भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३६२अध्यात्मरामायण[सर्ग ६

स तु नायाति सदनं यावद्वनचरो भवेत् ।
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः ॥२०॥
योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदावध्यो भविष्यति ।
तं हत्वा लवणं क्रूरं तद्वनं मधुसंज्ञितम् ॥२१॥
निवेश्य नगरं तत्र तिष्ठ त्वं मेऽनुशासनात् ।
अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥२२॥
गजानां षट् शतानीह पत्तीनामयुतत्रयम् ।
आगमिष्यति पश्चात्तवमग्र साधय राक्षसम् ॥२३॥
इत्युक्त्वा मूर्ध््न्यवघ्राय प्रेषयामास राघवः ।
शत्रुघ्नं मुनिभिः सार्धमाशीर्भिरभिनन्द्य च ॥२४॥
शत्रुघ्नोऽपि तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ।
हत्वा मधुसुतं युद्धे मथुरांमकरोत्पुरीम् ॥२५॥
स्फीतां जनपदं चक्रे मधुरां दानमानतः ।
सीतापि सुषुवे पुत्रौ द्वौ वाल्मीकेरथाश्रमे ॥२६॥
मुनिस्तयोर्नाम चक्रे कुशो ज्येष्ठोऽनुजो लवः।
क्रमेण विद्यासम्पन्नौ सीतापुत्रौ बभूवतुः ॥२७॥
उपनीतौ च मुनिना वेदाध्ययनतत्परौ ।
कृत्स्नं रामायणं प्राह काव्यं बालकयोर्मुनिः ॥२८॥
शङ्करेण पुरा प्रोक्तं पार्वत्यै पुरहारिणा ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥२९॥
कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरावाश्विनाविव ।
तन्त्रीतालसमायुक्तौ गायन्तौ चेरतुर्वने ॥३०॥
तत्र तत्र मुनीनां तौ समाजे सुररूपिणौ ।
गायन्तावमितो दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽब्रुवन् ॥३१॥
गन्धर्वेष्वथ किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये
पातालेऽथतथा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्वेषु च ।
अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्ट्वा दिशः सर्वतो


अतः जबतक वह लौटकर घर न आवे, वनहीमें रहे, उससे पूर्व ही तुम नगरके द्वारपर धनुष धारण कर खड़े हो जाना ॥ २० ॥ लौटनेपर वह क्रोधपूर्वक तुमसे लड़ेगा और उसी समय मारा जायगा । इस प्रकार महाक्रूर लवणासुरको मारकर उसके मधुवनमें नगर बसाकर मेरी आज्ञासे वहीं रहो । तुम पहले जाकर उस राक्षसको ठीक करो, फिर तुम्हारे पीछे वहाँ पाँच हजार घोड़े, उनसे आधे ( ढाई हजार ) रथ, छः सौ हाथी और तीस हजार पैदल भी पहुँचेंगे ॥ २१–२३ ॥

ऐसा कह श्रीरघुनाथजीने शत्रुघ्नका शिर सूँघकर उनका आशीर्वादसे अभिनन्दन किया और उन्हें मुनियोंके साथ विदा किया ॥ २४ ॥ शत्रुघ्नजीने भी, भगवान् रामने जैसी आज्ञा दी थी वैसा ही किया । उन्होंने मधुपुत्र लवणासुरको मारकर मधुरापुरी बसायी ॥ २५ ॥ और दान-मानसे (लोगोंको सन्तुष्ट कर) उन्होंने मधुराको एक समृद्धिशाली नगर बना दिया ।

इस बीचमें श्रीसीताजीके वाल्मीकि मुनिके आश्रममें दो पुत्र उत्पन्न हुए ॥ २६ ॥ मुनिने उनमेंसे बड़ेका नाम कुश और छोटेका लव रक्खा । धीरे-धीरे सीताजीके वे दोनों पुत्र विद्यासम्पन्न हो गये ॥ २७ ॥ मुनिके उपनयन-संस्कार करनेपर वे वेदाध्ययनमें तत्पर हुए । श्रीवाल्मीकिजीने उन दोनों बालकोंको सम्पूर्ण रामायणकाव्य पढ़ा दिया ॥ २८ ॥ पूर्वकालमें इसे त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने पार्वतीजीको सुनाया था । उसी आख्यानको समर्थ मुनि वाल्मीकिने वेदोंका विस्तृत ज्ञान करानेके लिये उन बालकोंको पढ़ाया ॥ २९ ॥ वे अश्विनीकुमारके समाने अति सुन्दर कुमार उसे वीणा बजाकर स्वरसहित गाते हुए वनमें विचरा करते थे ॥ ३० ॥ उन देवरूप बालकोंको जहाँ-तहाँ मुनियोंके समाजमें गाते देख वे मुनिगण अत्यन्त विस्मित हो आपसमें कहने लगते थे—॥ ३१ ॥ "हम चिरजीवियोंने बहुत दिनोंसे सभी दिशाएँ देखीं; किन्तु गन्धर्व, किन्नर, भूलोक, देवलोक, देवालय, पाताल अथवा ब्रह्मलोक आदि किसी भी लोकमें गाने-बजानेकी ऐसी कुशलता