्रकार एकीभावसे स्थित हो ॥२६॥
एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे-<br>त्तथाऽजहल्लक्षणता विरोधतः ।<br>सोऽयम्पदार्थाविव भागलक्षणा<br>युज्येत तत्त्वम्पदयोरदोषतः ॥२७॥इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें एकरूप होनेके कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरुद्ध होनेके कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती । इसलिये 'सोऽयम्' (यह वही है) इन दोनों पदोंके अर्थकी भाँति इन तत् और त्वम् पदोंमें भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषतासे हो सकती है * ॥२७॥
रसादिपञ्चीकृतभूतसम्भवं<br>भोगालयं दुःखसुखादिकर्मणाम् ।<br>शरीरमाद्यन्तवदादिकर्मजं<br>मायामयं स्थूलमुपाधिमात्मनः ॥२८॥पृथिवी आदि पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए, सुख-दुःखादि कर्म-भोगोंके आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफलसे प्राप्त होनेवाले इस मायामय आदि-अन्तवान् शरीरको विज्ञजन आत्माकी स्थूल उपाधि मानते हैं
सूक्ष्मं मनो बुद्धिदशेन्द्रियैर्युतं<br>प्राणैरपञ्चीकृतभूतसम्भवम् ।और मन, बुद्धि, दश इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अङ्गों) से युक्त और अपञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीरको

* जहाँ शब्दोंके वाच्यार्थ (अर्थात् उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ) को छोड़कर दूसरा अर्थ लिया जाता है वहाँ लक्षणा वृत्ति होती है । यह जहती, अजहती और जहदजहती नामसे तीन प्रकारकी है । जहतीलक्षणा में शब्दके वाच्यार्थका सर्वथा त्याग करके उसका बिलकुल नया ही अर्थ किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' (गङ्गाजीपर पशुशाला है) इस वाक्यके वाच्यार्थसे गङ्गाजीके प्रवाहपर पशुशालाका होना सिद्ध होता है। परन्तु यह सर्वथा असम्भव है । इसलिये यहाँ 'गङ्गा' शब्दका अर्थ 'गङ्गाप्रवाह' न करके 'गङ्गा-तीर' किया जाता है । परन्तु 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ 'ईश्वर' और 'जीव' का सर्वथा त्याग कर देनेसे उन दोनोंकी चेतनताका भी त्याग हो जाता है और चेतनताकी एकता ही अभीष्ट है; इसलिये जहतीलक्षणासे इन पदोंके अर्थकी एकता नहीं हो सकती ।
अजहतीलक्षणामें वाच्यार्थका त्याग न करके उसके साथ अन्य अर्थ भी ग्रहण किया जाता है । जैसे 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' (कौओंसे दहीकी रक्षा करो) इस वाक्यका अभिप्राय केवल कौओंसे दहीकी रक्षा कराना ही नहीं है बल्कि उसके साथ कुत्ता, बिल्ली आदि अन्य जीवोंसे सुरक्षित रखना भी है । यहाँ 'तत्' और 'त्वम्' पदके वाच्यार्थमें विरोध है फिर अन्य अर्थको सम्मिलित करनेसे भी वह विरोध तो दूर होगा ही नहीं; इसलिये अजहल्लक्षणासे भी उनकी एकता सिद्ध नहीं हो सकती । इन दोनोंके सिवा जहाँ कुछ अर्थ रक्खा जाता है और कुछ छोड़ा जाता है वह जहदजहती (भाग त्याग) लक्षणा होती है । जैसे 'सोऽयम्' (यह वही है) इस वाक्यमें 'अयम्' पदसे कहे जानेवाले पदार्थकी अपरोक्षता और 'सः' पदके वाच्य पदार्थकी परोक्षताका त्याग करके इन दोनोंसे रहित जो निर्विरोध पदार्थ है उसकी एकता कही जाती है । इसी प्रकार महावाक्यके 'तत्' पदके वाच्य 'ईश्वर' के गुण सर्वज्ञता, परोक्षता आदिका और 'त्वम्' पदके वाच्य 'जीव' के गुण अल्पज्ञता, प्रत्यक्ता आदिका त्याग करके केवल चेतनांशमें एकता बतलायी जाती है ।

३५६अध्यात्मरामायण[सर्ग ५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोक्तुः सुखादेरनुसाधनं भवे-<br>च्छरीरमन्यद्विदुरात्मनो बुधाः ॥२९॥जो भोक्ताके सुख-दुःखादि-अनुभवका साधन है, आत्माका दूसरा देह मानते हैं॥२८–२९॥
अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं<br>मायाप्रधानं तु परं शरीरकम्।<br>उपाधिभेदात्तु यतः पृथक् स्थितं<br>स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥३०॥(इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीवका तीसरा देह है। इसप्रकार उपाधि-भेदसे सर्वथा पृथक् स्थित अपने आत्मस्वरूपको क्रमशः (उपाधियोंका बाध करते हुए) अपने हृदयमें निश्चय करे ॥३०॥
कोषेष्वयं तेषु तु तत्तदाकृति-<br>र्विभाति सङ्गात्स्फटिकोपलो यथा।<br>असङ्गरूपोऽयमजो यतोऽद्वयो<br>विज्ञायतेऽस्मिन्परितो विचारिते ॥३१॥स्फटिकमणिके समान यह आत्मा भी (अन्नमयादि) भिन्न-भिन्न कोशोंमें उनके सङ्गसे उन्हींके आकारका भासने लगता है। किन्तु इसका भली-प्रकार विचार करनेसे यह अद्वितीय होनेके कारण असङ्गरूप और अजन्मा निश्चित होता है ॥३१॥
बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते<br>स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः।<br>अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारतो मृषा<br>नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥३२॥त्रिगुणात्मिका बुद्धिकी ही स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति-भेदसे तीन प्रकारकी वृत्तियाँ दिखायी देती हैं किन्तु इन तीनों वृत्तियोंमेंसे प्रत्येकका एक दूसरीमें व्यभिचार होनेके कारण, ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्ममें मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियोंका सर्वथा अभाव है) ॥३२॥
देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां<br>सङ्घादजस्रं परिवर्तते धियः।<br>वृत्तिस्तमोमूलतयाऽङ्गलक्षणा<br>यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥३३॥बुद्धिकी वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाली होनेके कारण अज्ञानरूपा है और जबतक यह रहती है तबतक ही संसारमें जन्म होता रहता है ॥३३॥
नेतिप्रमाणेण निराकृताखिलो<br>हृदा समास्वादितचिद्धनामृतः।<br>त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं<br>पीत्वा यथाऽम्भः प्रजहाति तत्फलम् ३४'नेति-नेति' आदि श्रुति-प्रमाणसे निखिल संसारका बाध करके और हृदयमें चिद्धनामृतका आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म) को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियलके जलको पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं ॥३४॥
कदाचिदात्मा न मृतो न जायते<br>न क्षीयते नापि विवर्धतेऽन्वयः।<br>निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः<br>स्वयंप्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥३५॥आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है ॥३५॥
एवंविधे ज्ञानमये सुखात्मके<br>कथं भवो दुःखमयः प्रतीयते।<br>अज्ञानतोऽध्यासवशात्प्रकाशते<br>ज्ञाने विलीयेत विरोधतः क्षणात् ॥३६॥जो इसप्रकार ज्ञानमय और सुख-स्वरूप है उसमें (ज्ञान होनेके बाद) यह दुःखमय संसार कैसे प्रतीत हो सकता है? यह तो अध्यासके कारण अज्ञान-से ही प्रतीत होता है ज्ञानसे तो यह एक क्षणमें ही लीन हो जाता है क्योंकि ज्ञान और अज्ञानका परस्पर

सर्ग ५ ] उत्तरकाण्ड ३५


यदन्यदन्यत्र विभाव्यते भ्रमा-
दध्यासमित्याहुरमुं विपश्चितः।
असर्षभूतेऽहिविभावनं यथा
रज्वादिके तद्वदपीश्वरे जगत्॥३७॥

विकल्पमायारहिते चिदात्मके-
ऽहङ्कार एष प्रथमः प्रकल्पितः।
अध्यास एवात्मनि सर्वकारणे
निरामये ब्रह्मणि केवले परे॥३८॥

इच्छादिरागादिसुखादिधर्मिकाः
सदा धियः संसृतिहेतवः परे।
यस्मात्सुसुप्तौ तदभावतः परः
सुखस्वरूपेण विभाव्यते हि नः॥३९॥

अनाद्यविद्योद्भवबुद्धिबिम्बितो
जीवः प्रकाशोऽयमितीर्यते चितः।
आत्मा धियः साक्षितया पृथक् स्थितो
बुद्ध्यापरिच्छिन्नपरः स एव हि॥४०॥

चिद्विम्बसाक्ष्यात्मधियां प्रसङ्गत-
स्त्वेकत्र वासादनलाक्तलोहवत्।
अन्योन्यमध्यासवशात्प्रतीयते
जडाजडत्वं च चिदात्मचेतसोः॥४१॥

गुरोः सकाशादपि वेदवाक्यतः
सञ्जातविद्यानुभवो निरीक्ष्य तम्।
स्वात्मानमात्मस्थमुपाधिवर्जितं
त्यजेदशेषं जडमात्मगोचरम्॥४२॥

प्रकाशरूपोऽहमजोऽहमद्वयो-
ऽसकृद्विभातोऽहमतीव निर्मलः।
विशुद्धविज्ञानघनो निरामयः
सम्पूर्ण आनन्दमयोऽहमक्रियः॥४३॥

सदैव मुक्तोऽहमचिन्त्यशक्तिमा-
नतीन्द्रियज्ञानमविक्रियात्मकः।
अनन्तपारोऽहमहर्निशं बुधै-
र्विभावितोऽहं हृदि वेदवादिभिः॥४४॥


विरोध है॥३६॥ भ्रमसे जो अन्यमें अन्यकी प्रतीति होती है उसीको विद्वानोंने अध्यास कहा है। जैसे प्रकार असर्परूप रज्जुमें सर्पकी प्रतीति होती है उस प्रकार ईश्वरमें संसारकी प्रतीति हो रही है॥३७॥ जो विकल्प और मायासे रहित है उस सबके पर निरामय, अद्वितीय और चित्स्वरूप परमात्मा ब्रह्ममें पहले इस 'अहंकार' रूप अध्यासकी ही कल्पना होती है॥३८॥ सबके साक्षी आत्मामें इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुख-दुःखादिरूप बुद्धिकी वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसारकी कारण हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें इनका अभाव हो जानेपर हमें आत्माका सुख-रूपसे भान होता है॥३९॥ अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुई बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चेतनका प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धिके साक्षीरूपसे आत्मा उससे पृथक् है, वह परात्मा तो बुद्धिसे अपरिच्छिन्न है॥४०॥ अग्निसे तपे हुए लोहेके समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धिके एकत्र रहनेसे परस्पर अन्योन्याध्यास होनेके कारण क्रमशः उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्निसे तपे हुए लोहपिण्डमें अग्नि और लोहेका तादात्म्य हो जानेसे लोहेका आकार अग्निमें और अग्निकी उष्णता लोहेमें दिखायी देने लगती है उसी प्रकार बुद्धि और आत्माका तादात्म्य हो जानेसे आत्माकी चेतनता बुद्धि आदिमें और बुद्धि आदिकी जडता आत्मामें प्रतीत होने लगती है। इसलिये अध्यासवश बुद्धिसे लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओंको ही आत्मा मानने लगते हैं) ॥४१॥ गुरुके समीप रहनेसे और वेदवाक्योंसे आत्मज्ञानका अनुभव होनेपर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्माका साक्षात्कार करके आत्मारूपसे प्रतीत होनेवाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थोंका त्याग कर देना चाहिये॥४२॥ मैं प्रकाशस्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरन्तर भासमान, अत्यन्त निर्मल, विशुद्ध-विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्द-स्वरूप हूँ॥४३॥ मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, अविकृतरूप और अनन्तपार हूँ। वेद-वादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदयमें चिन्तन करते हैं॥४४॥

३५८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५


एवं सदात्मानमखण्डितात्मना
विचारमाणस्य विशुद्धभावना ।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै
रसायनं यद्वदुपासितं रुजः ॥ ४५ ॥

अर्थ: इस प्रकार सदा आत्माका अखण्ड-वृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती है ॥ ४५ ॥


विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो
विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः ।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो
विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥ ४६ ॥

अर्थ: (आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि) एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर और अन्तःकरणको अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मामें स्थित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्ध-चित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे ॥ ४६ ॥


विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं
विलापयेदात्मनि सर्वकारणे ।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते
न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥ ४७ ॥

अर्थ: यह विश्व परमात्मस्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मामें लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूपसे स्थित हो जाता है उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता ॥ ४७ ॥


पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तये-
दोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत् ।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको
विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥ ४८ ॥

अर्थ: समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल ओंकार-मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञानके कारण ही संसारकी प्रतीति होती है ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥


अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको
ह्युकारस्तैजस ईर्यते क्रमात् ।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः
समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत् ॥ ४९ ॥

अर्थ: (ओंकारमें अ उ और म ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे) अकार विश्व (जागृतिके अभिमानी) का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्नका अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिके अभिमानी) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई भेद नहीं है ॥ ४९ ॥


विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये-
दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम् ।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं
द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥ ५० ॥

अर्थ: नाना प्रकारसे स्थित अकाररूप विश्व पुरुषको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिमवर्ण मकारमें लीन करे ॥ ५० ॥


मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे
विलापयेत्प्राज्ञमपीह कारणम् ।
सोऽहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तिम-
द्विज्ञानदृङ् मुक्त उपाधितोऽमलः ॥ ५१ ॥

अर्थ: फिर कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिद्घनरूप परमात्मामें लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥


एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः ।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥ ५२ ॥

अर्थ: इसप्रकार निरन्तर परात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च विस्मृत हो गया है वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके

सर्ग ५ ]उत्तरकाण्ड३५९

एवं सदाऽभ्यस्तसमाधियोगिनो<br>निवृत्तसर्वेन्द्रियगोचरस्य हि।<br>विनिर्जिताशेषरिपोरहं सदा<br>दृश्यो भवेयं जितषड्गुणात्मनः ॥५३॥ | समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है ॥५२॥ इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोगका अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओंको परास्त कर दिया है, उस छहों इन्द्रियों (मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को जीतनेवाले महात्माको मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है॥५३॥

ध्यात्वैवमात्मानमहर्निशं मुनि-<br>स्तिष्ठेत्सदा मुक्तसमस्तबन्धनः।<br>प्रारब्धमश्नन्नभिमानवर्जितो<br>मय्येव साक्षात्प्रविलीयते ततः ॥५४॥ | इस प्रकार अहर्निश आत्माका ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापनके) अभिमानको छोड़कर प्रारब्ध-फल भोगता रहे। इससे वह अन्तमें साक्षात् मुझहीमें लीन हो जाता है ॥५४॥

आदौ च मध्ये च तथैव चान्ततो<br>भवं विदित्वा भयशोककारणम्।<br>हित्वा समस्तं विधिवादचोदितं<br>भजेत्खमात्मानमथाखिलात्मनाम् ॥५५॥ | संसारको आदि, अन्त और मध्यमें सब प्रकार भय और शोकका ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मको त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मारूप अपने आत्माका भजन करे॥ ५५॥

आत्मन्यभेदेन विभावयन्निदं<br>भवत्यभेदेन मयात्मना तदा।<br>यथा जलं वारिनिधौ यथा पयः<br>क्षीरे वियद्व्योमन्यनिले यथानिलः ॥५६॥ | जिस प्रकार समुद्रमें जल, दूधमें दूध, महाकाशमें घटा-काशादि और वायुमें वायु मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको अपने आत्माके साथ अभिन्नरूपसे चिन्तन करनेसे जीव मुझ परमात्माके साथ अभिन्न भावसे स्थित हो जाता है ॥५६॥

इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो<br>जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः।<br>निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो<br>यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः ॥५७॥ | यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाणसे बाधित होनेके कारण चन्द्रभेद और दिशाओंमें होनेवाले दिग्भ्रम-के समान मिथ्या ही है—ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि, इसे देखे ॥ ५७ ॥

यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं<br>तावन्मदाराधनतत्परो भवेत्।<br>श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो<br>यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि ॥५८॥ | जबतक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे तब-तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है उसे अपने हृदयमें सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है ॥ ५८ ॥

रहस्यमेतच्छ्रुतिसारसङ्ग्रहं<br>मया विनिश्चित्य तवोदितं प्रिय।<br>यस्त्वेतदालोचयतीह बुद्धिमान्<br>स मुच्यते पातकराशिभिः क्षणात् ॥५९॥ | हे प्रिय ! सम्पूर्ण श्रुतियोंके साररूप इस गुप्त रहस्यको मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा वह तत्काल समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ ५९ ॥

भ्रातर्यदीदं परिदृश्यते जग-<br>न्मायैव सर्वं परिहृत्य चेतसा। | भाई ! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है वह सब माया है। इसे अपने चित्तसे

३६०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

मद्भावनाभावितशुद्धमानसः
सुखी भवानन्दमयो निरामयः ॥६०॥
अर्थ— निकालकर मेरी भावनासे शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ ॥ ६० ॥

यः सेवते मामगुणं गुणात्परं
हृदा कदा वा यदि वा गुणात्मकम्।
सोऽहं स्वपादाश्रितरेणुभिः स्पृशन्
पुनाति लोकत्रितयं यथा रविः ॥६१॥
अर्थ— जो पुरुष अपने चित्तसे मुझ गुणातीत निर्गुणका अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूपका भी सेवन करता है वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरणरजके स्पर्शसे सूर्यके समान सम्पूर्ण त्रिलोकीको पवित्र कर देता है ॥ ६१ ॥

विज्ञानमेतदखिलं श्रुतिसारमेकं
वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्।
यः श्रद्धया परिपठेद् गुरुभक्तियुक्तो
मद्रूपमेति यदि मद्वचनेषु भक्तिः ॥६२॥
अर्थ— यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियोंका एकमात्र सार है इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा उसकी यदि मेरे वचनोंमें प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा ॥ ६२ ॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे उत्तरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठ सर्ग

लवण-वध, भगवान् रामके यज्ञमें कुश-लवके सहित महर्षि वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश करना।

श्रीमहादेव उवाच
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति !

एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः।
आजग्मू राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणरक्षसः ॥ १ ॥
अर्थ— एक दिन यमुना-तटपर रहनेवाले समस्त मुनिजन लवण राक्षससे भय-भीत होकर श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करनेके लिये आये ॥ १ ॥

कृत्वाऽग्रे तु मुनिश्रेष्ठं भार्गवं च्यवनं द्विजाः।
असङ्ख्याताः समायाता रामादभयकाङ्क्षिणः ॥२॥
अर्थ— वे अगणित मुनिगण भृगुपुत्र मुनिश्रेष्ठ च्यवन-को आगे कर भगवान् रामसे अभय-लाभ करनेकी इच्छा-से आये ॥२॥

तान्पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोत्तमः।
उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन्मुनिमण्डलम् ॥ ३ ॥
अर्थ— रघुकुलश्रेष्ठ रामजीने उन मुनीश्वरोंका अत्यन्त भक्तिभावसे पूजन कर उन्हें प्रसन्न करते हुए मधुर वाणीसे कहा—॥ ३ ॥

करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम्।
धन्योऽस्मि यदि यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः॥४॥
अर्थ— "हे मुनिश्रेष्ठगण ! आपके यहाँ पधारनेका क्या कारण है ? (मुझे जो आज्ञा होगी) मैं वैसा ही करूँगा। यदि आप लोग मुझे प्रीतिपूर्वक देखनेके लिये ही यहाँ आये हैं, तो मैं धन्य हूँ ॥ ४ ॥

दुष्करं चापि यत्कार्यं भवतां तत्करोम्यहम्।
आज्ञापयन्तु मां भृत्यं ब्राह्मणा दैवतं हि मे ॥ ५ ॥
अर्थ— आपका जो अत्यन्त दुष्कर कार्य होगा वह भी मैं अवश्य करूँगा। आप मुझ सेवकको आज्ञा दीजिये; ब्राह्मण ही मेरे इष्टदेव हैं" ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत्।
मधुनामा महादैत्यः पुरा कृतयुगे प्रभो ॥ ६ ॥
अर्थ— भगवान् रामके ये वचन सुनकर महर्षि च्यवनने सहसा प्रसन्न होकर कहा—"प्रभो ! पहले सत्ययुगमें

सर्ग ६ ] उत्तरकाण्ड ३६१


आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः ।<br>तस्य तुष्टो महादेचो ददौ शूलमनुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>प्राह चानेन यं हंसि स तु भस्मीभविष्यति ।<br>रावणस्यानुजा भार्या तस्य कुम्भीनसी श्रुता ॥ ८ ॥<br>तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः ।<br>आसीदुरात्मा दुर्धर्षो देवब्राह्मणहिंसकः ॥ ९ ॥<br>पीडितास्तेन राजेन्द्र वयं त्वां शरणं गताः ।<br>तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैर्बो मुनिपुङ्गवाः ॥१०॥<br>लवणं नाशयिष्यामि गच्छन्तु विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि भ्रातॄन् को वा हनिष्यति ॥<br>लवणं राक्षसं दद्याद् ब्राह्मणेभ्योऽभयं महत् ।<br>तच्छ्रुत्वा प्राञ्जलिः प्राह भरतो राघवाय वै ॥१२॥<br>अहमेव हनिष्यामि देवाज्ञापय मां प्रभो ।<br>ततो रामं नमस्कृत्य शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥१३॥<br>लक्ष्मणेन महत्कार्यं कृतं राघव संयुगे ।<br>नन्दिग्रामे महाबुद्धिर्भरतो दुःखमन्वभूत् ॥१४॥<br>अहमेव गमिष्यामि लवणस्य वधाय च ।<br>त्वत्प्रसादाद्रघुश्रेष्ठ हन्यां तं राक्षसं युधि ॥१५॥मधु नामक एक बड़ा ही धर्मात्मा और देवता तथा<br>ब्राह्मणोंका भक्त महादैत्य था । उससे प्रसन्न होकर<br>श्रीमहादेवजीने उसे एक अत्युत्तम त्रिशूल दिया ॥ ६-७ ॥<br>और कहा कि इससे तू जिसपर प्रहार करेगा वही<br>भस्मीभूत हो जायगा । सुना जाता है,<br>रावणकी छोटी बहिन कुम्भीनसी उसकी भार्या<br>थी ॥ ८ ॥ उससे उसके लवण नामका एक<br>महापराक्रमी दुष्ट-चित्त, दुर्जय और देवता-ब्राह्मणोंको<br>दुःख देनेवाला राक्षस उत्पन्न हुआ ॥ ९ ॥ हे राजेन्द्र !<br>उससे अत्यन्त पीड़ित होकर हम आपकी शरण आये<br>हैं।” यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—“हे मुनि-<br>श्रेष्ठ ! आपलोग किसी प्रकारका भय न करें ॥१०॥ आप<br>निश्चिन्त होकर पधारें, मैं लवणको अवश्य मार डालूँगा।”<br>मुनीश्वरोंसे ऐसा कह भगवान् रामने अपने भाइयोंसे<br>पूछा—“तुममेंसे कौन लवण राक्षसको मारेगा और<br>ब्राह्मणोंको महान् अभय देगा ?” यह सुनकर भरतजी-<br>ने श्रीरघुनाथजीसे हाथ जोड़कर कहा-॥ ११-१२॥<br>“देव ! लवणको मैं ही मारूँगा । प्रभो ! इसके लिये मुझे<br>ही आज्ञा दीजिये।” फिर शत्रुघ्नजीने श्रीरामचन्द्रजीको<br>प्रणाम करके कहा—॥ १३ ॥ “हे राघव ! श्रीलक्ष्मण-<br>जी युद्धमें बड़ा भारी कार्य कर चुके हैं, महामति भरत-<br>जीने भी नन्दिग्राममें रहकर बहुत कष्ट सहा है ॥ १४ ॥<br>अब लवणका वध करनेके लिये तो मैं ही जाऊँगा ।<br>हे रघुश्रेष्ठ ! आपकी कृपासे मैं उस राक्षसको युद्धमें<br>अवश्य मार डालूँगा” ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा स्वाङ्कमारोप्य शत्रुघ्नं शत्रुसूदनः ।<br>आहाद्यैवाभिषेक्ष्यामि मथुराराज्यकारणात् ॥१६॥<br>आनाय्य च सुसम्भारॉल्लक्ष्मणेनाभिषेचने ।<br>अनिच्छन्तमपि स्नेहादभिषेकमकारयत् ॥१७॥<br>दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं रामः शत्रुघ्नमब्रवीत् ।<br>अनेन जहि बाणेन लवणं लोककण्टकम् ॥१८॥<br>स तु सम्पूज्य तच्छूलं गेहे गच्छति काननम् ।<br>भक्षणार्थं तु जन्तूनां नानाप्राणिवधाय च ॥१९॥शत्रुघ्नके ये वचन सुनकर शत्रुदमन रघुनाथजीने<br>उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया और कहा—“मैं आज<br>ही तुम्हारा (लवणकी राजधानी) मथुराके राज्यपर<br>अभिषेक करूँगा” ॥ १६ ॥ ऐसा कह लक्ष्मणजीसे<br>अभिषेककी सामग्री मँगा शत्रुघ्नजीकी इच्छा न होने-<br>पर भी श्रीरामचन्द्रजीने उनका प्रीतिपूर्वक अभिषेक<br>कर दिया ॥ १७ ॥ फिर उन्हें दिव्य बाण देकर<br>कहा—“तुम संसारके कण्टकरूप लवणको इस बाण-<br>से मार डालना ॥ १८ ॥ राक्षस लवण अपने घरमें<br>ही उस त्रिशूलकी पूजा कर नाना प्रकारके जीवोंको<br>खाने और मारनेके लिये वनको जाया करता है॥ १९॥
३६२अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

स तु नायाति सदनं यावद्वनचरो भवेत् ।
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः ॥२०॥
योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदावध्यो भविष्यति ।
तं हत्वा लवणं क्रूरं तद्वनं मधुसंज्ञितम् ॥२१॥
निवेश्य नगरं तत्र तिष्ठ त्वं मेऽनुशासनात् ।
अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥२२॥
गजानां षट् शतानीह पत्तीनामयुतत्रयम् ।
आगमिष्यति पश्चात्तवमग्र साधय राक्षसम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा मूर्ध््न्यवघ्राय प्रेषयामास राघवः ।
शत्रुघ्नं मुनिभिः सार्धमाशीर्भिरभिनन्द्य च ॥२४॥
शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ।
हत्वा मधुसुतं युद्धे मथुरांमकरोत्पुरीम् ॥२५॥
स्फीतां जनपदं चक्रे मधुरां दानमानतः ।
सीतापि सुषुवे पुत्रौ द्वौ वाल्मीकेरथाश्रमे ॥२६॥
मुनिस्तयोर्नाम चक्रे कुशो ज्येष्ठोऽनुजो लवः।
क्रमेण विद्यासम्पन्नौ सीतापुत्रौ बभूवतुः ॥२७॥
उपनीतौ च मुनिना वेदाध्ययनतत्परौ ।
कृत्स्नं रामायणं प्राह काव्यं बालकयोर्मुनिः ॥२८॥
शङ्करेण पुरा प्रोक्तं पार्वत्यै पुरहारिणा ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥२९॥
कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरावाश्विनाविव ।
तन्त्रीतालसमायुक्तौ गायन्तौ चेरतुर्वने ॥३०॥
तत्र तत्र मुनीनां तौ समाजे सुररूपिणौ ।
गायन्तावमितो दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽब्रुवन् ॥३१॥
गन्धर्वेष्वथ किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये
पातालेऽथतथा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्वेषु च ।
अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्ट्वा दिशः सर्वतो


अतः जबतक वह लौटकर घर न आवे, वनहीमें रहे, उससे पूर्व ही तुम नगरके द्वारपर धनुष धारण कर खड़े हो जाना ॥ २० ॥ लौटनेपर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ेगा और उसी समय मारा जायगा । इस प्रकार महाक्रूर लवणासुरको मारकर उसके मधुवनमें नगर बसाकर मेरी आज्ञासे वहीं रहो । तुम पहले जाकर उस राक्षसको ठीक करो, फिर तुम्हारे पीछे वहाँ पाँच हजार घोड़े, उनसे आधे ( ढाई हजार ) रथ, छः सौ हाथी और तीस हजार पैदल भी पहुँचेंगे ॥ २१–२३ ॥

ऐसा कह श्रीरघुनाथजीने शत्रुघ्नका शिर सूँघकर उनका आशीर्वादसे अभिनन्दन किया और उन्हें मुनियोंके साथ विदा किया ॥ २४ ॥ शत्रुघ्नजीने भी, भगवान् रामने जैसी आज्ञा दी थी वैसा ही किया । उन्होंने मधुपुत्र लवणासुरको मारकर मधुरापुरी बसायी ॥ २५ ॥ और दान-मानसे (लोगोंको सन्तुष्ट कर) उन्होंने मधुराको एक समृद्धिशाली नगर बना दिया ।

इस बीचमें श्रीसीताजीके वाल्मीकि मुनिके आश्रममें दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६ ॥ मुनिने उनमेंसे बड़ेका नाम कुश और छोटेका लव रक्खा । धीरे-धीरे सीताजीके वे दोनों पुत्र विद्यासम्पन्न हो गये ॥ २७ ॥ मुनिके उपनयन-संस्कार करनेपर वे वेदाध्ययनमें तत्पर हुए । श्रीवाल्मीकिजीने उन दोनों बालकोंको सम्पूर्ण रामायणकाव्य पढ़ा दिया ॥ २८ ॥ पूर्वकालमें इसे त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने पार्वतीजीको सुनाया था । उसी आख्यानको समर्थ मुनि वाल्मीकिने वेदोंका विस्तृत ज्ञान करानेके लिये उन बालकोंको पढ़ाया ॥ २९ ॥ वे अश्विनीकुमारके समाने अति सुन्दर कुमार उसे वीणा बजाकर स्वरसहित गाते हुए वनमें विचरा करते थे ॥ ३० ॥ उन देवरूप बालकोंको जहाँ-तहाँ मुनियोंके समाजमें गाते देख वे मुनिगण अत्यन्त विस्मित हो आपसमें कहने लगते थे—॥ ३१ ॥ "हम चिरजीवियोंने बहुत दिनोंसे सभी दिशाएँ देखीं; किन्तु गन्धर्व, किन्नर, भूलोक, देवलोक, देवालय, पाताल अथवा ब्रह्मलोक आदि किसी भी लोकमें गाने-बजानेकी ऐसी कुशलता

उत्तरकाण्ड - सर्ग ६: लवण-वध, वाल्मीकिका पधारना और कुशको परमार्थोपदेश

सर्ग ६ ]उत्तरकाण्ड३६३

| नाज्ञासीद्गीतवाद्यगरिमा नादर्शि नांश्रावि च ॥ | न कभी जानी, न देखी और न सुनी ही है” ॥३२॥ | | एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । | इसप्रकार प्रतिदिन प्रशंसा करनेवाले समस्त मुनियोंके साथ वे दोनों बालक बहुत समयतक श्रीवाल्मीकिजीके एकान्त आश्रममें सुखपूर्वक रहे ॥ ३३ ॥ | | आसाते सुखमेकान्ते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥३३॥ | | | अथ रामोऽश्वमेधादींश्चकार बहुदक्षिणान् । | . इधर परम तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने सुवर्णकी सीता बनाकर अश्वमेध आदि बहुत-से बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं-वाले यज्ञ किये ॥३४॥ उस यज्ञशालामें यज्ञोत्सव देखनेके लिये सभी ऋषि, राजर्षि, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि आये थे ॥ ३५ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी भी गान् करते हुए कुश और लवको साथ ले वहाँ आये और जहाँ मुनियोंके ठहरनेका स्थान था वहाँ उतरे ॥ ३६ ॥ वहाँ एक दिन एकान्तमें शान्तभावसे बैठे हुए वाल्मीकि मुनिसे उनकी समाधि खुलनेपर कुशने कथाके बीचमें ही ज्ञानशास्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३७ ॥ | | यज्ञान् स्वर्णमयीं सीतां विधाय विपुलद्युतिः॥३४॥ | | | तस्मिन्विताने ऋषयः सर्वे राजर्षयस्तथा । | | | ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः समाजग्मुर्दिदृक्षवः॥३५॥ | | | वाल्मीकिरपि सङ्गृह्य गायन्तौ तौ कुशीलवौ । | | | जगाम ऋषियाटस्य समीपं मुनिपुङ्गवः ॥३६॥ | | | तत्रैकान्ते स्थितं शान्तं समाधिविरमे मुनिम् । | | | कुशः पप्रच्छ वाल्मीकिं ज्ञानशास्त्रं कथान्तरे॥३७॥ | | | भगवन् श्रोतुमिच्छामि सङ्क्षेपान्नृपतोऽखिलम् । | (वह बोला—) “भगवन् ! मैं आपके मुखारविन्दसे संक्षेप-में यह बात सुनना चाहता हूँ कि जीवको यह सुदृढ संसारबन्धन किस प्रकार प्राप्त होता है ? ॥ ३८ ॥ और फिर इस संसार नामक दृढ बन्धनसे उसे छुटकारा कैसे मिलता है ? हे मुने ! आप सर्वज्ञ हैं, मुझ प्रणत शिष्यसे आप यह सम्पूर्ण रहस्य कहिये” ॥ ३९ ॥ | | देहिनः संसृतिर्बन्धः कथमुत्पद्यते दृढः ॥३८॥ | | | कथं विमुच्यते देही दृढबन्धाह्वयान्मिथात् । | | | वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मह्यं शिष्याय ते मुने ॥३९॥ | | | वाल्मीकिरुवाच | **वाल्मीकिजी बोले—**सुन, मैं तुझे संक्षेपसे साधन-के सहित बन्ध और मोक्षका सम्पूर्ण स्वरूप सुनाता हूँ। मैं जैसा कहूँ वह सब सुनकर तू उसी प्रकार आचरण कर । इससे तेरा कल्याण होगा और तू जीवन्मुक्त हो जायगा । देहहीन चेतन आत्माका यह देह ही बड़ा भारी घर है ॥ ४०-४१ ॥ इसमें उसने अहंकारको ही अपना मन्त्री बना रक्खा है। यह अहंकाररूप मन्त्री देहगेहाभिमानरूप अपने आपको चेतन आत्मामें आरोपितकर उससे एकरूप होकर अपनी सारी चेष्टाओं-का आरोप उस चिदानन्दरूप आत्मामें ही करता है। उस अहंकारसे व्याप्त हुआ देही (जीव ) उसीके संकल्प-से प्रेरित होकर संकल्परूपी बेड़ियोंसे बँधता है और फिर रात-दिन पुत्र, स्त्री और गृह आदिके लिये संकल्प-विकल्प करता रहता है ॥ ४२-४४ ॥ इस प्रकार | | शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सङ्क्षेपाद्बन्धमोक्षयोः । | | | स्वरूपं साधनं चापि मत्तः श्रुत्वा यथोदितम्॥४०॥ | | | तथैवाचर भद्रं ते जीवन्मुक्तो भविष्यसि । | | | देह एव महागेहमदेहस्य चिदात्मनः ॥४१॥ | | | तस्याहङ्कार एवास्मिन्मन्त्री तेनैव कल्पितः । | | | देहगेहाभिमानं स्वं समारोप्य चिदात्मनि ॥४२॥ | | | तेन तादात्म्यमापन्नः स्वचेष्टितमशेषतः । | | | विदधाति चिदानन्दे तद्वासितवपुः स्वयम् ॥४३॥ | | | तेन सङ्कल्पितो देही सङ्कल्पनिगडावृतः । | | | पुत्रदारगृहादीनि सङ्कल्पयति चानिशम् ॥४४॥ | |

३६४अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

संकल्पयन्स्वयं देही परिशोचति सर्वदा ।<br>त्रयस्तस्याहमो देहा अधमोत्तममध्यमाः ॥४५॥<br>तमःसत्त्वरजःसंज्ञा जगतः कारणं स्थितेः ।<br>तमोरूपाद्धि सङ्कल्पाश्नित्यं तामसचेष्टया ॥४६॥<br>अत्यन्तं तामसो भूत्वा कृमिकीटत्वमाप्नुयात् ।<br>सत्त्वरूपो हि सङ्कल्पो धर्मज्ञानपरायणः ॥४७॥<br>अदूरमोक्षसाम्राज्यः सुखरूपो हि तिष्ठति ।<br>रजोरूपो हि सङ्कल्पो लोके संव्यवहारवान् ॥४८॥<br>परितिष्ठति संसारे पुत्रदारानुरञ्जितः ।<br>त्रिविधं तु परित्यज्य रूपमेतन्महामते ॥४९॥<br>सङ्कल्पं परमाप्नोति पदमात्मपरिक्षये ।<br>दृष्टीः सर्वाः परित्यज्य नियम्य मनसा मनः॥५०॥<br>सबाह्याभ्यन्तरार्थस्य सङ्कल्पस्य क्षयं कुरु ।<br>यदि वर्षसहस्राणि तपश्चरसि दारुणम् ॥५१॥<br>पातालस्थस्य भूस्थस्य स्वर्गस्थस्यापि तेऽनघ ।<br>नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति सङ्कल्पोपशमादृते ॥५२॥<br>अनाबाधेऽविकारे स्वे सुखे परमपावने ।<br>सङ्कल्पोपशमे यत्नं पौरुषेण परं कुरु ॥५३॥<br>सङ्कल्पतन्तौ निखिला भावाः प्रोताः कलानघ ।<br>छिन्ने तन्तौ न जानीमः क्व यान्ति विभवाः पराः ॥<br>निःसङ्कल्पो यथाप्राप्तव्यवहारपरो भव ।<br>क्षये सङ्कल्पजालस्य जीवो ब्रह्मत्वमाप्नुयात् ॥५५॥<br>अधिगतपरमार्थतामुपेत्य<br>प्रसभमपास्य विकल्पजालमुच्चैः ।<br>अधिगमय पदन्तदद्वितीयं<br>विततसुखाय समुन्नचित्तवृत्तिः ॥५६॥ | संकल्प करनेसे जीव स्वयं ही सदा शोक करता है।<br>इस अहंकारके सत्त्व, रज, तम नामक उत्तम, अधम और मध्यम तीन प्रकारके देह हैं। ये ही तीनों संसारकी स्थितिके कारण हैं। इनमेंसे तामस संकल्पसे नित्यप्रति तामसिक चेष्टाएँ करनेसे ही जीव अत्यन्त तमोगुणी होकर कीड़े-मकोड़े आदि योनियोंको प्राप्त होता है। जो सात्त्विक संकल्पवाला होता है वह धर्म और ज्ञानमें ही तत्पर रहनेके कारण मोक्ष-साम्राज्यके पास ही सुखपूर्वक रहता है। तथा राजस संकल्प होनेसे लोकव्यवहार करता हुआ संसारमें पुत्र, स्त्री आदिमें अनुरक्त रहता है। हे महामते ! जो पुरुष इन तीनों प्रकारके संकल्पोंको छोड़ देता है वह चित्तके लीन होनेपर परमपद प्राप्त कर लेता है। इसलिये तू समस्त विचारोंको छोड़कर और अपने मनसे ही मनका संयम- कर बाहर-भीतरके सम्पूर्ण संकल्पोंका क्षय कर दे। हे अनघ ! यदि तू पाताल, पृथिवी अथवा स्वर्ग आदिमें कहीं भी रहकर हजारों वर्ष कठोर तपस्या भी करे तो भी (संसार-बन्धनसे मुक्त होनेका तो) संकल्पनाशके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं ॥ ४५–५२ ॥ इसलिये जो दुःखहीन, विकारहीन, स्वानन्दस्वरूप और परम पवित्र है उस संकल्पशान्तिके लिये तू पुरुषार्थपूर्वक पूर्ण प्रयत्न कर ॥५३॥ हे अनघ ! ये जितने भाव-पदार्थ हैं वे सब संकल्पके तागेमें पिरोये हुए हैं; जिस समय वह तागा टूट जाता है उस समय पता भी नहीं चलता कि संसारके ये परम वैभव कहाँ चले जाते हैं ? ॥ ५४ ॥ अतः संकल्प-विकल्पको छोड़कर प्रारब्ध-प्रवाहसे प्राप्त हुए व्यवहारमें तत्पर रह । संकल्पजालके क्षीण हो जानेपर जीवको ब्रह्मत्व प्राप्त हो जाता है ॥ ५५ ॥ परमार्थज्ञानसे सम्पन्न होकर तू हठपूर्वक सम्पूर्ण विकल्पजालको त्याग दे और पूर्ण आनन्दकी प्राप्तिके लिये चित्तवृत्तिको लीन करके उस अद्वितीय पदको प्राप्त कर ले ॥ ५६ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

सर्ग ७ ] उत्तरकाण्ड ३६५


सप्तम सर्ग

भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश,
रामचन्द्रजीका माताको उपदेश।


श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! वाल्मीकि मुनि-
वाल्मीकिना बोधितोऽसौ कुशः सद्योगतभ्रमः।<br>अन्तर्मुक्तो बहिः सर्वमनुकुर्वंश्चचार सः ॥ १ ॥के इस प्रकार समझानेपर तुरन्त ही कुशका सारा भ्रम जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर बाहरसे सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हुए विचरने लगा ॥ १ ॥
वाल्मीकिरपि तौ प्राह सीतापुत्रौ महाधियौ।<br>यत्र तत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ॥ २ ॥तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान् सीता-पुत्रोंसे कहा—॥ २ ॥
तस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः।<br>न ग्राह्यं वै युवाभ्यां तद्यदि किञ्चित्प्रदास्यति ॥३॥“यदि महाराज रामकी सुननेकी इच्छा हो तो उनके सामने भी गाओ, परन्तु वे कुछ देने लगें तो लेना मत” ॥ ३ ॥
इति तौ चोदितौ तत्र गायमानौ विचेरतुः।<br>यथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्राभ्यगायताम् ॥ ४ ॥मुनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने लगे। ऋषिने जहाँ-जहाँ गान करनेको पहले कहा था उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्होंने गान किया।
तं स शुश्राव काकुत्स्थः पूर्वचर्यां ततस्ततः।<br>अपूर्वपाठजातिं च गेयेन समभिप्लुताम् ॥ ५ ॥तब ककुत्स्थनन्दन रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूर्व-चरित्रके गाये जानेका समाचार सुना।
बाल्यो राघवः श्रुत्वा कौतूहलमुपेयिवान्।<br>अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ॥६॥भगवान् रामको यह सुनकर कि, उन बालकोंकी गान-विधि निराले ही ढंगकी और स्वर-ताल-सम्पन्न है, बड़ा ही कुतूहल हुआ।
राज्ञश्चैव नरव्याघ्रः पण्डितांश्चैव नैगमान्।<br>पौराणिकाञ् शब्दविदो ये च वृद्धा द्विजातयः ॥७॥अतः नरशार्दूल महाराज रामने यज्ञकर्मके विश्राम-समयमें सम्पूर्ण मुनीश्वरों, राजाओं, पण्डितों, शास्त्रज्ञों, पौराणिकों, शब्दशास्त्रियों, बड़े-बूढ़ों और द्विजातियोंको बुलाया ॥ ४-७ ॥
एतान्सर्वान्समाहूय गायकौ समवेशयत्।<br>ते सर्वे हृष्टमनसो राजानो ब्राह्मणादयः ॥ ८ ॥इन सबको बुला चुकनेपर उन्होंने गानेवाले बालकोंको बुलाया। वे सब राजा और ब्राह्मण आदि प्रसन्न-चित्तसे महाराज राम और उन
रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता ह्यनिमेषणाः।<br>अवोचन् सर्व एवेते परस्परमथागताः ॥ ९ ॥दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी टकटकी बँध गयी। तब वहाँ एकत्रित हुए वे सब लोग आपसमें कहने लगे—॥ ८-९॥
इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्विम्बमिवोदितौ।<br>जटिलौ यदि न स्यातां न च वल्कलधारिणौ ॥१०॥“ये दोनों तो, बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान ही दिखायी देते हैं। यदि ये जटाजूट और वल्कल धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई
विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यानयोस्तदा।<br>एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥११॥अन्तर ही न जान पड़ता।” इस प्रकार, जब वे सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद कर रहे थे
उपनद्धमभूत्तूर्णं तावुभौ मुनिदारकौ।<br>ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ॥१२॥उन दोनों मुनिकुमारोंने गानेकी तैयारी की और (कुछ ही देरमें) वहाँ अत्यन्त मधुर एवं अलौकिक गान होने लगा ॥ १०--१२ ॥